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श्वेता बच्चन नंदा ने हाल ही में अपना फैशन लेबल MXS लॉन्च किया है और अब वो अपने पिता अमिताभ बच्चन के 76वें जन्मदिन पर अपनी पहली किताब पैराडाइस टॉवर्स लांच करने वाली हैं, उन्होंने बताया कि कैसे उम्र के इस पड़ाव पर वो अपने माता-पिता से प्रेरणा लेती हैं। दिलचस्प बात ये है कि जब उनसे किताब लिखने के ख़याल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बस इतना कहा, “एक दिन अचानक मेरे दिमाग में ये ख़याल आया”। पेश हैं श्वेता से बातचीत के मुख्य अंश:

 

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Girl Power .. the hoodie from #mxsworld .. specially made for me by the girl power of the house.. Shweta

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अनुपमा चोपड़ा: जब महान N शब्द नेपोटिज्म‘(भाई-भतीजावाद) आता है तब आप इसका क्या जवाब देती हैं? जब कोई आपसे कहता है कि, ‘बेशक, आपके पास एक लेबल होगा और ज़ाहिर है कि  आपके पास हार्पर कोलिन्स जैसे किताब के प्रकाशक होंगे क्योंकि आप एक बच्चन हैं?’

श्वेता बच्चन: ठीक है, मुझे अच्छी तरह से पता है कि मैं आज जहां हूं मैं वहां हूं, यहां तक ​​कि इस इंटरव्यू के लिए इस कुर्सी पर भी अपने नाम की वजह से बैठी हूं। यह एक ऎसी चीज़ है जो मुझे बहुत अच्छी तरह से पता है। लेकिन इसके बाद से, मैं जो कुछ भी करती हूँ वो सब मेरे अपने बूते पर है। मेरे पिता ने मेरी किताब नहीं लिखी है। उन्होंने डिज़ाइनिंग में भी मदद नहीं की है। वे किसी भी दूसरे माँ-बाप की तरह मददगार हैं, लेकिन यह मेरे ऊपर है कि मुझे डूबना है या तैरना। तो यह आपको सिर्फ इतन दूर ले कर आ सकता है और फिर इसके बाद यह आपकी अपनी प्रतिभा का होना या प्रतिभा की कमी का होना ही आगे की रह बनाता है।

अनुपमा: यह दिलचस्प था क्योंकि यह आदमी एक इमारत के अंदर जाता है और फिर उसे गलती से चोर समझ लिया जाता है और छुपने और भागने की कोशिश कर रहा है इसी बीच उन अपार्टमेंट्स में रह रहे पढ़े-लिखे मिडिल क्लास लोगों का दोगलापन सामने आता है। इसके लिए आपको साहित्यिक प्रेरणा कहां से मिली?

श्वेता: दरअसल, एक दिन मेरे दिमाग में अचानक से एक ख़याल आया। मैंने मिस्र के एक लेखक की लिखी एक किताब पढ़ी थी और मैं नाम याद रखने के मामले में बहुत बुरी हूं। उसका नाम दा  याकौबियन बिल्डिंग था। यह काहिरा में एक इमारत के बारे में थी और मुझे उस किताब का आधार बहुत पसंद आया, वहां के अलग-अलग लोगों और उनकी जिंदगियों के बारे में। मेरी किताब उसका बहुत ही सरल रूपांतरण है। यह एक छोटी सी साधारण सी कहानी है, लेकिन यह इसके बारे में शायद पहली जानकारी होगी।

अनुपमा: लेकिन आपको प्रेरणा कहां से मिली?

श्वेता: तो, आपके बच्चे हैं?

श्वेता बच्चन: मेरे पिता ने मेरी किताब नहीं लिखी है।, Film Companion

अनुपमा: हां।

श्वेता: जब वे एक निश्चित उम्र के हो जाते हैं मेरे अब 21 और 18 साल के हैं तब ऐसा वक़्त आता है कि अगर आप बुद्धिमान हैं, जोकि मुझे लगता है कि मैं हूंतो आपको सिर्फ दस कदम पीछे लेना सीखना होता है। वरना आप एक दूसरे के सर पर सवार रहते हैं और फिर बहुत ज़्यादा बगावत होने लगती है और आप इस सब से निपटना नहीं चाहते। इसलिए जब मैंने अपने बच्चों को बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था तो मैंने फैसला किया कि, मैं कुछ कदम पीछे लूंगी और मैं उन्हें इस राह पर अकेले चलने दूँगी। लेकिन उसके बाद मेरे पास कोई काम नहीं बचा। तो मैं बस खाली बैठी थी और कुछ नहीं कर रही थी। और तब मेरी एक दोस्त ने मुझे सरिता तंवर से मिलवाया जिन्होंने मुझे उनके लिए एक कॉलम लिखने के लिए कहा। उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए कुछ लिखो। तो मैंने लिखा, और उन्हें बहुत पसंद आया। लोगों ने इसका अनुकूल जवाब दिया और उस चीज़ से मुझमें बहुत आत्मविश्वास पैदा हुआ। मैं हमेशा से लिखती आयी हूँ।

अनुपमा: दो साल पहले, मैंने वह कॉलम देखा था जो आपने किया था। उसका शीर्षक था, ‘क्या मेरी बेटी को उसकी निजी ज़िंदगी वापस मिल सकती है?’  लेकिन उसके बाद श्वेता, आप और वो एक पब्लिक फिगर बन गए। क्या आपके लिए निजी और सार्वजनिक दोनों के बीच का ये तालमेल मुश्किल है क्योंकि आप हमेशा से पब्लिक फिगर नहीं रही हैं?

श्वेता: यह बहुत मुश्किल है। मैं एक बेहद निजी इंसान हूं। और, हां, कुछ चीजों के लिए।। अब अगर मेरी किताब बाहर आने वाली है, तो मुझे अपने शर्मीलेपन को दूर करने के लिए मजबूर किया गया हैतो जैसा कि मैं हमेशा कहती हूं कि मैं अपने सहूलियत के दायरे में नहीं हूं। यहां तक ​​कि बाहर काम करने  में भी मेरी सहूलियत नहीं है। लेकिन अगर ये ऐसा कुछ है जो आपको करना ही है, तो आपको बस इसे करना ही होगा। बच्चों के लिए, यह मुश्किल है क्योंकि आप सिर्फ एक हद तक कर सकते हैं और उससे ज़्यादा नहीं। मेरा मतलब है कि नव्या के साथ मेरे ज़बरदस्त झगड़े हुए हैं वो भी इस बात पर कि इन तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर पोस्ट करना बंद करो। एक तरफ मुझे लगा कि मैं उसे क्यों रोक रही हूं? यह उसका अकाउंट है और उसे वो सब डालने की इजाज़त होनी चाहिए जो वो चाहती है। उसके पास स्कूल में किसी दूसरे बच्चे की तरह सामान्य ज़िंदगी होना चाहिए। और फिर दूसरी तरफ, उसके इन्स्टाग्राम पर बहुत सारी गंदी टिप्पणियां हैं। आखिरकार, वो खुद ही सीख गयी। उसने महसूस किया कि वह क्या पोस्ट कर सकती है, क्या पोस्ट नहीं कर सकती और मुझे लगता है कि यह अब ये मुद्दा ख़त्म हो चुका है।


अनुपमा: पब्लिक फिगर होने का एक पहलू ये भी है कि आपको आलोचना के लिए खुद को तैयार करना होता है। आपके लेबल को लेकर और साहित्य चोरी के बारे में बहुत ही कड़ी प्रतिक्रिया आयी थी। आपने इसका जवाब कैसे दिया?

श्वेता: आपको पता है, आपको बस अपनी चमड़ी मोटी करनी पड़ती है। और आपको पता होता है कि आप जो कर रहे हैं वो आप ईमानदारी से कर रहे हैं। तो आपको बस इसे नज़रअंदाज़ करना होता है। मेरी मोटी चमड़ी नहीं है लेकिन मैं इसे तैयार करने की कोशिश कर रही हूं। तो ये चीजें मुझे बहुत परेशान करती हैं लेकिन मुझे लगता है कि मैं सीख जाऊँगी। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है।

अनुपमा: मुझे फैशन इंडस्ट्री के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं है, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास दो चीजें होती हैं जो बिल्कुल एक जैसी दिखती हैं?

श्वेता: मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही सामान्य भावना है और यह एक सामान्य नारा है। मेरा मतलब है कि अगर आप ऑनलाइन जाएंगे तो देखेंगे कि ऐसे कई डिज़ाइन हैं जो बिलकुल एक जैसे हैं। कोई वहां जाकर ये नहीं कह रहा कि अरे ये एक स्वेटशर्ट है और मैं इसे छीनने वाली हूँ। ये कोई ऎसी चीज़ नहीं है जिसे आप योजना के तहत करते हैं और हां ये मुमकिन है कि अलग-अलग रचनात्मक लोगों के पास एक वक़्त पर एक ही जैसे आइडियाज हो। और यदि आप अपने हिस्से की खोजबीन करें, जोकि हमने करी, तो यह एक सामान्य डिजाइन है और यह केवल एक स्वेटशर्ट  नहीं है। ऐसे कई स्लोगन हैं जिन्हें अलग-अलग रंग-रूप में किया गया है। हां वैसे भी इन्हें बिलकुल उसी तरह नहीं किया गया था लेकिन किसी भी तरह इन्हें किया जा चुका है और ये ख़त्म भी हो चुका है। वैसे, आपको बस इतना बताना चाहती थी कि ये हमारा अब तक का सबसे ज़्यादा बेचा गया प्रोडक्ट है। हमने इसका पूरा स्टॉक बेच दिया है। ऐतिहासिक रूप से।


अनुपमा: आप उन औरतों को क्या सलाह देना चाहेंगी जो मिडिल एज में आकर दोबारा कुछ नया शुरू करना चाहती हैं? 

श्वेता: मैं उनसे कहूंगी कि ज़रूर करिए! अगर आपकी इच्छा है, तो आपको यह करना चाहिए। आप 44 साल की हैं, हो सकता है कि आपके पास कुछ बेजोड़ से 20-30 साल ही बचे हो तो अब ये शर्मीला इंसान बने रहने का वक़्त नहीं है। असलियत में महिलाओं के लिए आगे बढ़ने और चीजों को हासिल करने के लिए इससे बेहतर वक़्त कभी रहा ही नहीं है। मैं यह नहीं कह रही हूं कि औरतों के लिए यह एक अनुकूल जगह या मंच है लेकिन यह उससे तो बेहतर ही है जो पहले था। और आपको बाहर निकलकर वो सब करना चाहिए। मुझे पता है कि मेरे लिए यह कहना आसान है क्योंकि लोग ये ज़रूर कहेंगे कि, “यह सब उसे प्लेट में रख कर दे दिया गया,” लेकिन मुझे सचमुच लगता है कि अगर आप 44 साल के हैं और ऐसा कुछ है जो आप करना चाहते हैं, तो आपको कोशिश करनी चाहिए और उसे कर लेना चाहिए।

अनुपमा: क्या इस उम्र में आकर कुछ ज़्यादा खुशी है?

श्वेता: फिर से, मेरे पास इस बात से सम्बंधित कोई उदाहरण नहीं है क्योंकि मैं 23 साल की उम्र में माँ बन गयी थी और अब तक मैं बस वही बनी रही हूं।

अनुपमा: आपके पिता ने हाल ही में आपकी और अभिषेक की एक बहुत ही प्यारी तस्वीर पोस्ट की है। यह आप दोनों के बचपन की तस्वीर थी और वह इस बारे में बता रहे थे कि वो आप पर कितना गर्व करते हैं क्योंकि आपने उन्हें अपनी किताब की एक कॉपी दी है और उन्हें मनमर्ज़ियाँ में अभिषेक का काम बहुत पसंद आया है। यह किस तरह का एहसास है?

श्वेता: तो जब मैं उनकी तरफ देखती हूं, तो मैं उन्हें एक अभिनेता के रूप में नहीं देखती हूं। मैं उन्हें एक पिता के रूप में देखती हूं, जिनके साथ मैं लंच और डिनर करती हूं, जिनके साथ मैं वक़्त बिताती हूं। यहां तक ​​कि जब आपके पास कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो 76 साल की उम्र में भी खुद को आगे बढ़ाना चाहता हैऔर ज़्यादा जानना और करना चाहता है, और पूरे दिन इतना व्यस्त रहता है।यह सिर्फ एक अभिनेता के क्षेत्र में नहीं है, यह सिर्फ एक इंसान के रूप में है। मैं असलियत में अपने माता-पिता दोनों जैसी हूं। बहुत से लोग मुझसे कहते हैं, ‘ आपने 44 की उम्र में शुरू किया।

लेकिन मेरी मां 50 का आंकड़ा पार कर चुकी हैं और एक गृहणी होने के बाद, एक अभिनेत्री और बाक़ी सब करने के बाद, उन्होंने उन सब चीज़ों को एक तरफ किया और राज्यसभा में कूद पड़ी। वो वह सब कर रही हैं और बहुत शानदार तरह से कर रही हैं। वह अपने काम को गंभीरता से लेती हैं। वह औरतों को एक आवाज़ देना चाहती हैं और वह इसे बहुत अच्छी तरह कर रही हैं। तो जब आपके घर में ही ये सब होता है, तो यह बस आपको प्रेरित ही करता है। आप सोफे पर पड़े-पड़े टीवी नहीं देखना चाहते हैं। आप बाहर निकलकर कहना चाहते हैं कि मैं भी व्यस्त हूं। मेरे पिता 76 साल की उम्र में सुबह 6 बजे उठते हैं और दोपहर होने तक तीन काम निपटा चुके होते हैं।

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