मैं अपने काम करने के तौर तरीकों से खुद ही आत्ममुग्ध रहने लगा था: अभिषेक बच्चन, Film Companion
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अनुपमा चोपड़ा (अनु): मनमर्जियां की शूटिंग के पहले ही दिन आपने इंस्टाग्राम पर अपनी मेकअप चेयर की एक खूबसूरत सी फोटो पोस्ट की, इस कमेंट के साथ, “शायद बैठने के लिए ये सबसे डरावनी कुर्सी है”, क्या वाकई ये इतना डरावना एहसास था?

अभिषेक बच्चन (अब): हां, था तो। ये थोड़ी लंबी कहानी है। ऐक्टिंग के बारे में बात करें तो मैंने दो साल से कोई काम नहीं किया था। मैं बस ये महसूस कर रहा था कि मुझे कहीं न कहीं खुद को फिर से समझना है, जो काम मैं कर रहा था, उससे भी मुझे खास खुशी नहीं हो रही थी। मेरा मतलब ये नहीं है कि जो काम मेरे पास आ रहा था बल्कि जो काम मैं कर रहा था। मुझे लगा कि मैं अपने काम करने के तौर तरीकों पर खुद ही आत्ममुग्ध होता जा रहा हूं। और, ये कुछ ऐसा था जिसके बारे में हमेशा कहता रहा हूं, जैसे ही एक ऐक्टर को अपने काम को लेकर आत्मसंतोष होने लगता है, उसका पतन शुरू हो जाता है। मुझे लगता है कि जो भी काम मैं कर रहा था उसमें मुझे आराम मिलने लगा था। मैं झूठ नहीं बोलूंगा, मैं जो भी फिल्में कर रहा था उनमें मुझे मज़ा आ रहा था, मैं उन लोगों के साथ काम कर रहा था जिनका मैं ख्याल करता हूं और जिनके साथ जुड़कर मुझे बहुत आनंद भी मिलता रहा है। जितना मैंने अपने पूरे करियर में पैसा नहीं कमाया था, उतना मैं इन फिल्मों से बना रहा था। लेकिन फिर एक वक़्त ऐसा भी आता है जब एक एक ऐक्टर के तौर पर और एक क्रिएटिव इंसान होने के नाते आपको खुद पर सवाल खड़े करने होते हैं और खुद से पूछना भी होता है, “क्या आप यही करने आए थे? और, क्या आप चाहते हैं कि लोग आपको इसी के लिए याद रखें?” मेरे ख्याल से यह बहुत अहम है। मेरे लिए ये फैसला लेना बहुत मुश्किल रहा।

अनु: लेकिन ये तो ऐसा लगा कि आप ने तय कर लिया और कह दिया, “अब मैं और काम नहीं करना चाहता?”

अब: नहीं, मैंने ये नहीं कहा कि मैं अब और काम नहीं करना चाहता। मैं एक ऐक्टर हूं, एक फिल्मी परिवार से हूं, मेरी मजाल कि मैं ऐसा कहूं, ये तो मेरे खून में है। आखिर, यही तो है जो मैं दिल से करना चाहता हूं। यही तो वह है जो मैं जानता हूं कि कैसे करना है। और, जब आप फिल्मी परिवार से होते हैं, तो घर में आपके चारों तरफ ऐसा ही माहौल होता है, यही वह है जो आपको हर सुबह जगाता है। मैंने कभी ये नहीं कहा, मैं ऐक्टिंग बंद करने जा रहा हूं। मैंने कहा कि मुझे खुद को फिर से जगाना है, फिर से अपना मूल्यांकन करना है, मुझे अब वह करना है जो मुझे डरा सके। मुझे मुझे फिर से वही करना चाहिए जो रातों को मुझे सोने न दे। जब आप कोई एक ऐसी फिल्म साइन करते हैं जिसके बारे में आप जानते हैं कि ये 100-200-300 करोड़ की फिल्म होने वाली है, तो ये फिल्म करना आपके लिए बहुत सुविधाजनक होता है। आपको पता होता है कि फिल्म का भार आपके कंधों पर नहीं है, कोई और है जो इसे अपने कंधों पर उठा रहा है। आपको पता होता है कि ये फिल्म कमाल करने जा रही है और ये भी कि आप आराम से ये फिल्म कर सकते हैं और ये काम भी करेगा। और, कौन इन हालात में खुद को नहीं पाना चाहेगा, मैं इसकी शिकायत नहीं कर रहा। मैंने ऐसी फिल्मों में से कुछ की भी हैं। और, मैं इन सबका शुक्रगुज़ार हूं क्योकि मैंने जो भी फिल्में बनाई हैं, उनमें से ये सबसे कामयाब फिल्में रही हैं और मैं इनको लेकर काफी गर्व भी महसूस करता हूं। मैंने इनमें कड़ी मेहनत की है। लेकिन जब मेरे पास ऐसी ही और फिल्में आने लगी मुझे समझ आने लगा कि कहीं न कहीं मैं अपने काम को लेकर कुछ ज्यादा ही आरामतलबी की मुद्रा में आने लगा था।

अनु: ये कुछ ज्यादा ही आसान हो रहा था।

अब: एक उदाहरण देकर मैं आपको अपनी बात समझाता हूं, दो लोग ऐसे हैं जिनसे मैं बहुत प्यार करता हूं, फराह (खान) और शाह रुख, इनके साथ मैंने एक फिल्म की, हैप्पी न्यू ईयर। और भी जिन फिल्मों का मैं हिस्सा रहा हूं, उनमें से ये एक सबसे बड़ी हिट है। ये ऐसी फिल्म है जिसे देखने वाले बच्चे अब भी मेरे पास आते हैं और कहते हैं, ‘नंदू भिड़े’ और इसके लिए मुझे लोग याद रखते हैं और ये पूरी प्रक्रिया मुझे बेहद अच्छी लगी। नंदू भिड़े मेरे लिए एक बहुत मुश्किल किरदार था और मैंने फराह के साथ मिलकर इसे सही शक्ल देने के लिए बहुत मेहनत भी की। इसके बाद, एक ऐक्टर के तौर पर आपको कहीं लगता है, ‘ठीक है, मैं इस कर ले गया।’ पहले आप थोड़ा चुप रहते थे, आपको पक्का पता नहीं होता, मन में सवाल उठते हैं, ‘क्या मैं ये कर पाऊंगा?’ आप समझ रही हैं ना, मैं नंदू भिड़े जैसे किसी आदमी को जानता नहीं हूं, मैंने कभी ऐसा रोल किया नहीं है। क्या मैं वैसी बेफिक्री अपने भीतर ला सकूंगा जैसी नंदू भिड़े में थी? और एक बार जब ये हो जाता है और दर्शकों से आपको थोड़ी बहुत तारीफ भी मिल जाती है, आपका आत्मविश्वास बढ़ता है। लेकिन फिर आपको वैसा ही एक और किरदार मिल जाता है और मैं सोचता, ‘ठीक है, मैं ये कर लूंगा, कोई दिक्कत नहीं।’ लेकिन यही दिक्कत थी। मैं चाहता था कि मेरे भीतर भय बना रहे, वैसा भय जैसा मुझे हैप्पी न्यू ईयर करते समय महसूस होता था।

एक ऐक्टर के लिए ये अजीब किस्म का दोराहा है, आप खूब मेहनत करते हैं, जब पहले पहल फिल्मों में आते हैं, आप संघर्ष करते हैं, आप कोशिश करते हैं और आपको काम मिल जाता है, आपको काम मिल जाता है तब आप कामयाबी या नाकामी से संघर्ष करते हैं, और फिर आपकी सारी कोशिशें सबसे अच्छा पाने की तरफ होने लगती है ताकि आप उस पोजीशन पर पहुंचे जहां थोड़ा सुकून हो। और, आप यहां तक पहुंच भी जाते हैं और फिर, फिर आपको लगता है, ‘नहीं, नहीं, मैं आरामतलबी नहीं चाहता, मैं तो बेचैन रहना चाहता हूं।’

अनु: लेकिन, मनमर्जियां में ऐसा क्या रहा कि आपको लगा, यही वह फिल्म है जिससे मुझे वापसी करनी चाहिए?

अब: ये एक जबर्दस्त कहानी है। आनंद एल राय ने मुझे एक मेसैज भेजा और कहा, ‘मैं एक फिल्म प्रोड्यूस कर रहा हूं और इसके लिए मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।’ हमने मिलना तय किया, वह आए और मिले और मैं उन्हें बरसों से जानता हूं। वह बहुत ही प्यारे और मिलनसार इंसान है। आपको हमेशा ऐसा लगता रहता है कि बस आप उनके गले लगे रहें। उन्होंने कहा, ‘एक फिल्म है जिसे लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं। कुछ पूछो मत, बस इसे सुन लो।’ हमने मिलना तय किया लेकिन डायरेक्टर महोदय आ नहीं पाए। उन्होंने कहा, ‘क्या सिर्फ लेखक का आना ठीक रहेगा?’ और कनिका ढिल्लन मिलने आईं जो युवा हैं, ज़िंदादिल है, जीवन से लबरेज़ हैं, बहुत ही प्रतिभाशाली हैं और थोड़ा अपनी बात पर अड़ने वाली हैं। इस (कहानी) में कुछ ऐसा था जिसने मुझे प्रभावित किया। मैंने कुछ नोट्स बनाए थे जिन्हें मैंने उनके साथ साझा किया, और जिन पर विचार करने के लिए वह बहुत मन मारकर तैयार हुईं।

वे उस मुलाक़ात के बाद वापस मेरे पास आए और मैंने कहा, ‘ये अच्छा लग रहा है और काम भी कर रहा है, लेकिन मेरे मन में अब भी एक दो शंकाएं हैं।’ मैंने कहा, ‘इस फिल्म को डायरेक्ट कौन कर रहा है? क्या आप इसे निर्देशित करेंगे, क्या कनिका डायरेक्ट करेंगी? क्योंकि मैं डायरेक्टर से तो मिला ही नहीं हूं।’ तो उन्होंने कहा, ‘नहीं, मैं चाहता हूं कि अनुराग (अनुराग कश्यप) इसे डायरेक्ट करें।’ मैंने कभी अनुराग के साथ काम किया नहीं है और हमारे बीच अतीत में थोड़ा बहुत गड़बड़झाला भी हो चुका है जो कि मुझे खुशी है कि अब अतीत ही है। तब से हम सब थोड़ा बड़े हो चुके हैं और थोड़ा अनुभवी भी। मेरे ख्याल से तब मुझे लगा कि मैं फिर से कैमरे के सामने वापस आने के लिए तैयार हूं। क्योंकि, मेरे पास अब कुछ ढोने को नहीं था। मुझे लगा, ‘ठीक है, उनके पास एक नज़रिया है, और उनका नज़रिया दिलचस्प है। मैं इसके लिए तैयार हूं।’ इसी के साथ ही मैंने मन में ही एक और ख्याल को स्वीकार किया, ‘वह (अनुराग) मुझे बहुत परेशान करने वाले हैं।’ और मैं वाकई चाहता था कि मैं ऐसे माहौल में ही काम करूं।

अब: अनुराग ने मुझे पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। जो खाक़ा उन्होंने स्क्रिप्ट का मेरा सामने खींचा, उसने मुझे अपने में भर लिया। मैंने कहा, ‘यही है वो। मुझे ये करना ही है।’ क्योंकि कहानी का जो उनका दृश्य चित्रण था, उससे मुझे प्यार हो गया। ये कहना शायद गुस्ताख़ी लगे कि ये पहली बार था जब मैं किसी डायरेक्टर का एक स्क्रिप्ट पर इतना योगदान देख रहा था, कनिका ने जहां एक बहुत ही खूबसूरत स्क्रिप्ट लिखी थी, अनुराग इसको एक दूसरे लेवल तक ही लेकर चले गए। जिस तरह से उन्होंने मेरा किरदार देखा और जो वह इस किरदार के साथ करना चाहते थे, वह बहुत ही प्यारा था। और, मैं जान चुका था कि यही वो है जिससे मुझे वापसी करनी है। और, इसके बाद सब कुछ शुरू हुआ और तब वह वक़्त भी आ गया जब मुझे फिल्म की शूटिंग के लिए अमृतसर जाना था। पहले दो तीन दिन तो वह सिर्फ मुझे स्क्रिप्ट सुनाते रहे क्योंकि उन्हें स्क्रिप्ट की रीडिंग में यकीन नहीं है। वह कहते, ‘नहीं, इसकी रिहर्सल मत करो क्योंकि मैं सेट पर सब कुछ बदलता रहूंगा।’ और मेरे भीतर के नए ऐक्टर ने कहा, ‘ओके, तो ये मामला है। ये आपकी तरफ गुगली फेंकेंगे और आपको इसे बाउंड्री के पार पहुंचाना है।’ और ये मेरे भीतर उत्तेजना जगा रहा था। हालांकि ये बहुत डराने वाला मामला भी था। और, मुझे मालूम था कि ये बहुत अच्छा हो रहा है क्योंकि अरसे बाद मैं फिर से रात को ठीक से सो नहीं पा रहा था।

अनु: आपको वह मिल गया जो आप चाहते थे!

अब: मुझे वह मिल गया जो मैं चाहता था! मैं अपनी पत्नी से बात कर रहा था और वह पूछने लगीं, ‘तुम अभी तक जाग क्यों रहे हो?’ मैं क्या कहता, बस यही, ‘मुझे नहीं पता कि कल वह क्या करने वाले हैं। मैं वाकई डरा हुआ हूं।’ और जैसा कि आम तौर पर होता है, शूटिंग के पहले दिन हमने कुछ शूट ही नहीं किया। तो मेरी हालत पहले से और खराब हो गई। ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरे गले में फांसी का फंदा पड़ा है और अभी मेरे पैरों के नीचे से पटरा खींच लिया जाएगा। और फिर वह दिन भी आ गया और हम एक होटल में शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने मुझे तैयार होने के लिए एक कमरा दिया। तो जिस फोटो (मेकअप चेयर) की आप बात कर रही हैं, ये उसी होटल के कमरे की थी, जहां मुझे तैयार होने भेजा गया था। तैयार होने से ठीक पहले म्यूज़िक सुनते हुए मैं खिड़की के पास बैठा था। मैं इस कुर्सी की तरफ देख रहा था और मेरे मुंह से निकला, ‘हे भगवान, ऐसी किसी कुर्सी पर बैठे हुए तो मुझे दो साल से ज्यादा हो चुके हैं!’ और अचानक से मेरी आंखों के सामने से बीते पूरे दो साल गुजर गए- सारी तैयारियां, अब तक का पूरा सफर, सारे उतार-चढ़ाव।

अनु: अभिषेक, ये बात भी हैरान करती है कि ऐक्ट्रेसेस करियर के बीच में छुट्टियां लेती रहती हैं, कभी उन्हें बच्चों की देखभाल करती होती है, कभी उनकी शादी हो रही होती है। ऐक्टर्स के मामले में ब्रेक का मतलब थोड़ा गंभीर हो जाता है जैसे कि उनकी मौजूदगी पर ही सवाल हो। जैसे कि आप मानसिक रूप से खर्च हो जाने की बात बता रहे थे। या कि आपके डैड ने पांच साल का ब्रेक लिया। या तेलुगू फिल्म स्टार हैदराबाद के महेश बाबू ने अपने करियर के शीर्ष पर तीन साल का ब्रेक ले लिया और कहा, ‘नहीं, मुझे विश्राम लेना चाहिए।’ ऐसा क्यों है? पुरुषों पर ही ये दबाव ज्यादा क्यों है?

अब: मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता है। मेरे विचार से, सामान्य इंसान के तौर पर, चाहें आप ऐक्टर हो या ऐक्ट्रेस, आप एक सी भावनाओं से ही गुजरते हैं, एक जैसा डर, एक जैसी आत्मविश्वास की कमी। लेकिन कभी कभी ये एक ऐसा फैसला होता है जो आपको लेना ही होता है। मुझे लगता है कि जो लोग अपने करियर के शीर्ष पर ऐसा कर पाते हैं, वाकई बहुत बहादुर होते हैं। उसी तरह शायद मेरे लिए भी ये फैसला लेना आसान था, या ये फैसला मुझे लेना ही था। ये एक साल के लिए हो सकता है, दो साल के लिए या फिर पांच साल के लिए। लेकिन, ये आपका अपना नज़रिया है। मेरा मतलब है, कि अगर आप इस एक अभिनेता को देखें, जो अपनी कलाकारी के शीर्ष पर हैं, आमिर (खान)। और आमिर के पास दो साल में एक ही फिल्म आती है। मैं इसे देखता हूं और सोचता हूं, ‘हां, लेकिन वह इन पूरे दो सालों में काम ही कर रहे होते हैं और उनके पास इतना सब्र है।’ और मैंने इन दो सालों काम नहीं किया और सोचता रहा, ‘फर्क़ क्या है?’

आराध्या के पैदा होने के बाद ऐश्वर्या ने कुछ सालों का ब्रेक लिया क्योंकि वह अपनी बेटी पर ध्यान देना चाहती थीं। और जब वह वापस आईं तो इन्हीं सारी असुरक्षाओं से होकर गुजरीं, ‘क्या मैं इसे कर पाऊंगी? क्या मैंने ये सब जहां छोड़ा था, वहीं से फिर शुरू कर पाऊंगी? क्या मुझे ये पहाड़ फिर से चढ़ना पड़ेगा?’ एक बात तो तय है अनु, जो लोग भी पर्वत के शिखर पर होते हैं, वे सीधे वहीं नहीं उतरे हैं। इन लोगों ने वहां तक पहुंचने के लिए चढ़ाई की है! और कभी कभी आप वहां से फिसल जाते हैं या कभी कभी आप वहां से कूद जाते हैं और कहते हैं, ‘मैं फिर वापस ऊपर आने के लिए नीचे जा रहा हूं क्योंकि मुझे ये चढ़ाई बहुत पसंद है।’ तो मुझे लगता है कि इन सबको इसी तरह की भावनाओं से होकर गुजरना ही होता है।

अनु: क्या ये परिवार के लिए मुश्किल था? क्या उन्हें इस बात पर हैरानी हुई, कि आप कर क्या रहे हैं? खासतौर से जब अमित जी भी ब्रेक ले चुके थे और बाद में समझ आया कि ये ठीक नहीं था?

अब: मेरे हिसाब से डैड के समय में ये अलग था। उन्होंने 1992 में ब्रेक लिया। मैं सोचता हूं कि उन्हें ऐसा लगा कि दर्शक क्या चाहते हैं, उससे उनका संपर्क टूट गया था। जब वह वापस आए तो उनका कहना था, ‘मेरे ब्रेक लेने से पहले भी मैं उन्हीं लोगों के साथ काम कर रहा था जो कामयाब फिल्में बना रहे थे लेकिन अब इंडस्ट्री बदल चुकी थी, ये लोग कुछ और चाहते थे।’ आज के समय में आप इन सब चीजों से जुड़े रहते हैं, हर जानकारी पहले से आपके लिए तैयार और सुलभ है, आपको अच्छी तरह से पता होता है कि चल क्या रहा है। जैसे कि मैंने कहा, मैंने काम बंद नहीं किया या ये कहा, ‘मैं अब अभिनय नहीं करना चाहता।’ मैंने सिर्फ ये कहा, ‘मैं जिस तरह की फिल्में कर रहा हूं, वह ढर्रा बदलना है।’ तो ऐसा नहीं कि मैंने कोई अवैतनिक अवकाश ले रखा था। मैं हर रोज़ काम तो कर ही रहा था।

अब: रही बात फैमिली की तो उन्होंने मेरा खूब साथ दिया। उन्हें ये भी पता था कि मैं एक खेल कंपनी चला रहा हूं जो मुझे रात दिन व्यस्त रखने वाली थी। तो ऐसा नहीं कि मैं काम ही नहीं कर रहा था, मैं दरअसल बहुत मेहनत से काम कर रहा था, उससे कहीं ज्यादा जब मैं सिर्फ ऐक्टिंग कर रहा था। क्योंकि अब मुझे कोशिश करके एक फिल्म फ्लोर पर लानी थी और साथ ही अपना खेल कारोबार का मामला भी सुलटाना था, तो बहुत सारा काम था मेरे पास। उन सबको ये ठीक ही लग रहा था। मेरी पत्नी ठीक थीं। जो भी मैं करता हूं उसके बारे में मेरे परिवार को सब पता रहता है।

अनु: कोई चार या पांच साल पहले मैं ऐश्वर्या का इंटरव्यू कर रही थी। वह अक्सर एक बात बार बार दोहराती हैं और वह है ‘मध्य मार्ग’, इस विचार का मतलब है कि ना तो कामयाबी मिले तो आसमान छूने लगो और ना ही नाकामी सामने आने पर निराश हो जाओ। तब मैंने उनसे कहा था, ‘क्या आप कभी अभिषेक से इस “मध्य मार्ग” के बारे में बात करती हैं।’ और इसका जवाब उन्होंने ये दिया था – “अभिषेक के बारे में ये है कि दुनिया उनमें एक मस्त मौला इंसान देखती है और मुझे भी यही देखने को मिला। वह जोशीले हैं, शरारती हैं..लेकिन वह एक बहुत गंभीर शख्स भी हैं। सोचकर देखिए कि वह किस माहौल में पैदा हुए, जीवन में उन्होंने क्या क्या जिया है, अपनी पूरे जीवन में वह कहां कहां से गुजरे हैं और कैसे इस सबके साथ वह शांत खड़े रहे और पूरी मर्यादा के साथ…और आश्चर्यजनक से खुद को नियंत्रित रखते हुए, और ये अपने आप में इस बात की गाथा है कि वह भीतर से क्या हैं और कितना साहस और शक्ति है उनके भीतर। वह भले इसे दिखाते न हो, वह भले इसे साझा न करते हो और मुझे नहीं लगता कि वास्तव में वह इस गाढ़ी बात की किसी को झलक भी दिखाते हैं। मुझे लगता है कि कुछ किरदार ऐसे होते हैं जहां लोगों को इसकी झांकी मिलती है और यही वह है जहां इसका उबाल आता है लेकिन ये है। मुझे उनसे मध्य मार्ग के बारे में बात करने की जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि उन्हें इसके बारे में अपने पूरे जीवन पता रहा।” क्या ये सच है?

अब: वाह, ये उनकी बहुत प्यारी सदाशयता है। मैंने कभी इसके बारे में वास्तव में सोचा ही नहीं। जीवन जैसा था वैसा था, और जैसा है वैसा है। इसको देखने के दो तरीके हैं। और ये कहते हुए मुझे ये भी डर लगता है कि मुझे गलत समझा जाएगा। लेकिन मेरी विनती है, मैं ये बात किसी घमंड से नहीं कह रहा है लेकिन कृपया कोशिश करके इसे मेरे नज़रिये से देखिए। मैं एक ऐसे घर में पला बढ़ा जो दो बहुत ही उम्दा और प्रसिद्ध प्रतिभाओं का घर था और उनके सारे मित्र उनके सहकर्मी थे। इस तरह के माहौल में बड़ा हुआ तो मेरे लिए ये एक सामान्य सी लगने वाली बात थी। जब मैं बच्चा था तो मुझे लगता था कि सबके पिताओं की झलक देखने के लिए उनके घरों के बार लोगों की कतारें लगी रहती होंगी, मुझे इस बारे में इससे बेहतर कुछ नहीं पता था। जब मुझे बोर्डिंग स्कूल भेजा गया तो मुझे पता चला कि सामान्य ज़िंदगी क्या होती है या ये इतनी भी साधारण हो सकती थी। तब जाकर ऐसा हुआ कि मुझे इन बातों का एहसास होना शुरू हुआ। लेकिन, ये मेरी दुनिया थी। उन दिनों, सोशल मीडिया था नहीं, हमें टेलीविजन पर भी समाचार देखने के अलावा और कुछ देखने की इजाज़त नहीं थी। और तब केवल दूरदर्शन ही हुआ करता था। हमें हफ्ते में सिर्फ एक फिल्म देखने की छूट मिलती थी और वह भी सिर्फ रविवार को। या तो ये कोई रविवार वाली फिल्म थी या फिर तब जबकि वीएचएस कैसेट आने शुरू हुए, हमने डैड की एक फिल्म देखी। हम तब बहुत ही सीमित दायरे में रहते थे, यही हमारी दुनिया थी। तो किसी भी तरह वाममार्गी या दक्षिणपंथी होने का सवाल ही नहीं उठता या फिर कि ‘मध्य मार्ग’ का। आपको सिर्फ एक ही दुनिया पता होती है। जब आप बड़े होते हैं, जब आपको थोड़ा बहुत और खुला आसमान दिखता है, जब आप खुद काम करने लगते हैं, तब आपको जाकर ये एहसास होता है कि अच्छा, ये सब भी है। और, तब आपके मन में अपने माता पिता के लिए सम्मान और बढ़ जाता है कि उन्होंने इतना संतुलन बनाए रखा और आपको इसके असर से बचाकर रखा।

अब: पहली बार जब इसने मुझ पर असर डाला तो जहां तक मुझे याद है वो 5 सितंबर 2004 का दिन था। धूम को रिलीज़ हुए हफ़्ता भर हो चुका था और ये बहुत बड़ी हिट हो चुकी थी। ये मेरी पहली बड़ी कामयाबी थी। हमने इसके लिए एक बड़ी पार्टी की थी और मैं जब लॉबी से गुज़र रहा था तो लोग सच में मेरी तरफ दौड़ रहे थे। मुझे इसकी आदत नहीं थी। मुझे लगता है कि स्टारडम से ये मेरा पहला सामना था। और, मैं उस रात बावरा ही हो गया था। मुझे याद है सुबह तड़के जब पार्टी खत्म हुई तो हमारे पास कार या कुछ और नहीं था और मैरियट होटल से मेरे घर तक पैदल जाओ तो पांच मिनट लगते हैं, तो हमने पैदल ही जाने का तय किया। छोटू सा अर्जुन कपूर था मेरे साथ, उन दिनों वह असिस्टेंट डायरेक्टर हुआ करता था और मेरा बहुत ही प्यारा दोस्त था और एशा देओल थी जिसने मेरे साथ इस फिल्म में काम भी किया था। हमारी पदयात्रा के दौरान ही मुंबई भी जाग रही थी और मैं स्टार बन चुका था- मेरी फिल्म हिट हो चुकी है और मैं आ पहुंचा हूं। मेरे चलने का स्टाइल बदल चुका था, सीना तना हुआ था, लोग कारें रोक रहे थे, बाहर आ रहे थे, मेरे ऑटोग्राफ्स ले रहे थे। उन दिनों कैमरा फोन्स बस आने शुरू ही हुए थे। और, मैं? मैं तो बस, ऐ बाजू हटो, पता नहीं मैं हूं यहां।

मैंने घर की घंटी बजाई और डैड ने दरवाजा खोला। और, वह बोले, ‘आह, बेटा, आ गया?’ और मेरे दिमाग की घंटी बजी, ‘अमिताभ बच्चन!’ बाहर जो फूलकर कुप्पा हो गया था, सारी हवा यहीं निकल गई, ‘ये भगवान हैं, तुम कुछ भी नहीं हो।’ तो मैं घर पहुंचकर ये हो गया। मैं इन लोगों के घर आता हूं। और ये पूरी तरह से साधारण इंसान है। वह नाइट गाउन में बाहर निकले, चश्मा चढ़ाए, अखबार पढ़ रहे थे। और, मेरे मन में यहीं घूम रहा था, ‘ये होती है महानता, तुम? तुम कुछ भी नहीं हो।’

अनु:  इन 18 सालों में फिल्में बनाते हुए, क्या ऐसा कोई किरदार या फिल्म है जिसमें आपको लगा हो कि आपने मैदान जीत लिया? जहां आपको लगा हो कि आप जिन एहसासों को पाने की कोशिशें कर रहे थे, उनके सबसे करीब जा पहुंचने में यहां कामयाब रहे?

अब: बहुत हैं। बस ग़म यही है कि ये आपने जो कहा वे सारे एहसास बस वही तक रहे जब तक ट्रायल खत्म नहीं हो गया, जब मैंने बार ये फिल्में देखीं।

अनु: और फिर?

अब: अगले दिन, फिर वही ख्याल, ‘यार मैं यहां और अच्छा कर सकता था, वहां बेहतर कर सकता था।’

अनु: क्या आप अपने काफी बड़े आलोचक हैं?

अब: बहुत बड़ावाला। मेरे पास नोटबुक्स पड़ी हैं, जहां मैंने सारे नोट्स बनाएं हैं।

अनु: किस बारे में? अपने खुद के प्रदर्शन के बारे में?

अब: मैंने आपसे ही ये सीखने की कोशिश की। याद है हम लोग अवतार के प्रीमियर पर थे साथ साथ और आपके पति और मैं पॉपकॉर्न खा रहे थे। हमने 3डी चश्मे लगा रखे थे, और, पहली बार तो मुझे खटका कि हर तीन मिनट बाद ये रोशनी की चमक कहां से आ जाती है और तब मैंने देखा कि आपके पास एक पैड था जिसके साथ जुड़ी एक लाइट थी और आप नोट्स बना रही थीं। मैं सोचूं कि ये कर क्या रहीं हैं? और आखिर तक मुझे समझ आ गया, ‘वाह, ये तो बहुत सही है।’, क्योंकि बाद में आप अपने विचारों को उसी तरह ठीक से इकट्ठा नहीं कर सकते, क्योंकि बाद में तो आप उसके अनुभवों में ही खोए रहते हैं। तो मैंने भी इसकी कोशिश की, पर मैं फिल्म के दौरान नोट्स  बनाने का काम मैं कर नहीं सका। लेकिन मैं अपनी फिल्में अक्सर एक समीक्षक के नज़रिए से देखता हूं और नोट्स बनाता हूं। तो अगर किसी फिल्म में किसी मौके पर ये लग भी जाए कि मैंने अच्छा काम किया था, तो कुछ हफ्तों बाद, कुछ महीनों बाद, आपको लगता है कि नहीं कुछ तो कमी रह गई, मैं और अच्छा कर सकता था। तो आप गलतियां तलाशते रहते हैं। मुझे लगता है कि ये अच्छा भी है, आपको गलतियां तलाशते रहनी चाहिए, ये आपको तरक्की में मदद करती हैं।

अनु: इन 18 सालों के दौरान, क्या कोई ग़िला बाकी है? क्या कोई ऐसा शिक़वा है कि ये फैसले काश मैंने नहीं लिए होते या फिर कि आख़िर मैंने इन रास्तों पर सफर क्यों नहीं किया?

अब: बीती बातों पर फिर से नज़र दौड़ाने का दुखी करने वाला एहसास ये है कि आपको सब कुछ बहुत खराब दिखता है। क्योंकि अब आपके पास हर काम को बेहतर करने का तरीका पता चल चुका है। मुझे नहीं लगता कि तब मैं चीजों को किसी दूसरी तरह कर सकता था। क्या मैंने जो फिल्में बनाईं उन पर मुझे पछतावा होता है? नहीं। क्योंकि इनमें से हर एक मेरे लिए सीखने का एक बड़ा अनुभव रहा, जिन फिल्मों ने अच्छा किया वे भी और जिन्होंने अच्छा नहीं किया वे भी। तो मैं खुश हूं कि मैंने ये फिल्में कीं, क्योंकि इन्होंने मुझे वह ऐक्टर बनाया जो आज मैं हूं, और अगर मैं आपके सामने खड़ा – या बैठ – पा रहा हूं, तो ये इन्हीं फिल्मों का नतीज़ा है। सबसे बड़ा पछतावा जो मुझे रहा है और जिसके बारे में हमेशा खुलकर बोलता रहा हूं वो ये कि काश, मैंने जब शुरूआत की तो मैं और अच्छी तरह से तैयार होता। जब जे पी (दत्ता) साहब ने मुझे रेफ्यूजी के लिए साइन किया तो काश मैं और मंजा हुआ अभिनेता होता, थोड़ा और जानकार। कई बार मुझे लगता है कि उनको मुझसे जो उम्मीदें थी, उन पर मैं खरा नहीं उतरा। और ये बात मेरे लिए बहुत मायने रखती है।

जे पी साहब ने ही मेरा इस दुनिया से परिचय कराया। इस सबके दौरान वह मेरा हाथ थामे रहे। यहां तक कि जब हम साथ नहीं कर रहे थे तब भी। वह मेरे उस्ताद रहे हैं और मुझे बस यही लगता है कि वही मेरे सिनेमा के स्कूल रहे जबकि उनके पास आने से पहले मुझे इस बारे में और पढ़ाई कर लेनी चाहिए थी। उन्होंने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया। और, मुझे नहीं लगता कि वह मेरे बारे में ऐसा सोचते भी हैं, मेरे प्रति उनका प्यार इस सबसे बहुत परे है। उनके ऐक्टर के तौर पर, उनके शागिर्द के तौर पर, काश कि अपनी पहली फिल्म से पहले….और मुझे नहीं पता कि मेरे मन में यही एहसास तब भी होते कि नहीं अगर मैंने वह दूसरी फिल्म जो उनके साथ शुरू होने वाली थी, की होती, बस मैं ये उम्मीद ही कर सकता हूं, लेकिन काश कि मैं इंडस्ट्री में आने से पहले थोड़ा और तैयार होता। जैसा कि मैंने कहा, मैं मिठाई की दुकान में खड़े एक बच्चे जैसा था। मैं बस बहुत खुश था कि आखिरकार किसी ने मुझे साइन किया। दो साल हो चुके थे और कोई मुझे साइन नहीं कर रहा था। लोगों को इस पर यकीन नहीं होता, लेकिन यही सच है। मैं बस इतना खुश था कि, ‘हे भगवान, मुझे काम मिल गया!’ मुझे याद है मैं आपके घर भी आया था मिशन कश्मीर के लिए स्क्रीन टेस्ट देने। और, विधु मुझे कमरे में ले गए और मुझे एक गुलाब के साथ पोज देने को कहा, मुझे अब भी याद है। मैं सोच रहा था, ‘मैं कर क्या रहा हूं?’ मुझे वह रोल नहीं मिला, लेकिन ये ठीक है, मेरे हिसाब से वह एक बहुत ही प्यारे इंसान हैं।

अनु: मुझे समझौता एक्सप्रेसस के बारे में भी पढ़ना याद है  जो आप राकेश मेहरा के साथ करने वाले थे।

अब: समझौता एक्सप्रेस उन हालात का नतीज़ा थी क्योंकि मुझे काम नहीं मिल रहा था। और कोई मेरे साथ काम नहीं करना चाहता था। और, मैं तब तक तकरीबन उन सारे डायरेक्टर और प्रोड्यूसर से मिल चुका था जिन्हें मैं जानता था और जिन्हें नहीं जानता था उनसे भी! ये मेरे भीतर की कुंठा से निकली थी। राकेश को मैं जानता था क्योंकि वह मेरे पिता के साथ बीपीएल की पहली विज्ञापन फिल्में बना चुके थे। और, वे सब बहुत लोकप्रिय हुई थीं, लेकिन तब बहुत शोर मचा था कि “क्या मिस्टर बच्चन को टेलीविजन पर आना चाहिए?’ और तब मैं राकेश के साथ बैठा था, हम दोनों तब तक दोस्त बन चुके थे। मैंने कहा, ‘आपको पता है मेरे दो साल निकल चुके हैं और कोई भी मेरे साथ फिल्म नहीं बनाना चाहता।’ और उन्होंने कहा, ‘यार, मैं भी फिल्म डायरेक्ट करना चाहता हूं और कोई मुझ पर पैसा लगाने को तैयार नहीं है।’ मैंने छूटते ही कहा, ‘चलो हम लोग साथ काम करते हैं।’ तो हमने एक स्क्रिप्ट तैयार करनी शुरू की। और हमने स्क्रिप्ट लिखी समझौता एक्सप्रेस, जो जाहिर तौर पर उसके बाद तमाम दूसरे लोगों और कमलेश पांडे जी के पास गई ताकि वह इसे बेहतर बना सकें। और फिर आखिर में हम इसे लेकर डैड के पास पहुंचे, हमने कहा, ‘हमने इसे लिखा है और क्या आप इसे एबीसीएल के तहत प्रोड्यूस करेंगे?’ एबीसीएल उन दिनो तक भी फिल्में बना रही थी। और उनका जवाब था, ‘ये बकवास है।’ और, तब तक मैं अपने बाल और दाढ़ी बढ़ा चुका था।

मुझे याद है, इसके कुछ दिनों बाद ही फिल्मफेयर अवार्ड्स थे। जो भी कोई अभिनेता बनना चाहता है, वह ऐसे में किसी ऐसे को ढूंढता है जिसके साथ लगकर वह भीतर जा सके। और मुझे याद है कि किरन आंटी और अनुपम अंकल जा रहे थे और उन्होंने मुझे और सिकंदर को साथ ले लिया, और हम बच्चे ही तो थे, मन में लड्डू फूट रहे थे, ‘वाह, फिल्मफेयर अवार्ड्स!’ अपनी बहन की शादी के लिए जो भी शेरवानी मैंने सिलवाई थी, मैंने उसे पहन लिया। मेरे माता-पिता बाद में आने वाले थे, तो मैं गया और उनके पास जाकर बैठ गया। ये वही साल था जब बॉर्डर को ढेर सारे नॉमिनेशंस मिले और इसने ये सारे अनोखे पुरस्कार जीते। ये एक महान फिल्म थी। और जे पी साहब ने मुझे वहां देखा। और, मेरे लंबे लंबे बाल और दाढ़ी थी, जिन्हें मैंने समझौता एक्सप्रेस के लिए बढ़ाया था। उन्होंने ये देखा और उस वक्त वह एक फिल्म जिसका नाम आखिरी मुगल था, बनाने की सोच रहे थे।

अनु: हां।

अब: और, कुछ दिनों बाद, वह घर आए और उन्होंने मेरे डैड से बात की। तो जे पी साब ने मुझे अवार्ड फंक्शन में देखा, एक शेरवानी में, क्योंकि मेरे पास और कुछ पहनने के लिए था ही नहीं। और इस तरह से मुझे मेरे पहला काम मिला।

अनु: और अब आगे क्या? क्या आपने कुछ और भी साइन किया है या फिर से एक लंबा गैप होने वाला है?

अब: नहीं अब लंबा गैप नहीं होगा। मेरे मुंह फिर से खून लग चुका है। जैसाकि मैंने कहा कि आप इसका कितना आनंद लेते हैं, आपको ये एहसास याद रहता है। तो बहुत सारे प्रोजेक्ट्स है जिन पर चर्चा चल रही है। ये सब अलहदा हैं और बहुत ही उत्साहित करने वाले हैं। आपके सामने मैं पूरी ईमानदारी से कहूं तो मैंने इनमें से अभी कोई फिल्म साइन नहीं की है। ये वे सारी फिल्में हैं जो मैं करना चाहता हूं। लेकिन मुझे लगता है, जैसे कि हर ऐक्टर आपको बताएगा, ये कहने में कि ‘ओके, मैं ये फिल्म कर रहा हूं’ और वह फिल्म वास्तव में बनने के बीच बहुत लंबा सफर होता है। ये एक बड़ा संघर्ष होता है।‘ और, हम फिलहाल इसी संघर्ष से गुजर रहे हैं। लेकिन मुझे उम्मीद तो है कि ये प्रोड्यूसर्स इन फिल्मों के ऐलान का इंतजाम कर लेंगे। पारंपरिक रूप से मैं ऐलान करने से बहुत डरता हूं, इसमें थोड़ा सा अंधविश्वास भी है कि जब भी मैं ऐसा करता हूं, वे फिल्में कभी बनती नहीं हैं। तो मैं प्रोड्यूसर्स को ही इसकी घोषणा करने देता हूं। लेकिन हां, कोई चार-पांच अच्छे प्रोजेक्ट्स हैं जिनका हिस्सा मैं वाकई बनना चाहता हूं और जिन्हें मैं वाकई करना चाहता हूं। और मैं बस यही दुआ करता हूं कि सब कुछ ठीक ठाक से हो जाए, पैसे का इंतजाम, कलाकारों का चयन और सब कुछ, जो कि एक बड़ा काम है लेकिन ये भी तो सफर का ही हिस्सा है।

Adapted from English by Pankaj Shukla, consulting editor

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