शहरी हक़ीक़त की परदे पर उतरी तस्वीर पर ये बोले वीरे दी वेडिंग के सितारे, साथ ही जानिए इनकी पसंद की उन फिल्मों के बारे में जिनमें महिलाओं ने किया कमाल, Film Companion
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एक साथ चार चार अभिनेत्रियां! एक साथ आप सबके साथ बैठना-बतियाना बहुत ही अच्छा लग रहा है। आपके निर्देशक शशांक घोष ने इस फिल्म को एक एस्ट्रोजेन सूनामी बताया है! जो मेरे हिसाब से वीरे दी वेडिंग का बहुत ही कमाल का इंट्रो है। मेरा सवाल ये है कि जब आप एक ऐसी फिल्म में काम कर रहे हों जिसमें सारी बड़ी हिस्सेदारी महिलाओं की ही हो तो क्या सेट पर आपसी व्यवहार अलग होता है? क्या कुछ बदल जाता है?

सोनम कपूर (सोक) : वाकई, क्या कुछ अलग सा है? मुझे तो नहीं पता। मेरा मतलब है कि पिछले कुछ सालों में, कम से कम मुझे तो ऐसी ही फिल्मों में काम करने का मौका मिला जहां या तो मैं ऐसे डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स के साथ काम कर रही थी जो मुझे बराबरी (अभिनेताओं के) का दर्ज़ा दे रहे थे या फिर मैं ऐसी फिल्में कर रही थीं जहां मैं ही फिल्म की सबसे अहम किरदार/अभिनेत्री थी। तो मुझे तो इसकी आदत सी हो गई है। और, मैं इसका आनंद भी ले रही हूं।

स्वरा भास्कर (स्वभा): मुझे तो ये बहुत अच्छा अनुभव लगा। मेरे हिसाब से ये बहुत ही अलग और मज़ेदार भी रहा, और सेट पर एक अलग तरह की मस्ती का माहौल सा भी रहा। लेकिन, ये सिर्फ किसी एक के लिए नहीं, सेट पर चार, पांच महिलाएं मिलकर ये कर रही थीं। हर तरफ महिलाएं ही नज़र आती थीं। आप शशांक की बात कर रही थीं तो आपको मैं बता दूं वह भी एक औरत जैसा ही है, एक ऑनरेरी गर्लफ्रेंड की तरह।

सोक: हां, हम उसे यही कहकर बुलाते थे। वो हमारे गॉसिप सेशन्स का भी हिस्सा हुआ करता था।

स्वभा: चार, पांच बिंदास औरतें, जो दरअसल मस्ती करने वाले इंसान हैं और एक दूसरे के साथ काम करने की कूवत रखते हैं और जिनके बीच छोटी छोटी बातों को लेकर दिक्कतें नहीं होतीं। तो ये एक तरह से बहुत अच्छा रहा, ऐसा लगता रहा कि हम पार्टी कर रहे हैं।

शिखा तलसानिया (शित):  हां, वास्तव में हम लोगों के बीच माहौल बहुत ही अच्छा हो गया था।

करीना, आप बहुत शांत लग रही हैं।

करीना कपूर खान (ककखा): नहीं, ऐसा नहीं है। मैं इन लोगों से पूरी तरह सहमत हूं! मेरे हिसाब से ये बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। जब आपकी ऊर्जा सही दिशा में लग रही होती हैं तो सबको अच्छा ही लगता है।

सोक: हमने खूब मस्ती की। और बेबो हमेशा कहती है, “ये फिल्म ऐसा लगता है – मुझे हमेशा ऐसी फीलिंग आती है।” बेबो?

ककखा: हां, ऐसा फील होता है। हम लोगों की केमिस्ट्री दिख रही है। मुझे भरोसा है कि लोग फिल्म देखने आएंगे और मस्ती करेंगे। सब लोग इस फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हैं। प्रोमो के बारे में तो हर कोई बात कर रहा है। और, सबको अच्छा लग रहा है। आप जहां भी जाएं, लोग आपसे पूछते हैं कि फिल्म कब रिलीज हो रही है। तो, उम्मीद करनी चाहिए, ये सब और अच्छा ही होगा।

एक बात बताइए कि फिल्म के सेट पर माहौल कितना बदला होता था, क्योंकि आप चार पढ़ी-लिखी शहरी महिलाएं, चार पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं के किरदार कर रही हैं।  तो क्या आप लोगों ने अपने जीवन के अनुभवों को कहानी के साथ रखा और कभी ऐसा कहा, “नहीं, ये चीजें ऐसे नहीं होती हैं?”

सोक: लेकिन, मेरे हिसाब से तो ऐसा ज्यादातर फिल्मों के सेट पर होता है। नहीं?

ज्यादातर फिल्मों के सेट पर? क्या वाकई आप ऐसा कर पा रही हैं?

सोक : हां, जब तक कि किसी फिल्म का लेखक अपनी स्क्रिप्ट को लेकर कुछ ज्यादा ही इमोशनल न हो और हमें शूटिंग से पहले ही बता दिया जाए कि देखो, ये फिल्म तो ऐसे ही बननी है, न एक लाइन इधर, न एक लाइन उधर। फिल्म बनाना एक सामूहिक प्रयास होता है। तो हमने अपनी रीडिंग्स की, वर्कशॉप्स किए। सेट पर भी ऐसा होता है, जैसे कि (वीरे दी वेडिंग में) एक बार हम सबको एक साथ जाना था और बेबो को एक शादी का जोड़ा मिलता है। और हमें लगा कि इसका असर एक खास तरह से बेहतर होता है। बतौर ऐक्टर, हम सब एक जैसा सोच रहे थे, “हमारे हिसाब से इस जगह ये पंच ज्यादा अच्छा है।” लेकिन ये सीन लिखा किसी और तरीके से गया था। ऐक्टर्स की तरह देखें तो मुझे लगता है कि हमने ये सब समझने के लिए काफी काम कर लिया है, “ये ही हमारी आपसी केमिस्ट्री है, हमारी बॉन्डिंग है।”

शित: और सबसे अच्छा क्या था कि हम सब जब सेट पर कुछ तुरंत बदलना भी चाहते थे तो एक जैसा सोच रहे होते थे। मैंने और स्वरा ने तो बिना किसी मतलब के कुछ ज्यादा ही रद्दोबदल कर डाला है!

स्वभा: और ये सब एडिटिंग में निकाल फेंका गया है। शशांक ने एक मौके पर कहा था, “हां, हां, करो, करो, वेरी गुड, वेरी गुड”, और एडिट पर जब हमने फिल्म देखी तो इसमें कुछ भी नहीं है फिल्म में और मैंने उसे कुरेदने की कोशिश भी की तो शशांक ने कहा, “मैं सिर्फ अपना फर्ज़ निभा रहा हूं।”

शित: आपने अभी थोड़ी देर पहले पूछा था कि सेट पर माहौल कैसा हुआ करता था, तो हम सब मिलकर खूब मौज मस्ती किया करते थे। हम चार वीरे थे जो एक दूसरे के साथ अच्छा वक्त बिता रहे है। तो सेट पर कुछ भी फेरबदल करना आसान था। इसमें कभी भी किसी को ज़बर्दस्ती जैसा कभी नहीं लगा।

सोक: और, तब जबकि आपको पता हो कि आप एक किरदार निभा रहे हैं और आप अपने किरदार के लिए तय की गई लक्ष्मणरेखा के भीतर ही मटरगश्ती कर रहे हैं।

जैसा कि अब तक मुझे फिल्म के प्रोमो से दिखता है, जो भी किरदार आप लोगों ने किए हैं, वे खूब गालियां देते हैं, खूब दारू पीते हैं। ‘तारीफें’  से मुझे ऐसा आभास भी मिलता है कि ये फिल्म उकसाने वाली और थोड़ा आक्रामक भी हैं। ये देखना भी आश्चर्यजनक लगा कि ये सुंदर दिखने वाले पुरुषों से घिरी ये औरतें बिना कुछ किए धरे इतनी मस्तियां कर रही हैं। लेकिन, मुझे बताइए कि कहीं इस सबसे ये खतरा भी तो नहीं है कि हम महिला सशक्तीकरण को बस सिगरेट पीने, दारू पीने और फ्री सेक्स तक घटा दे रहे हैं?

सोक: नहीं, मेरे हिसाब से ये कहना कि हम इस सबको इस लेवल तक ला रहे हैं, गलत है। ये नारीवादी या महिला सशक्तीकरण के हिमायती होने की बातों का पूरी तरह से गलत मतलब निकालना ही होगा। ये तो अपनी अपनी पसंद है, नहीं? पसंद ये है कि हम चार अलग अलग किरदार हैं फिल्म के और फिल्म में हम सबको अलग अलग तरह से बर्ताव करने के मौके मिले हैं। मेरे किरदार को ले लीजिए, मेरा किरदार अवनी न के बराबर ही गालियां देती है। लेकिन,  जब वह देती तो देती है, कभी कभार, एकाध बार। और, इसमें गलत ही क्या है! मुझे नहीं लगता कि कभी ये सवाल मर्दों से किया जाएगा! कि आप दारू पीते हैं, सिगरेट पीते हैं, गालियां देते हैं और बिस्तर में मज़े करते हैं, क्या ये सब करने से इंसान मर्द नहीं रह जाता?

नहीं, मैंने ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया कि ये आपको किसी तरह कमतर बनाता है! मैं तो सिर्फ एक बात कह रही हूं, क्या इससे ऐसा कुछ समझ आता है-?

स्वभा: लेकिन ये भी समझिए कि हमने कभी नहीं कहा- किसी ने नहीं कहा कि ये एक नारीवादी फिल्म है! किसी ने नहीं कहा कि ये फिल्म महिला सशक्तीकरण पर है। सबसे पहले तो मैं सिर्फ ये कहना चाहती हूं कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा को 105 साल लगे हैं एक ऐसी फिल्म बनाने में जो चार लड़कियों के बारे में हैं, ये चारों दोस्त है और किसी एक मर्द से प्यार नहीं करती हैं। मुझे पता है कि मैं बार बार एक ही बात दोहरा रही हूं, लेकिन मेरे हिसाब से ये दोहराव ठीक है। सिर्फ इसलिए क्योंकि लोगों ने ऐसी चार लड़कियों को देखा है, जो एक खास तरह के शहरी माहौल में हैं, और जो जवान शहरी कामकाजी लड़कियां होती हैं या जो उनकी लाइफ स्टाइल है, उनके बारे में हकीकत के करीब हैं। सच ये है कि हममें से तमाम लड़कियां तो इस तरह के माहौल में पली बढ़ी हैं, गालियां देती हैं (हममें से कुछ दूसरों से ज्यादा), हम दारू पीते हैं (किसी खास मौके पर या ऐसे ही)। जैसाकि सोनम ने कहा, हमारा सशक्तीकरण अपनी पसंद को लेकर है। और सिर्फ इसलिए कि ये सब हम परदे पर दिखा रहे हैं, तो इसका मुद्दा क्यूं बनाया जा रहा है? मेरा मतलब यहां आप से नहीं है। लेकिन मैं सिर्फ ये कह रही हूं, हमसे ये सवाल कुछ ज्यादा ही पूछा जा रहा है। मुद्दा ये है जैसा कि सोनम ने कहा जब हम पुरुष किरदारों को हकीकत के जितना करीब संभव हो उतना रहने देने की इजाज़त देते हैं तो फिर महिला करिदारों को ऐसा क्यों नहीं करने देते? अनुराग कश्यप से तो कोई ये नहीं पूछता, “तुम्हारी फिल्म के किरदार इतनी गालियां क्यों देते हैं?”

सोक: एक फिल्म आई थी, मेरे हिसाब से मैं प्यार का पंचनामा की बात कर रही हूं? इस फिल्म में ऐसे कितने ही डॉयलॉग्स थे जो महिलाओं के खिलाफ जानबूझकर बोले गए थे। और लोगों ने इस फिल्म का खूब लुत्फ उठाया, किसी ने भी एक बार भी ये नहीं कहा, “क्या आपको नही लगता कि महिलाएं कैसी हैं इसके बारे में आप बात करते हुए उनके कुछ ज्यादा ही खिलाफ जा रहे हैं, और कैसे पुरुषों को कमिटमेंट फोबिक के तौर पर देखा जाता हैं और महिलाओं को शादी के लिए उतावला होते हुए?” मुझे नहीं लगता कि इस तरह के सवाल तब उठे थे। इस फिल्म का खूब जश्न हुआ था और ये एक मस्ती भरी फिल्म थी, मेरे बहुत सारे दोस्त दारू पीते हैं, तमाम सारे दोस्त सिगरेट भी पीते हैं और मेरे बहुत सारे दोस्त बिस्तरों में मज़े भी करते हैं। लेकिन, ये वीरे दी वेडिंग नहीं है। ये फिल्म इस बारे में है ही नहीं। ये एक आम बोल-चाल का लहजा है। हम गालियां देते हैं, हम एक खास तरह से बात करते हैं।

तो आप कह रही हैं कि ये फिल्म एक खास तरह की शहरी हकीकत को परदे पर उतारना भर है।

सोक, स्वभा: हां, हां।

स्वभा: और प्लीज ये सशक्तीकरण, नारीवाद या फेमिनिज्म जैसी बातें इसमें मत शामिल कीजिए- हमने इनमें से कुछ भी नहीं कहा है। ये चार महिला दोस्तों की कहानी है, जो जीवन को अपने हिसाब से जी रही हैं और मस्त हैं –

शित: चार इंसान

स्वभा: चार इंसान। तो इनमें से आपको जो लेना हो ले लीजिए।

सोक: लेकिन, मुझे उम्मीद है कि ये एक तरह से बंधनों को तोड़ेगी। जब मैंने और मेरी बहन ने ये फैसला किया कि हमें एक खास तरह की फिल्म बनानी है तो हमें उम्मीद थी कि इस तरह की महिलाओं की फिल्मों के लिए गुंजाइश है – खास मर्दों के लिए फिल्में बनती हैं जहां वे जाते हैं और सलमान खान/आमिर खान/शाहरुख खान को देखते हैं – शाहरुख खान, उन्हें तो लड़कियां भी देखना पसंद करती हैं। लेकिन हमने ये भी सोचा कि ऐसा फिल्में बनती ही कहां हैं, जिन्हें शुक्रवार या शनिवार की रात जाकर हम देख सकें, जिनमें हम महिलाओं की जिंदगी का जश्न मना रहे हों? हमें ऐसी फिल्में देखने को नहीं मिलतीं। काफी हद तक वीरे दी वेडिंग ऐसी ही फिल्म है, जहां महिलाओं के लिए एक उम्मीद बंधती है। जैसेकि, अगर आप आप शादी नहीं कर रही हैं तो ये ओके है, अगर आपने पति के साथ साल भर से सेक्स नहीं किया है तो ये ओके है, अगर आप तलाक ले रही हैं तो ये ओके है और ये भी ओके है कि अगर आप किसी रिश्ते को निभाने से डरती हैं, ये ठीक है। सोनम कपूर, करीना कपूर, स्वरा भास्कर औऱ शिखा तलसानिया भी अपने किरदारों में इन्हीं सब से गुजर रही हैं, तो ये ठीक है। ये सब अपने में मस्त हैं और ये सब दोस्त भी हैं और यही फिल्म है। तो अगर ये किसी तरह से सशक्तीकरण है भी तो इसमें हर्ज ही क्या है, लेकिन हम ये सब –

किसी तरह की पोजीशन लेने के लिए नहीं कर रही हैं।

सोक: हम ये सब कोई खास पोजीशन लेने के लिए नहीं कर रही हैं। निजी जीवन में मैं ये भी करना चाहूंगी। लेकिन, ये भी है कि ये हम पर थोपा क्यों जा रहा है? ये उसी तरह का बेवकूफाना तर्क है कि जैसे, “सोनम कपूर ने शादी के बाद अपना नाम क्यों बदल लिया?” ये बहुत बेतुकी बात है!

तो मुझे बताइए कि इस फिल्म को ‘चिक फ्लिक’  कहे जाने पर ऐतराज़ क्यों है? इसमें गलत क्या है?

सोक: ‘चिक’ बेइज्जती करने वाला है, नहीं? क्या हम ‘चिक्स’ हैं?

शित: मुझे लगता है ऐसा करके आपको एक दायरे में कैद कर दिया जाता है। उस दौर में जहां हम तमगों से बाहर निकल रहे हैं, मुझे लगता है कि हमें इस तमगे से भी दूर हट जाना चाहिए। क्योंकि आखिर में, जैसा कि हमने पहले भी कहा, ये फिल्म चार दोस्तों के बारे में है। चाहे ये मर्द हैं, औरते हैं या दोनों का मिश्रण हैं, एक दूसरे से प्यार में भी नहीं है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

शित: मुझे लगता है इसी बात में दम है, तमगों से दूर जाना।

सोक: मैं सलमान खान की फिल्म देखना चाहती हूं क्योंकि कभी कभी वह परदे पर बिना टी शर्ट के भी होते हैं।

सोनम, सच के बारे में हमने कभी बात ही नहीं की। मैंने दो साल पहले आपका इंटरव्यू किया था और हमने तब वीरे के बारे में बात की थी। तब आपने बताया था कि कैसे इंडस्ट्री में सेक्सिज़्म के चलते इस फिल्म के लिए पैसे जुटना मुश्किल हो रहा था। आपके शब्द थे, “सच ये है कि वरुण और जॉन को ढिशूम बनाने के लिए जितने पैसे मिले हैं उतने पैसे मुझे और करीना को ये फिल्म बनाने के लिए नहीं मिलेंगे।” आपको लगता है कि बीते दो वर्षों में कहीं कुछ बदला है? मेरा मतलब ये है कि हम एक फिल्म देख रहे हैं राज़ी जैसी, जो जबर्दस्त कारोबार कर रही है। क्या बात कुछ आगे बढ़ी है?

सोक: मैं नहीं जानती। बेबो, तुम्हारा क्या ख्याल है?

ककखा: नहीं, मेरे हिसाब से मेरा इस बारे में बिल्कुल अलग सोचना है क्योंकि मेरे हिसाब से सब कुछ स्क्रिप्ट पर निर्भर करता है। जिस स्तर की स्क्रिप्ट होती है, बजट भी उसी हिसाब से मंजूर किए जाते हैं। लेकिन, अगर आप इस फिल्म की तुलना सलमान खान या आमिर खान की किसी फिल्म से करेंगे, तो पक्का है कि बजट तो अलग होंगे ही। मुझे नहीं लगता कि राज़ी भी किसी बहुत बड़े बजट पर बनी फिल्म है। ये बहुत छोटे बजट की फिल्म भी नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि उन लोगों को अपनी स्क्रिप्ट पर भरोसा था और कहीं मुझे ये भी लगता है कि स्क्रिप्ट कितनी अच्छी है या कितनी खराब, यही देखकर स्टूडियोज भी किसी फिल्म में हाथ लगाते हैं। हमें भी इस सबके बाद काफी अच्छा बजट मिल ही गया।

सोक: इस सबके बाद! बहुत संघर्षों के बाद! और, वह भी एक महिला फिल्म निर्माता एकता कपूर से ही मिला। ये उनकी वजह से ही हुआ, उन्होंने इस फिल्म के लिए कायदे का बजट दिलाने के लिए बहुत तगड़ी लड़ाई भी लड़ी। ये मेरी बहन और एकता की वजह से हुआ। किसी मर्द ने आगे बढ़कर ये नहीं कहा, “हम आपको इस फिल्म को बनाने के लिए पैसा दे रहे हैं।”

स्वभा: लेकिन, यही इस इंडस्ट्री का सांप-छछूंदर वाला अर्थशास्त्र है। ये भी सच है कि कुछ स्टार्स एक अच्छी ओपनिंग की गारंटी होते हैं या वे फॉर्मूला फिल्में जो एक अच्छी ओपनिंग की गारंटी होती हैं, प्रोड्यूसर्स उन पर पैसा लगाना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं। क्योंकि आखिर में ये सब पैसा और उसके निवेश का मामला है। ये एक कारोबार है। और तभी, जब एक महिला प्रधान फिल्म पैसे बनाती है, मुझे अच्छा लगता है । नीरजा ने ऐसे पैसे बनाए। राज़ी इसी तरह का कारोबार कर रही है। कि एंड का ने अच्छी कमाई की। ये देखकर अच्छा लगता है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रोड्यूसर्स ने समझा, “हां, अच्छी कहानियां भी पैसे बनाती हैं।”

सोक: लेकिन, तब भी अभी टूंब रेडर, हंगर गेम्स या ट्विलाइट जैसी फिल्में बनाने के लिए दिल्ली दूर है, जिनमें महिलाएं मुख्य किरदारों में हों और ये बड़े बजट की फिल्में हैं। मेरा कहना ये है कि यहां तक कि मार्वेल की फिल्में भी पुरुष प्रधान ही होती हैं, एक वंडर वूमन को छोड़कर। अगर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हालात ऐसे हैं तो फिर भारत तो अभी इस सबके लिए बहुत पीछे है।

स्वभा: मुझे लगता है कि एक या दो फिल्में इसे बदल सकती हैं। सिनेमा का अर्थशास्त्र बहुत जल्दी बदलता है।

सोनम, आप अभी कान फिल्म फेस्टिवल में थी और मेरे लिए जो सबसे यादगार इमेज इस फेस्टिवल की रही वो है 82 महिलाओं का एक साथ उस रेड कार्पेट पर खड़ा होना। यह कितना चौंकाने वाला था और मैं सोच रही थी कि कब यहां, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की महिलाएं ऐसी ही कोई तस्वीर बनाने में कामयाब हो पाएंगी? आपको क्या लगता है कि कब हम इतने संगठित हो पाएंगे, इस दिशा में कोई पहल कर सकेंगे? क्योंकि उस एक तस्वीर ने पूरी दुनिया को इसकी वजह बता दी है। वे काम करने की सुरक्षित जगह मांग रही थीं, वे (पुरुषों के) समान वेतन की मांग कर रहीं थीं। ऐसा यहां कब होता है?

सोक: मुझे लगता है कि सिर्फ ये समझकर कि हम चार महिलाएं एक साथ काम कर रही हैं, वीरे के साथ हम इस दिशा में एक कदम आगे बढ़े हैं। इस वक्त, वे ओशन्स एट बना रहे हैं और हम वीरे दी वेडिंग बना रहे हैं। मुझे लगता है कि अब उस तरफ बढ़ रहे हैं जहां मेनस्ट्रीम की ऐक्ट्रेसेस एक साथ काम कर रही हैं। मुझे याद नहीं कि पिछली बार ऐसा कब हुआ था, शायद सूजन सैरेनडॉन और…मुझे तो याद भी नहीं आता। मैं ये कहना चाह रही हूं कि ऐसा बहुत कम होता है कि ये सब होगा। मैं किसी भी तरह निराशावादी नहीं लगना चाहती है लेकिन मैं सिर्फ ये कह रही हूं सारी इंडस्ट्रीज को ये सब करने में काफी वक्त लगेगा कि, “ठीक है। महिलाओं के साथ भी एक खास तरह का व्यवहार होना चाहिए। हमें भी बराबर के मौके मिलने चाहिए, बराबरी से काम करने का माहौल।” ये सब, खासतौर से भारत में, अभी बहुत पीछे है। दुर्भाग्य से हम एक पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं।

करीना, आपने सबसे ज्यादा वक्त तक काम किया है। आपने कोई ठोस बदलाव देखा है?

ककखा: मेरे हिसाब से काफी हद तक। लेकिन, मेरा (सोनम की बात से) थोड़ा अलग मानना है क्योंकि हमारे यहां भी रेखा जी, शर्मिला टैगोर और वहीदा रहमान जैसी अभिनेत्रियां हुई हैं जिन्होंने आराधना, मौसम जैसी और सत्यजीत रे की फिल्में जिनमें महिला प्रधान किरदार होते थे, की हैं। सीता और गीता 60 के दशक में बनी थी। तो हमारे यहां भी ऐसी महिलाएं थी। मैं मानती हूं कि ये आज के ऐक्टर्स पर निर्भर करता है- चाहे हम यहां मौजूद सारे लोगों की बात करें या चाहे ये बात कंगना की हो, विद्या की हो या प्रियंका की जिन्होंने ऐसी फिल्में चुनीं और उनमें काम किया। समय के बहाव के विपरीत जाकर जैसा काम विद्या बालन ने किया है वैसा तो और किसी ने किया भी नहीं है। शादीशुदा होने और उसके बाद के बदलावों  के बाद भी ये कहना, “नहीं, ये ठीक है। मैं पटकथाएं चुनूंगी और फिल्में करूंगी।” और, उन्होंने द डर्टी पिक्चर से लेकर तुम्हारी सुलू तक ये करके दिखाया है। तो जैसा मैंने कहा कि ये सब आप पर निर्भर करता है। ये कहना अच्छा लगता है, “अच्छी कहानियां अब नहीं लिखी जातीं।” लेकिन ऐसी कहानियां तो तब से लिखी जा रही हैं। दो दिन पहले ही मेरी सास और मैं बातें कर रहे और उन्होंने कहा, “मैंने आराधना तब की थी जब सैफ दो साल के थे, अमर प्रेम तब की जब सैफ करीब तीन साल के थे।” ये सब बातें करने में ही अच्छा लगता है कि अच्छी कहानियां नहीं हैं, लोग ऐसी पटकथाओं को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं या ऐसी ही दूसरा कुछ। लेकिन, ऐसा पहले भी होता रहा है! ये फैसला करना आप पर है कि, “ये मैं करना चाहती हूं और ये वो है जो मैं बिल्कुल ही नहीं करना चाहती।”

सोक: लेकिन लोगों की सोच भी बदलनी चाहिए, नहीं? महिलाओं को एक साथ आना चाहिए और बजाय एक दूसरे से ही मुकाबला करते रहने के एक दूसरे के हाथ थामकर कहना चाहिए, “हम आपके साथ हैं।”

लेकिन, आपको नहीं लगता कि ये मुकाबले वाली बात मीडिया थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर ही पेश करता है? “आप लोगों ने कैसे किया? क्या आप लोगों को एक दूसरे से कभी असुरक्षा महसूस नहीं हुई?”

स्वभा: क्या नंदा जी और आशा पारेख जी वाकई में करीबी दोस्त नहीं थीं? और वे उस वक्त काम भी कर रही थीं। ईर्ष्यालु होना मानव स्वभाव में है और दोस्त बनाना भी मानवीय ही है। मुझे नहीं लगता कि आप किसी ऐसे शख्स के साथ दोस्ती करके मदद कर सकते हैं जिसके साथ आप कर रहे हों और वह थोड़ा मस्त भी हो।

सोक: लेकिन मुझे लगता है कि मेरे डैड और अमित अंकल ने अपनी फिल्मों से इस सबको एक तरह से खत्म ही कर दिया! सत्तर और अस्सी के दशक को याद कीजिए। क्योंकि, मेरे हिसाब से पचास और साठ के दशक में, आपके पास नूतन थीं, वहीदा जी थीं। और फिर आया एंग्री यंग मैन, उसके बाद मेरे डैड आए अपनी भिड़ूगिरी या जो भी कहें, के साथ। और यही वह वक्त था, जब ये सब शुरू हुआ, सत्तर और अस्सी के दशक के आखिरी साल –

ककखा: अस्सी और नब्बे के दशक बहुत अच्छे नहीं रहे।

तो आप सबके लिए क्या ऐक्टिंग सीखने की चीज है – क्या ये कोई ऐसी चीज़ है जो पैदाइशी होती है या फिर कुछ ऐसा जो आपने हासिल किया है? ऐक्टिंग की कला, क्या ये पैदाइशी है या फिर खुद को तैयार करनी होती है?

शित: मैं तो कहूंगी कि थोड़ा थोड़ा दोनों, सच में। दोनों का थोड़ा थोड़ा।

सोक: मेरे हिसाब हम में से तीन तो फिल्मी बैकग्राउंड से हैं। तो मुझे लगता है कि ये विरासत में मिला। मुझे ऐसा लगता है। मेरी बहन ऐक्टर नहीं है। मेरे हिसाब ये हमारे खून में ही था। स्वरा के बारे में मैं नहीं जानती। वह एक पढ़े लिखे परिवार से आती है।

आप क्या सोच रही थीं, स्वरा?

सोक: क्या सोच रही थीं, स्वरा?

स्वभा:  मैं सोच रही थी, “देखूं कैसे मैं अपनी पढ़ाई पर मिट्टी डालकर एक ऐसी इंडस्ट्री में जाऊं जहां इसकी कोई कद्र ही नहीं है।” नहीं, नहीं, मैं सिर्फ मज़ाक कर रही हूं। मेरे हिसाब से आपके अंदर अभिनय का वो कीटाणु तो होना ही चाहिए। हमारे तमाम सारे बड़े सितारे “बाहरी” ही हैं (और मैं ये बहुत सोचसमझ कर और कोट अनकोट के साथ कह रही हूं)।

ककखा: और ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं, जैसा कि तुमने कहा!

स्वभा: नहीं, नहीं, तमाम सारे पढ़े लिखे लोग भी हैं! लेकिन आपके भीतर कहीं न कहीं वो छोटी सी आशा भी होनी ही चाहिए। मेरे लिए ये आशा थी मुझे देखने वालों की। माफ करना, मैं ये बहुत खुलकर कह रही हूं। मैं बचपन में बहुत बड़ी ड्रामेबाज़ थी। मेरे डैडी मुझे इज़ाडोरा डंकन (अमेरिकी मूल की इस नर्तकी को लोग मदर ऑफ मॉडर्न डांस भी मानते हैं) कहकर बुलाते थे। मैं हर रोज़ तमाम तरह की बेवकूफी भरी कहानियां लेकर घर लौटतीं और बोलती, “पापा, पता है आज क्या हुआ?” और वह बस “हम्म” कहकर चुप हो जाते। मैंने ऐक्टर के तौर पर विधिवत सीखा भी नहीं है, मैं कभी ऐक्टिंग स्कूल नहीं गई। सच पूछा जाए तो मैंने थिएटर भी नहीं किया है। लेकिन मेरी हिंदी देखकर लोगों को लगता है कि मैंने ऐसा किया है। लेकिन, मैंने वाकई में थिएटर नहीं किया। मेरे केस में तो मैंने इसे अपने भीतर पाला भी है, इंडस्ट्री में आने से पहले और बाद में भी मैंने खूब सारी वर्कशॉप्स की हैं। मुझे हमेश ये डर लगा रहता है कि, “मैं एक प्रशिक्षित अभिनेत्री नहीं हूं!” तो मैं वर्कशॉप्स करती रहती हूं। जैसा कि इन्होंने अभी कहा, आपके पास दोनों होने चाहिए। और, ये आपके पास कैसे आता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ इस दुनिया में रहकर और इस माध्यम की बारीकियों को समझकर आप भी ये कर सकते हैं, थिएटर और सिनेमा में खुद को जमाकर जैसे शिखा ने किया, करीना ने या सोनम ने किया और तब ये आपके लिए बिल्कुल कुदरती लगता है।

शित: बस आप जब बड़े हो रहे होते हैं तो आपको अपने आसपास हो रही चीजों को थोड़ा अलग ढंग से महसूस करना होता है।

सोक: मैं ये जानती हूं। मेरी मॉम फिल्म बैकग्राउंड से नहीं है। तो मुझे दोनों तरफ की चीजें पता है। मेरे परिवार में किसी के फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनने में कोई दिक्कत नहीं है, मेरी मॉम की तरफ देखें तो ये ऐसा है कि अगर आप फिल्म इंडस्ट्री से नहीं हैं तो “आप फिल्म इंडस्ट्री ज्वाइन नहीं कर सकते!” मेरे लिए ये सब बहुत सामान्य रहा लेकिन मेरे चचेरे-ममेरे भाई बहनों के लिए नहीं। वे कभी ये सब समझ नहीं पाए कि ये सब क्या है, इतने इतने घंटे काम क्यों? जैसे मैं और शिखा अभी बात कर रहे थे कि अगर हम रात के 12 बजे घर तक बाहर हैं तो हमारे माता-पिता का व्यहार होगा, “कहां हो तुम? घर आओ!’ और अगर आप फिल्म के सेट पर सुबह 6 बजे तक भी काम कर रहे हो तो वे कहेंगे, “हां, ठीक है!” कोई फोन कॉल नहीं, कोई सवाल नहीं।

शित: आमतौर पर रात के 12 बजे घर से एक फोन कॉल आनी ही है, “कहां हो तुम? घर से कितनी दूर हो? घर आने का इरादा कब तक का है?” लेकिन अगर आप फिल्म के सेट पर मड आइलैंड में हो और आपके पास कोई ड्राइवर या कुछ भी नहीं है, आप सुबह 4 बजे भी अपनी कार खुद चला रहे हो, तो आपका जवाब होगा, “”मां, अभी काम खत्म नहीं हुआ है, अभी पैकअप नहीं हुआ है।“ और उनका जवाब होगा, “हां, ओके, कोई बात नहीं। जब मौका मिले तो फोन कर लेना।”

सोक: हालांकि यही हक़ीक़त है। मुझे भी लगता है, “ये कितना सच है!”

अच्छा चलते चलते, एक आखिरी सवाल, आप लोगों की पसंदीदा महिला प्रधान फिल्में कौन सी हैं?  आपकी यादों में ऐसी कौन सी फिल्मे बाकी हैं? वे कौन सी फिल्में हैं जो आप चारों को प्रेरणा देती हैं? ध्यान दिया आपने, मैंने चिक फ्लिक्स बिल्कुल नहीं कहा!

शित: बहुत सारी। मैं मेलिसा मैककार्थी की बहुत बड़ी फैन हूं। मेरे हिसाब से उन्होंने कुछ बहुत ही ज़बर्दस्त फिल्मों में काम किया है। मुझे सैंड्रा बुलक भी पसंद हैं और उनकी वो फिल्म…

द हीट?

शित: हां, द हीट। मेरे ख्याल से ये फिल्म वाकई बहुत अच्छी थी। और तमाम सारी और फिल्में, तमाम सारी, जो यहां बैठी जबर्दस्त महिलाओ ने की हैं।

सोक: मुझे बंदिनी बहुत पसंद है। ये एक फिल्म ऐसी है जो मुझे बहुत बहुत पसंद है। और, मुझे गॉन विद द विंड बहुत अच्छी लगी, बहुत ही प्रेरणादायी, दुखद लेकिन बहुत ही नाटकीय, नहीं?

शित: क्या मैं एक फिल्म जोड़ सकती हूं। खून भरी मांग को लेकर मैं पागल रही हूं। बोले तो आसक्त!

ककखा: जबर्दस्त फिल्म।

सोक: इसका फैशन?

शित: इसके बारे में सब कुछ!

ककखा: और उन्होंने (रेखा ने) इसमें बहुत ही अच्छा काम किया। बहुत अच्छा।

सोक: वाह! उन दिनों कॉस्ट्यूम को लेकर भी खूब प्रयोग हो रहे थे।

शित: जहां तक मुझे याद है, मैंने ये फिल्म 18 बार देखी है!

द हैट्स! हां, हां, इसका मज़ा ही अलग था! ये फिल्म थी ही इतनी शानदार।

ककखा:  मैं कहना चाहूंगी द डेविल वियर्स प्राडा या कुछ ऐसा ही, क्योंकि इसमें मेरिल स्ट्रीप हैं.. द ब्रिजेज़ ऑफ मैडिसन कंट्री। क्या कमाल की ऐक्टिंग की है। वह हैं तो बस वही हैं।

वही ही हैं। वह वाकई कमाल करती हैं। स्वरा?

स्वभा: मेरे पास पूरी लिस्ट है। मुझे मुग़ल ए आज़म से प्यार है। मुझे लगता है कि वह दौर, और वह कहानी और जिस तरह से उसके किरदार सामने आते हैं और..

एक बादशाह से बग़ावत, हां!

स्वभा: मेरे लिए, ये एक महिला प्रधान फिल्म है।

शित: बाज़ार भी है।

स्वभा: हां, लेकिन मुझे मुग़ल-ए-आज़म ज्यादा पसंद है।

सोक:  मुझे गाइड भी पसंद है।

स्वभा: मेरे ख्याल से एरिन ब्रोकोविच ऐसी फिल्म है जिसे देखकर मुझे लगा, “क्या बात है!” हाल के दिनों में जब वी मेट बहुत अच्छी लगी क्योंकि ये गीत की कहानी थी। पूरी फिल्म गीत के बारे में थी, उसी के इशारे पर बढ़ती कहानी। क्या मैं निल बटे सन्नाटा का भी नाम ले सकती हूं?

सोक: हम भी बोल सकते हैं ना, हमारी भी फिल्म्स हैं! नीरजा !

शिता: किसी एक को चुनना बहुत मुश्किल है। मेरे हिसाब कई सारी हैं।

कई सारी हैं।

ककखा: बहुत सारी।

स्वभा: मुझे लगता है कि करीना ठीक कह रही थीं, ऐसा नहीं हैं कि महिलाओं को लेकर दमदार किरदार पहले लिखे ही नहीं गए, लिखे गए हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि ये कभी कभी ही लिखे जाते थे, अगर आप उस वक्त की बनी सारी फिल्मों पर नज़र डालें तो समझ आएगा कि ये सबसे अलग क्यों हैं।

सोक: मेरे डैड कह रहे थे, “जहां तक मुझे याद पड़ता है, श्रीदेवी इकलौती ऐसी थीं जो किसी भी बड़े हीरो के बराबर ओपनिंग पा सकती थीं।” उनका मतलब था, “लोग इस बारे में बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन वह पहली ऐसी अदाकारा थीं।” हम लोग ऐसे ही बातें कर रहे थे। मेरे लिए तो खैर मैं उन्हें इस तरह से याद ही नहीं करती क्योंकि वह पिछले 20 साल से बोनी चाचू की पत्नी थीं और वह काम करना भी बंद कर चुकी थीं, तो मैंने तो उन्हें हमेशा अपनी चाची के तौर पर ही जाना। तो मैंने उन्हें वैसे कभी नहीं जाना। लेकिन, ये सच है कि ऐसे भी लोग हो चुके हैं। बेबो ने सही ही कहा कि ये हम पर है कि हम मशाल हाथ में लें और कहें, “हम इसे आगे लेकर जाएंगे।” और, उम्मीद है कि वीरे के साथ हम ये बाधा किसी तरह से तो पार कर ही जाएंगे। मैं आशा करती हूं कि ये फिल्म बहुत कामयाब हो क्योंकि ये चार इंसानों की दोस्ती की एक मनोरंजक फिल्म है और ये चारों महिलाएं हैं।  

बहुत बहुत धन्यवाद, लेडीज़। जाओ और छा जाओ। फिर मिलते हैं।

Adapted from English by Pankaj Shukla, consulting editor

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