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अरसे से फिल्म कंपेनियन सिनेमा की अगुआई करने वाली हीरोइनों से इस बात पर चर्चा करता रहा है कि आखिर फिल्म कारोबार में रास्ता बनाना उनके लिए कैसा रहा है और क्यों सिर्फ इसलिए उनके अनुभव अलहदा होते हैं कि वह महिला हैं। यहां पेश हैं इनमें से ऐसी कुछ सबसे दमदार बातें जो भुलाए नहीं भूलतीं।

कंगना का सवाल, आखिर वजाइना के बारे में बात करना इतना मुश्किल क्यों है? 

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मणिकर्णिका की शूटिंग करते वक़्त मुझे चोट लग गई थी और मुझे याद है उस समय क्रू के तमाम लोगों ने मेरे पास आकर मेरी हिम्मत की तारीफ़ की। ये लोग मेरे पास और बोले, “यू हैव गॉट बॉल्स” और मेरे मन में तुरंत ये बात आई, “नहीं, मेरे बॉल्स (अंडकोष) नहीं हैं।” मेरे पास एक वजाइना है और क्यों कोई इस शब्द का इस्तेमाल इतनी ही बेतकल्लुफ़ी के साथ नहीं कर सकता। आखिर ऐसा क्या है कि लोग बॉल्स के बारे में तो तुरंत बोल देते हैं लेकिन वजाइना के बारे में नहीं बोल पाता है। बच्चेदानियों के बारे में बोलना तो और बेहतर रहेगा। आखिर स्त्री के अंगों को ही कायरता से क्यों जोड़ा जाता है। ये इसलिए भी बहुत भयावह है क्योंकि एक महिला इसी योनि के सहारे इंसान को अपनी कोख में रखती है। तो फिर ये दुर्बलता की परिचायक कैसे हो गई। ये दरअसल दिमाग में शुरू से ही भर दिया जाता है और मैं चाहती हूं कि हमें इससे मुक्ति मिले। 30 की ऊपर की होने के बाद भी बड़ा अजीब लगता है कि जब मुझे लगातार बराबर के काम और बराबर के पैसे के लिए झगड़ना पड़ता है।

वीरे दी वेडिंग बनाने के संघर्ष पर सोनम कपूर

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मैं यहां पैसे बनाने नहीं आई हूं। ऐसा हो तो अच्छा ही है लेकिन मैं चाहूंगी कि मेरी फिल्मों के लिए पैसा ज़रूर मिले। मेरी ऐसी कोई मांग नहीं रहती। मैं कभी किसी फिल्म पर इस बात का दबाव भी नहीं डालूंगी। लेकिन, मुझे कभी वैसा पैसा नहीं मिलेगा जैसा जॉन अब्राहम और वरुण धवन को ढिशूम बनाने के लिए मिला। वीरे दी वेडिंग बनाने के लए मुझे और करीना (कपूर) को जो पैसा मिल रहा था, उससे ये कहीं ज़्यादा है। मैं ये पक्का मानती हूं कि करीना और मुझे पसंद करने वाले बहुत सारे दर्शक हैं या कि हमारी फिल्में भी उनकी तरह बड़ी ओपनिंग पा सकती हैं और हम भी उनकी तरह अच्छा कर सकते हैं। मेरे कहने का मतलब ये कि वीरे दी वेडिंग एक कमर्शियल फिल्म है। लेकिन मुझे और बेबो (करीना) को ये फिल्म बनाने के लिए अपनी-अपनी फीस कम करनी पड़ी। ये एक पुरुषसत्ता वाला समाज है, यहां आपके साथ लिंगभेद बहुत होता है और मुझे इससे बहुत चिढ़ है।

हर रोज़ होने वाले लिंगभेद पर अनुष्का शर्मा

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जब ऐक्टर फिल्म बनाते हैं तो उन्हें बहुत बड़ी रकम मिलती है। लेकिन, जब मैं एनएच 10 बना रही थी तो मुझे ये वाकई में कहना पड़ा कि ये फिल्म मैं ही प्रोड्यूस करूंगी ताकि इस बजट में ये फिल्म बन सके नहीं तो ये कभी बनेगी ही नहीं। तो आपके भीतर हमेशा इस तरह के भेदभाव का एहसास बना रहता है। और, सिर्फ पैसों को लेकर ही ऐसा हो, ये भी नहीं है। मैं कसम खाकर कह सकती हूं जब आप कहीं आउटडोर शेड्यूल पर जाते हैं तो आपको पता होता है कि हीरो को आपसे बेहतर कमरा मिलना ही है। आखिर ऐसा होना क्यों ज़रूरी होता है? हर होटल में दो अच्छे कमरे तो होते ही हैं।

साउथ फिल्म इंडस्ट्री में काम करने पर तापसी पन्नू

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ऐसे भी हालात (साउथ फिल्म इंडस्ट्री में) बने हैं जब एक्टर ने मुझे अलग तरीके से लाइनें डब करने के लिए बोली हैं क्योंकि ये उन्हें पसंद नहीं थी। आपको यकीन नहीं होगा कि उन्होंने क्लोज अप शॉट में भी मुझसे लाइनें बदलने को कहा है। तो मैं बोल कुछ रही हूं और वो मुझे डब करने के लिए कोई दूसरी ही लाइन दे रहे हैं। जब मैंने मना किया तो उन्होंने वह एक लाइन किसी दूसरे से डब करवा ली। मेरे चेक बाउंस हो चुके हैं, बाकायदा साइन किए गए एग्रीमेंट बेकार हो चुके हैं क्योंकि प्रोड्यूसर की पिछली फिल्म चली नहीं। लेकिन, हीरो के लिए उन्होंने ऐसा कुछ नही किया। कभी कभी इसे लेकर इतना गुस्सा आता है कि आपका मन करता है चिल्ला चिल्लाकर पूरी दुनिया को ये बताया जाए ये कितना गलत है। मैं किसी का नाम नहीं ले रही लेकिन मैं ये बात खुलकर इसलिए कह रही हूं ताकि जो लोग मुझे फॉलो करते हैं उन्हें पता चले कि ऐसा होता है और इसे आपकी तरक्की में बाधा नहीं बनना चाहिए। आपका असली बदला होता है कामयाबी। यही एक बात उन्हें अपने किए पर शर्मिंदगी का एहसास कराती है।

बदले ना जा सकने पर प्रियंका चोपड़ा

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मैंने हमेशा थोड़ा और आगे जाने की कोशिश की है। खासतौर से जब सदी की शुरूआत में मैंने फिल्मों में काम शुरू किया तो लड़कियां हमेशा खबूसूरत होती थीं, ये देखकर अच्छा लगना स्वाभाविक भी है। मेरी साड़ी का पल्लू हवा में लहराता है या कोई हीरो जब मेरे आसपास मंडराता है तो मुझे अच्छा लगता है। लेकिन तब फिल्म में लड़की का बस यही काम होता था। मैं 19-20 साल की थी जब मुझे ये बताया गया कि लड़कियां की तो खूब अदला-बदली होती हैं फिल्मों में। अगर एक हीरोइन नहीं मिली तो नई लॉन्च कर लेंगे। क्या फर्क़ पड़ता है। अनजाने में ही ये बात कहीं मेरे दिमाग में घर कर गई। मैंने अब तक जो भी करियर बनाया है उसके पीछे वजह यही रही है कि मेरे अंदर से हमेशा ये आवाज़ आती रही कि मेरी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकेगा।

ऋतिक रोशन की मां का रोल ऑफर होने पर ऋचा चड्ढा

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गैंग्स ऑफ वासेपुर के समय मैं काफी छोटी थी। फिल्म रिलीज़ होने के तुरंत बाद, जो भी किरदार मुझे मिलने शुरू हुए वे सब वैसे ही थे। किसी यूपी या बिहार के घर की कहानी, जिसमें 40 या 50 साल की किसी महिला का किरदार और तब मेरी उम्र इसकी आधी ही थी। यही वो वक़्त था जब मेरे दिमाग में डर आया। मेरे पास किसी ऐंवई टाइप के कास्टिंग डायरेक्टर का फोन आया जिसने गैंग्स ऑफ वासेपुर देखी तक नहीं थी। उसे पता था कि मैं कैसी दिखती हूं लेकिन उसने मुझे फोन किया था अग्निपथ में ऋतिक रोशन की मां का रोल करने के लिए। तो मैंने कहा, ‘आपको पता भी मैं कैसी दिखती हूं? मैं अभी अपनी एक फोटो ले रही हूं और आपको भेज रही हूं। ऐसा मत करिए मेरे साथ।’

Adapted from English by Pankaj Shukla, Consulting Editor

 

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