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निर्देशक – अमर कौशिक

कलाकार – राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी

फिल्मस्टेज डॉट काम के साथ अपने एक ताजा इंटरव्यू में ऐक्टर ईथन हॉक ‘ट्रोजन हॉर्स’ सिनेमा पर बातें करते हैं। ये उस तरह की फिल्में हैं जिन्हें देखने आप किसी और मन:स्थिति से जाते हैं और ये निकलती कुछ और हैं, जैसे ऑस्कर के लिए नामित हुई बेहद डरावनी फिल्म गेट आउट, जो दरअसल अमेरिका में नस्लवादी रिश्तों पर एक करारी टिप्पणी करती है। स्त्री एक ट्रोजन हॉर्स है। निर्देशक अमर कौशिक और लेखकों कृष्णा डी. के. व राज निदिमोरू एक हॉरर कॉमेडी रचते हैं और ये भारत में महिलाओं की स्थिति और उनके साथ होने वाले बर्ताव को उलटने वाली एक ध्यान देने लायक टिप्पणी बन जाती है। ये बहुत ही शातिर और हंसाने वाली कोशिश है।

एक छोटे से कस्बे पर एक चुड़ैल का साया है जो साल में एक बार होने वाली पूजा की चार रातों में ही यहां आती है। वह सिर्फ पुरुषों का शिकार करती है, और शिकार के बाद ये पुरुष गायब हो जाते हैं, पीछे कुछ मिलता है तो सिर्फ उनके कपड़े। दरअसल, स्त्री जॉनाथन ग्लेज़र की फिल्म अंडर द स्किन की स्कारलेट जॉनसन का देसी संस्करण है। जॉनसन उस फिल्म में एक ऐसी एलियन हैं जो स्कॉटलैंड में पुरुषों का शिकार करती है। लेकिन उस एलियन से उलट हमारी चुड़ैल संवेदनशील है। उसका ज़िक्र प्यार की भूखी के तौर पर होता है। और वह रजामंदी में यकीन रखती है। एक बहुत ही डरावने सीन के जरिए हमें बताया जाता है कि वह सिर्फ उन्हीं पुरुषों का अपहरण करती है जो उसके बुलाने पर पीछे मुड़कर देखते हैं। उसकी आंखों में देखने का मतलब है रजामंदी देना। चाहे वे नुकीले दांतों वाली ड्रैकुला टाइप दानव ही क्यों न हों, महिलाएं वाकई ज़्यादा विकसित हैं। हां माने हां।

फिल्ममेकर्स राज और डी. के. का अपना सिनेमा है। असली लेकिन खुशी खुशी बेअदबी में यकीन करने वाला। याद है गो गोआ गॉन में सैफ अली खान का किरदार बोरिस जो नकली रूसी जॉम्बी किलर होता है या फिर तिलक के रोल में तुषार कपूर, एक छोटा सा अपराधी जो शोर इन द सिटी में पढ़ना पसंद करता है? लेकिन, ये उकसाने वाली मस्ती इनसे अपनी पिछली दो फिल्मों हैप्पी एंडिंग और ए जेंटलमैन में निर्देशक की कुर्सी पर रहते हुए बड़े सितारों और बड़े बजट के चलते संभाली न जा सकी। अपनी इस कहानी से उन्होंने फॉर्म में वापसी की है। क़त्ल करने के लिए बेताब एक रहस्यमयी औरत की शहरी दंतकथा को लेकर इन्होंने उसे उलट दिया है। इस फिल्म में पुरुषों को अंधेरे में बाहर निकलते डर लगता है जबकि महिलाएं कहीं भी आराम से आ जा सकती हैं। हमें खासतौर से बताया जाता है – पुरुषों का जीवन संकट में हैं। मुझे ये स्वीकार करने में गुरेज नहीं है कि एक बार तो पुरुषों को इस हालत में देखकर मुझे भी संतोष हुआ।

कौशिक को एक बहुत ही स्मार्ट स्क्रिप्ट मिली और इसे लेकर इन्होंने जैसे दौड़ ही लगा दी। बिना किसी अड़चन के वह एक बाद एक इस कहानी में डरावने अलंकार सजाते जाते हैं – कैमरे का मूवमेंट ऐसा कि दर्शक खुद कहानी में शामिल होने लगता है, झटका देकर डराते हैं, आखिर में कहानी को ट्विस्ट करते हैं और ठिठोली करके हंसाते हैं। सुमित अरोरा के लिखे संवाद बहुत ही सटीक हैं। खासतौर से ध्यान दीजिए उन संवादों पर जो पंच के साथ आते हैं। एक सीन में लोग बातें कर रहे हैं कि चुड़ैल को पढ़ना आता है क्योंकि जिस घर पर लिख दिया जाता है, मत आना, वह उस घर में प्रवेश नहीं करती है। पंकज त्रिपाठी जो फिल्में में स्थानीय भूत विशेषज्ञ बने हैं, ऐलान करते हैं कि ये ‘नए भारत की चुड़ैल’ है। विडंबना ये है कि जो फिल्म महिलाओं को इक्कीस साबित करने के लिए बनी हो उसमें पुरुषों के हिस्से यही सब कुछ आता है।

श्रद्धा कपूर को फिल्म में रहस्यमयी और आकर्षक दिखना था, और उन्होंने ये कर भी दिखाया। त्रिपाठी धीरे धीरे हिंदी सिनेमा में सबसे मजबूत कलाकार के तौर पर उभरे हैं। उनके हिस्से सबसे अच्छे संवाद आए हैं और जैसा कि वह अक्सर करते हैं, यहां भी उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग और सामान्य सी लगने वाली बात में भी हास्य खोज निकालने की महारत से सबको पीछे छोड़ दिया है।

दोस्त बने, अपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी अपने भोलेपन में इतने ज्यादा जंचते हैं कि ये दोनों कुछ बोलें उससे पहले ही लोग मुस्कुराना शुरू कर देते हैं। और, राजकुमार राव। ये कलाकार तो फिल्म दर फिल्म मजबूत होता जा रहा है। बरेली की बर्फी के प्रीतम विद्रोही की तरह उनके पास यहां ज्यादा कुछ शोबाज़ी करने लायक तो नहीं था लेकिन, विकी के किरदार में, लोग उसे बिकी कहकर बुलाते हैं, राजकुमार अपनी कोमलता और अपना आकर्षण दोनों जमा देते हैं। एक छोटे कस्बे के प्यारे से उस महात्वाकांक्षी टेलर के तौर पर उन्हें देखना वाकई अच्छा लगता है जो खुद को ‘चंदेरी का मनीष मल्होत्रा’ समझता है।

फिल्म की कमज़ोरियां गिनें तो इसके गाने बहुत ही फालतू हैं और याद रखने लायक भी नहीं हैं। और, हां, किसी बहुत असल किस्म के झटके की उम्मीद लेकर भी फिल्म देखने मत जाइएगा, अपने सूखे हुए हाथों और सड़े हुए दांतों के साथ स्त्री रामसे की किसी चुड़ैल का रिलोडेड वर्जन ही लगती है। इंटरवल के बाद फिल्म का जोश कम होता दिखता है। शुक्र ये है कि इसकी कहानी वापस पकड़ बना पाने में सफल होती है और इसका हास्य फिल्म को आराम से सिरे तक ले आता है।

हंसी-ठिठोली और डराने के साथ, स्त्री एक बहुत ही ज़रूरी संदेश देती है।

Adapted from English by Pankaj Shukla, Consulting Editor

Rating:   star

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