रणबीर कपूर ने खोले किरदारों में ढलने की अपनी कोशिशों के राज़ और बताया कि उन पर कैसे असर करती है मोहब्बत!, Film Companion
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अनुपमा: फिल्मों से प्यार करने वालों, फिल्मों को पढ़ने वालों की एक बड़ी तादाद है, तो क्यों न बातचीत का ये मौका हम ऐक्टिंग के बारे में बात करने के लिए इस्तेमाल करें।

रणबीर: हर फिल्म करने के बाद ये मार्केटिंग का दौर आता ही है। आपको वाकई फिल्म बेचनी पड़ती है ताकि लोग इसे देखने आएं और ये सबसे ज़्यादा थकाने वाले काम है। आप गांधी और लास्ट ऑफ द मोहिकन्स जैसी फिल्में भी कर सकते हैं जो ऐक्टर के तौर पर आपको बुरी तरह थका देती हैं लेकिन ये पांच दिन वाला प्रमोशन तो जैसे इंसान को मार ही देता है।

अनुपमा: दीपिका हमेशा मुझसे कहती हैं कि मेरी ऐक्टिंग की प्रॉसेस के बारे में मत पूछिए। वह इस बारे में बात करना पसंद भी नहीं करती हैं। आपको पसंद है इसके बारे में बात करना? क्या आप बता सकते हैं कि कैसे एक इंसान किसी दूसरे किरदार में ढल जाता है? क्या कोई प्रक्रिया है ऐसी जिसे आप फॉलो करते हैं?

रणबीर: हर फिल्म के साथ हर किरदार अपना तरीका खुद लेकर आता है। हर बार आपको एक अलग तरह की प्रक्रिया का पालन करना होता है, और ज़्यादातर मैं ये सब भूल भी जाता हूं, तो मुझे अच्छा लगेगा इस बारे में बात करके।

अनुपमा: आपके कहने का मतलब है कि आप किसी किरदार में ढलने के लिए जो करते हैं, वह भूल जाते हैं?

रणबीर: हां, क्योंकि वह आपका बीता हुआ वक़्त है और आप लगातार खुद को बेहतर बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं, आपकी कला, आपका हुनर लगातार विकसित होता रहता है। ये भी है कि अगर आप ज़्यादा ही हुनरमंद हो गए तो फिर ये भी बोर करने लगता है और आप खुद को दोहराने लगते हैं। तो अगर आपका कोई सेट पैटर्न है हर फिल्म को करने का तो फिर आप हर फिल्म में वही छोटी छोटी बातें दोहराने लगोगे जो आपने अपने भीतर भर ली हैं।

अनुपमा: मुझे जग्गा जासूस वाकई बहुत अच्छी लगी थी और मुझे वाकई बहुत दुख हुआ जब इसे देखने उतने लोग नहीं पहुंचे जितने कि आने चाहिए थे। कैसे सामना किया आपने इसका?

रणबीर: इसने मेरा दिल ही नहीं तोड़ा बल्कि मेरे पैसे भी इसमें टूटे। अनुराग बासु बिल्कुल अलग प्रजाति के डायरेक्टर हैं। जब हम बर्फी पर काम कर रहे थे तो कई बार ऐसा होता था कि प्रियंका, इलियाना और बाकी ऐक्टर्स शॉट के इंतज़ार में बैठे रहते थे और कुछ पता नहीं होता था कि हो क्या रहा है। कोई स्क्रिप्ट नहीं थी, कहानी का कोई ब्लूप्रिंट नहीं था। हम सबको पता था कि कहानी क्या है लेकिन दादा हमेशा आखिरी मौके पर कुछ न कुछ बदल ही देते थे। बर्फी का हमारा ये अच्छा अनुभव ही था जिससे जग्गा जासूस की शुरूआत हुई। जग्गा जासूस दिखने में काफी सरल और बेसिक फिल्म थी लेकिन इसको ऐसा दिखाने के पीछे तमाम तरह की जटिलताएं भी रहीं। मुझे लगता है हमने कुछ ज्यादा ही समेटने की कोशिश कर दी थी क्योंकि ये एक जासूस की कहानी थी, जो हकलाता है, ये म्यूजिकल भी थी, बंदा अपने पिता का पता लगा रहा है, फिर कहानी हिस्सों में आगे बढ़ती है। मैं डॉयलॉगबाज़ी में थोड़ा कमज़ोर हूं तो मैं खुश था कि मुझे बोलना कम था, मुझे लाइनें नहीं रटनी थीं। लेकिन मुझे लगता है कि यहां सबसे बड़ा चैलेंज था कि ये किरदार हकलाते हुए दर्शकों को तकलीफ न दे। यही नहीं जब गाने की सीक्वेंस आती थी तो वहां भी गाने पर परफॉर्म करने की बजाय लाइनों को डॉयलॉग की तरह ही बोलना था, जो हक़ीक़त के बहुत ज़्यादा करीब है, बिल्कुल असली जैसा।  

अनुपमा: आप कह रहे हैं कि ये सब बहुत जटिल है लेकिन मैं आपको सांवरिया के दिनों से देखती आ रही हूं, जब भी आप परदे पर आते हैं तो ये जगमगा उठता है, इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि फिल्म कितनी डार्क थी। और, मुझे जो समझ आया है वो ये कि आप कभी ऐक्टिंग करते लगते नहीं, जो कि अपने आप में बहुत ही आश्चर्यजनक है। तो इस सबके पीछे कौन सी जटिलताएं होती हैं?

रणबीर: हम जो परदे पर देखते हैं वही सिनेमा का तिलिस्म है, इतने सारे लोग लगे होते हैं आपके किरदार को परदे पर जीवंत बनाने में। मेरा तरीका बेसिक है। दो चीज़ें में हमेशा करता हूं – पहली ये कि डायरेक्टर के दिमाग के साथ शादी कर लो। ये इसलिए ज़रूरी है कि मैं टिपिकल बांद्रा ब्वॉय हूं, ऐश की ज़िंदगी जीता हुआ, पूरी दुनिया घूमा हुआ लेकिन मुझे अपने देश के बारे में अपने लोगों के बारे में वाकई नहीं पता है। तो मुझे हमेशा इन शख्सीयतों को चुराना होता है, इनके अनुभव समझने होते हैं। तो मेरे और मेरे डायरेक्टर के बीच में इस तरह की मोहब्बत का रिश्ता ज़रूरी है। उन्हें मुझसे प्यार करना ज़रूरी है और मुझे उनसे। इसके बाद बारी आती है भरोसे की। छह से आठ महीने की शूटिंग के दौरान ये जो रिश्ता बनता है वह वाकई हैरान करने वाला है। दूसरी बात है फिल्म के कथानक को समझना। एक लेखक और एक निर्देशक इसे बनाते समय कई तरह की चीजों से गुजरता है, ताकि आपको जो बोलना है उस वे गढ़ सकें। तो मेरे ख्याल से, जब आपके बीच प्यार हो चुका होता है, आप कथानक समझ रहे होते हैं तो काम करना आसान हो जाता है। लेकिन, किसी डायरेक्टर से मोहब्बत होना किसी लड़की से मोहब्बत होने से ज़्यादा मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि आप ज़िंदगी भर ये रिश्ता निभाने वाले हैं, ये सिर्फ उस एक प्रोजेक्ट के लिए होता है। पर मुझे इसमें मज़ा आता है। मुझे कुछ बेतुकी और अजीब सी लगने वाली चीज़ों में भी मज़ा आता है – जैसे मैं हर किरदार के लिए एक खास परफ्यूम इस्तेमाल करता हूं।

रणबीर कपूर ने खोले किरदारों में ढलने की अपनी कोशिशों के राज़ और बताया कि उन पर कैसे असर करती है मोहब्बत!, Film Companion
अनुपमा: विद्या बालन ने बताया था कि वह भी ऐसा करती हैं।

रणबीर: मेरी सूंघने की शक्ति बहुत तेज़ है और किसी भी तरह का एहसास – छूना, सूंघना, महसूस करना- अगर ये आपको एक खास किरदार की याद दिला देता है – तो ये काफी मदद करता है। कई बार आप एक साथ दो फिल्में कर रहे होते हैं, मैं वेक अप सिड और अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी एक साथ कर रहा था। जब ये एक ही समय पर हुआ तो इसने मेरी काफी मदद की, हर किरदार के लिए अलग परफ्यूम। जब मैं इसे लगाता हूं और अपनी गाड़ी के बाहर निकलता हूं तो मुझे ये एक खास तरह का नज़रिया देता है। मैं अलग अलग किरदारों के लिए खास तरह के जूते भी पसंद करता हूं। वैसे मैं खामखां बुद्धिजीवी दिखने की कोशिश कर रहा हूं, हम कोई दुनिया बचाने नहीं जा रहे हैं, हम सिर्फ खुद को समझा रहे होते हैं, ‘हां, हम इतनी सारी तैयारियां कर रहे हैं।’

अनुपमा: क्या आपको ये तुरंत समझ आ जाता है कि कौन सा शॉट सही जा नहीं जा रहा है और कौन सा सही हुआ?

रणबीर: मैंने खुद को मॉनिटर (डायरेक्टर के सामने लगा रहने वाला स्क्रीन, जहां वह सीन शूट होने के बाद उसे रिवाइंड करके देखता है) में देखना बंद कर दिया है क्योंकि तब मैं अपने बारे में कुछ ज़्यादा ही सचेत होने लगा था। ऐसा कई बार हुआ है, बीते दस सालों में की गई 15 फिल्मों में मैंने ये समझा है कि जब भी मैंने घर पहुंचने के बाद खुद से कहा, ‘वाह, मैंने क्या खूब काम किया’, वह कभी अच्छा नहीं हुआ।

अनुपमा: आपने एक इंटरव्यू में कहा कि सृजन शक्ति प्रकृति, अकेलेपन और कुर्बानी से आती है। क्या मतलब था आपके हिसाब से इसका?

रणबीर: मेरे ख्याल से अलग थलग रहना हर ऐक्टर के लिए ज़रूरी है। आप अपने भीतर गहराई तक झांक सकते हैं, आप कुछ चीजों के बारे में बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। एक ऐक्टर के तौर पर जब आप कुदरत के करीब होते हैं तो दुनिया अपने आपको आपके ज़रिये पेश करती है। ये मुझे शांत और संतुलित रखती है और इस कायनात में मेरी अपनी कीमत समझने में मुझे मदद करती है। तीसरी चीज़ है बलिदान। ये वो चीज़ है जो मैंने संजय लीला भंसाली जी से सीखी, वह हमेशा मुझमें ये भरते रहे कि आपको अपना निजी जीवन, मौज़ मस्ती और भी बहुत कुछ जो आपको स्टारडम देता, उसे आपको कुर्बान करना होता है क्योंकि ऐसा न करने पर आप अपने किरदार के बारे में जो यकीन और जो सहानुभूति महसूस करना चाहते हैं, आप कर नहीं पाएंगे। मेरे जीवन में चीजों को त्यागने का बड़ा महत्व है। मैं सोचता हूं कि ये बहुत ही नुकसानदायक है कि आप अपने जीवन का कुछ हिस्सा उसके लिए छोड़ रहे हैं जो असल में है ही नहीं लेकिन फिर आपको अपना रास्ता तो खुद ही चुनना होता है।

अनुपमा: रणबीर, आपने किन चीज़ों की कुर्बान दी है?

रणबीर: मैंने अपनी दोस्ती कुर्बानी की, मेरा स्कूल गैंग- मैं उनसे शायद महीने में एक बार मिल पाता हूं, वे सब हफ्ते में तीन-चार बार मिलते हैं। वहां जाओ तो बातों में आप खो जाते हो। वहां हंसने को ही ऐसा बहुत कुछ नया होता है जिसके बारे में आपको पता ही नहीं होता। मैं किसी रोंदू बच्चे जैसा नहीं लगना चाहता। मैंने इसे कुर्बान इसलिए किया क्योंकि ये मेरे लिए फायदेमंद है। ऐसा नहीं कि ज़िंदगी ने मुझे कोई दूसरा विकल्प ही नहीं दिया।

अनुपमा: मैंने एक बार आमिर से पूछा था कि उनके भीतर रचने की ये सहज प्रवृत्ति (क्रिएटिव इंस्टिंक्ट) कहां से आती है। उन्होंने कहा कि वह एक ऐक्टर की तरह नहीं बल्कि एक प्रोड्यूसर की तरह सोचते हैं तो उन्हें पूरी फिल्म का ख़ाका नज़र आता है न कि सिर्फ इसमें अपना हिस्सा। आपकी पसंद के हिसाब से देखें तो कहा जा सकता है ये इस बात से तय होती हैं कि आप सिर्फ अपना हिस्सा देखते हैं?

रणबीर: हो सकता है। लेकिन, सांवरिया से लेकर हर फिल्म जो मैंने तब से की है, मेरी ही पसंद रही है। मैं हर कामयाब फिल्म के लिए ज़िम्मेदार हूं, मैं हर नाकाम फिल्म के लिए ज़िम्मेदार हूं। मेरा स्क्रिप्ट को लेकर कोई तीसरा नज़रिया है ही नहीं, मेरा नज़रिया है बॉक्स ऑफिस, फिल्म अच्छा कारोबार करेगी या नहीं, क्योंकि अगर मैं फिल्म की कथावस्तु या इसके किरदार से खुद को नही जोड़ सकता हूं, तो मैं इसके बारे में कुछ कर पाने की सूरत में ही नहीं होऊंगा। आमिर सर के पास जो हुनर है, वो मेरे पास नहीं है और इसीलिए आज वह वो है जो वह हैं। शायद ये आप अनुभव के साथ सीखते हैं। मुझे नहीं लगता कि बॉम्बे वेल्वेट या जग्गा जासूस या बर्फी या वेक अप सिड एक्सपेरीमेंटल फिल्में थी, मुझे तो यही लगा कि ये सब कमर्शियल फिल्में हैं।

अनुपमा: बेशर्म जैसी फिल्म के बारे में क्या कहेंगे?

रणबीर: हां, बेशर्म मेरे हिसाब से मेरे करियर की इकलौती फिल्म है जो डिजाइन के तौर पर जैसा कि लोग कहते हैं, एक ‘मसाला फिल्म’ थी क्योंकि मैं ऐसी फिल्म करना चाहता था। ये सबसे मुश्किल जॉनर है, आप एक अच्छी कहानी बना सकते हैं, जैसे कि वेक अप सिड या रॉकेट सिंह, और बहुत कम संभावना होती है इस बात की कि आप गलत हों। आप कारोबार के लिहाज से गलत हो सकते हैं लेकिन ऐसे भी तमाम लोग हैं जिन्हें ये फिल्में अच्छी लगीं। शाहरुख खान मुझे बताया करते थे कि उन्हें कभी डीडीएलजे (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे) में दम नहीं लगा, वे हमेशा सोचते थे कि ये बचकानी फिल्म है और देखिए इस फिल्म ने क्या किया। और मैंने रॉकेट सिंह की, और मुझे लगा कि ये अगली मुन्नाभाई होगी। जब मैंने अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी की, तो मुझे लगा कि मेरा काम लग गया, मुझे लगा कि अब मुझे कोई और फिल्म नहीं देगा, मेरा करियर खत्म है। तो किसी के पास इसका फॉर्मूला नहीं, किसी को नहीं पता और यही सिनेमा का तिलिस्म है, क्योंकि अगर सबको ही ये पता होता तो हर कोई खान न होता।

अनुपमा: आपने कहा है कि करियर के अगले दौर में आप बजाय अपनी अभिनय क्षमता दिखाने के दर्शकों का मनोरंजन करने पर ज़्यादा ज़ोर देंगे। क्या ये दो अलग अलग चीजें हैं?

रणबीर: मेरे लिए, हां। जब भी मैं कोई तमाशा या जग्गा जासूस जैसी फिल्म करता हूं तो सबसे पहले मैं अपने किरदार को देख रहा होता हूं कि मैं इनके ज़रिये क्या कर सकता हूं और जरूरी नहीं कि पूरा ख़ाका मेरे दिमाग में हो। आपको ये समझना होता है आपकी फिल्म का महत्व क्या है, ये किसके लिए है, इसका बजट कितना है, आप कितना पैसा ले रहे हैं। फिल्में बनाना बहुत खर्चीला माध्यम है और आप सिर्फ इसलिए चीजें नहीं कर सकते क्योंकि ये प्रोजेक्ट आपके दिल के बहुत करीब है। राजू सर (राजकुमार हिरानी) के भीतर दर्शकों का मनोरंजन करने की दिली इच्छा रहती है। वह उन्हें बोर नहीं करना चाहते, वह उन पर कोई नैतिक विचार नहीं थोपना चाहते। वह बस आपको हंसाना और रुलाना चाहते हैं। फिल्में मनोरंजन का साधन हैं, एक बार ये समझ आता है तो आपकी पसंदें भी बदल जाती है। और, मैं अब भी ज़ोर लगा रहा हूं…मैं राजकुमार हिरानी की फिल्म कर रहा हूं। मैंने इसे नहीं चुना है, उन्होंने मुझे चुना है। तो अगर संजू एक बड़ी कमर्शियल कामयाबी होती है, मैं वाकई में इसका क्रेडिट नहीं ले सकता कि ये मेरी पसंद है।

अनुपमा: मैं एक डायरेक्टर से बात कर रही थी जिन्होंने बताया कि आप ऋषि कपूर का बेटा होने, एक राजकुमार, होने का बोझ लेकर चलते हैं। आप दो हीरो वाली फिल्म नहीं करते हैं, आपके भीतर किरदारों को लेकर उतनी भूख भी नहीं है जितनी रनवीर जैसों में हैं। क्या ये सच है?

रणबीर: बिल्कुल नहीं, मेरे पास इस बात की सुख सुविधा है कि मुझे खाना खाने के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं है और मेरे सिर पर छत भी है, लेकिन मैं फिल्मों को लेकर हमेशा बहुत जुनूनी रहा हूं। जब आप एक फिल्मी परिवार से आते हैं तो अक्सर आपकी कड़ी मेहनत और कामयाबी का नज़रिया कहीं न कहीं आपसे छीन लिया जाता है। पिछले कुछ सालों में मैंने बहुत कड़ी मेहनत की है और मैंने जो कुछ भी किया है उसमें अपना सब कुछ दिया, मैंने कभी अपने काम को ऐंवई नहीं लिया। तो मेरे भीतर भूख है। ये दो या चार हीरो वाली बात मेरे लिए मायने नहीं रखती है। मैंने एक फिल्म की थी राजनीति जिसमें कितने सारे हीरो थे। मैं डरा हुआ नहीं हूं। मुझे कभी दो हीरो वाली ऐसी फिल्म ऑफर ही नहीं हुई जो मुझे पसंद आई हो और दूसरे को भी।

अनुपमा: लेकिन आपने कहा कि आप फिल्म के लिए ऑडीशन नहीं दे सकते तो आप कभी फिल्म के लिए ऑडीशन नहीं देंगे?

रणबीर: मुझे नहीं लगता कि मुझे अपने आप पर इतना भरोसा है। शुक्र है कि आज मेरे पास इतना काम है दिखाने को कि मुझे ऑडीशन की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आप मुझे हॉलीवुड भेज दो और कहो कि इस फिल्म के लिए ऑडीशन करना है तो मुझे नहीं पता कि मैं ये कर पाऊंगा कि नहीं।

अनुपमा: लेकिन आपके भीतर ज़बर्दस्त प्रतिभा है।

रणबीर: मुझे ऐसा नहीं लगता, मैं खुद को ज़बर्दस्त प्रतिभा का धनी नहीं समझता और मुझे हर फिल्म के लिए कड़ी मेहनत करनी ही है, मुझे अपनी कमज़ोरियां पता है। मुझे पता है कि कहां मैं बहुत खराब कर सकता हूं और अपनी कुछ फिल्मों में मैंने खराब काम किया भी है, जहां शायद मैंने अपना सिर्फ 80 फीसदी दिया, पूरा सौ फीसदी नहीं।

अनुपमा: आपने कहां खराब काम किया है?

रणबीर:  जैसे कि बेशरम और अनजाना अनजानी। मैं उतना ही अच्छा हूं जितनी मेरी फिल्म है, अगर मेरा डायरेक्टर अच्छा है तो मैं अच्छा हूं। मैं इस भुलावे में कभी नहीं रहता कि कोई फिल्म मेरी वजह से चलती है। ऱॉकस्टार अगर चली और अगर मेरी परफॉरमेंस लोगों को अच्छी लगी तो ये इम्तियाज अली की वजह से हुआ। अगर मैं वह फिल्म डायरेक्ट करता तो ये खराब फिल्म होती। मैं डरा हुआ रहता हूं, हर रोज़ मैं सेट पर जाता हूं, मैं अपनी वैन बैठा हूं, अपनी लाइनें याद करने की कोशिश कर रहा हूं और मुझे समझ नहीं आता और मेरे भीतर बेचैनी होने लगती है कि मैं अपना शॉट ढंग से कर पाऊंगा भी कि नहीं, क्या मैं अपने डायरेक्टर को अपनी ऐक्टिंग से सरप्राइज कर पाऊंगा। जो भी मैंने आज की तारीख तक हासिल किया है, उससे मैं खुश नहीं हूं और मुझे अभी बहुत कुछ करना है। मुझे लगता है ये ललक बहुत ज़रूरी है, ये डर ही ये ललक, ये लालसा पैदा करता है। और मेरे ख्याल से अगर ये खत्म हो गई तो एक ऐक्टर के तौर पर मैं भी ख़त्म हो जाऊंगा।

रणबीर कपूर ने खोले किरदारों में ढलने की अपनी कोशिशों के राज़ और बताया कि उन पर कैसे असर करती है मोहब्बत!, Film Companion

अनुपमा: किसी शॉट के लिए आपने अब तक सबसे ज़्यादा कितने टेक्स (उसी सीन को फिर से करना) दिए हैं?

रणबीर: मैंने संजय लीला भंसाली के साथ शुरूआत की है और 45 टेक्स से कम में वह कुछ करते नहीं है। अगर मुझे सिर्फ सिर भी घुमाना है तो मुझे तकरीबन 50 टेक्स देने पड़ेंगे। जबसे तेरे नैना गाने में, मुझे एक खास अंदाज़ में पीछे जाना था और टॉवेल को ज़मीन पर गिरना था और मेरे पैर दिख रहे थे और ये एक शॉट था जिसमें मुझे खड़ा होना था और गाना था। वह इस बात को लेकर बहुत पक्के हैं कि आपने कौन सी बीट पकड़ी, वह बहुत ही म्यूजिकल डायरेक्टर हैं। एक दिन मैंने 45 से 50 टेक्स किए और मेरी पीठ बहुत दुख रही थी तो उन्होंने दया दिखाते हुए कहा, ‘ओके, मैं मैनेज कर लूंगा।’ अगले दिन वह बोले जो उन्हें चाहिए था वो मिला नहीं है और मुझे 70 टेक्स और करने पड़े। तो अब जब कोई आठ टेक्स भी लेता है, तो ये कुछ नहीं है।

अनुपमा: आपने जीक्यू (अग्रेजी की एक लाइफस्टाइल पत्रिका) के इंटरव्यू में कहा कि जिन महिलाओं के साथ मैंने वक़्त बिताया, मैंने जो किरदार किए, जो किताबें मैंने पढ़ीं, उसके सिवा मैं कुछ नहीं हूं। क्या कहना चाहते थे आप?

रणबीर: आज इन लोगों की सारी ऊर्जा मेरे कल में जुड़ जाएगी। बहुत कुछ है ऐसा जो एक शख्स के रूप में एक ऐक्टर के रूप में आपसे जुड़ जाता है।

अनुपमा: जैसा कि आप जानते हैं कि लिंग समानता आज की तारीख़ में एक अहम मुद्दा है और मुझे ये पूछना है कि आप लव रंजन के साथ एक फिल्म कर रहे हैं, जिनकी फिल्में कामयाब तो हैं लेकिन ये बहुत लिंगवादी हैं और ये महिलाओं के सम्मान के साथ निचले दर्जे की अभद्रता करती हैं। क्या आपको इन सारी बातों से कोई परेशानी नहीं है?

रणबीर: मैं उन फिल्मों का हिस्सा नहीं रहा हूं। मैं उन बातों को लेकर सचेत रहता हूं जो मैं करता हूं और इस बात को निश्चित करता हूं कि यह किसी समाज को नीचा नहीं दिखाए या ऐसा कुछ जो अच्छा नहीं है। ये समझते हुए कि मैं किस जगह हूं, मुझे सचेत रहना ही है, मुझे सजग रहना ही है, मुझे उन खास तरह के संस्कारों की नुमाइंदगी करनी है, जिन्हें मैं प्रकट करता हूं। लव रंजन के साथ जो मैं फिल्म कर रहा हूं वह वैसी नहीं है।

अनुपमा: बेनेडिक्ट कम्बरबैच ने एक इंटरव्यू में कहा है कि वह एक फिल्म तभी साइन करते हैं जब उन्हें ये पता हो जाता है कि फिल्म की ऐक्ट्रेस को कितना पैसा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा: हम सब लोगों के लिए फीस की ये दूरी समझना बहुत ज़रूरी है और हमें जानबूझकर ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि ये ठीक हो सके। मेरे ख्याल से लोगों को ये जानना ज़रूरी है कि पुरुष इन बातों का समर्थन करते हैं। मुझे लगता है ये मेरी पोजीशन की और मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि मैं इसके बारे में समझ की मांग कर सकूं और ये शुरू होती है पारदर्शिता से। क्या आपको लगता है कि हिंदी सिनेमा में पुरुष ये समझते है कि ये निश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है ताकि हम एक बेहतर और बराबरी का काम करने का माहौल बना सकें।

रणबीर: मुझे लगता है कि किसी को ये करना होगा, अगर एक इंसान ये करता है तो इसका असर दूर तक होगा। लेकिन हमारी इंडस्ट्री में, इनकम टैक्स के चक्कर में कोई भी नहीं बताता कि उसे कितना पैसा मिल रहा है। लेकिन दीपिका या कटरीना या प्रियंका, ये वहां तक पहुंच चुकी हैं, ऐसा नहीं है कि वे किसी तरह मुझसे कम पैसा पा रही हैं। आज की तारीख में अपनी मार्केट वैल्यू को लेकर हर कोई चौकन्ना रहता है। ये उन चंद इंडस्ट्रीज में से है जो बाज़ार से इतनी जुड़ी है कि अगर आपकी फिल्में चलती हैं तो आपका अच्छा पैसा मिलेगा। अगर मैं आज किसी प्रोजेक्ट को कर रहा हूं और मैं कहूं, ‘ओके, फिल्म में दीपिका और मैं हूं। और दीपिका बड़ी या मुझसे बड़ी स्टार हैं तो बराबरी होनी ही चाहिए, उन्हें बजट का बड़ा हिस्सा मिलेगा ही।’ किसी को तो ये करना ही है।

अनुपमा: और ये कौन है?

रणबीर: देखते हैं।

अनुपमा: एक ऐक्टर के तौर पर ऐसा क्या है जो आपको असहज करता है? क्या ऐसी कोई लक्ष्मणरेखा खींची है आपने जो आप लांघना नहीं चाहेंगे?

रणबीर: मुझे नहीं लगता ऐसा, मैंने अपनी पहली ही फिल्म में तौलिया गिराया, और बचा ही क्या? शारीरिक तौर पर नंगा होना मुश्किल नहीं है, भावुकता में नंगा होना बहुत मुश्किल है – किसी एक खास लम्हे के साथ जुड़े रह जाना, ऐसा लगे कि ये सच है। चूंकि फिल्में एक कलाकार के तौर पर आप की सच्ची नुमाइंदगी करती हैं, तो आपको इसके लिए सजग रहना पड़ता है कि आप किस बात का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन इसके अलावा, अपना काम अच्छा करने के लिए जो भी मुझसे बन पड़ेगा, शारीरिक तौर पर, भावकुता के स्तर पर, मैं करूंगा।

अनुपमा: राजीव मसंद के साथ एक इंटरव्यू में आपने गहराई से, जुनूनी तौर पर और पागलों की तरह प्यार करने के बाद सही तरीके से तीन बच्चों का पिता बनने की बात कही है। लेकिन, आप तो प्यार में बार बार पड़ते हैं। क्या इससे आपकी कला में कोई जटिलता नहीं आती?

रणबीर: जब आप प्यार में पड़ते हैं तो सब कुछ महान से नीचे नहीं होता। पानी भी शरबत लगता है और आप उमा थर्मन दिखती हैं। आपको बहुत अच्छा लगता है तो कौन है ऐसा जो प्यार में नहीं पड़ना चाहता?

अनुपमा: लेकिन एक ऐक्टर के तौर पर ये आप पर क्या असर डालता है?

रणबीर: एक इंसान के तौर पर ये मुझ पर वाकई असर डालता है। ऐक्टिंग मेरा पेशा है, लेकिन मुझे अपने बारे में अच्छा लगता है, उस दिन के बारे में अच्छा लगता है, ऐसा केवल इसलिए होता है क्योंकि जीवन महान है और प्यार ही जीवन को महान बनाता है।

अनुपमा: तो अब आप किसी ऐसे सीन के बारे में बता सकते हैं और कह सकते हैं कि जब मैं ये कर रहा था तो मैं वाकई बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।

रणबीर: नहीं, मैं बता नहीं पाऊंगा कि उस खास दिन मैं कैसा महसूस कर रहा था लेकिन मैं ये बता सकता हूं कि परदे पर ये बहुत ही खुशनुमा लम्हा है। मेरी याददाश्त कमज़ोर है। मुझे याद नहीं कि जब मैं 15 साल का था तो क्या था और ऐसा लगता है कि उसके पहले की पूरी ज़िंदगी ही मेरी याददाश्त से साफ कर दी गई है। मैं सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहा था तो मैं जर्मनी गया जहां कान में इंजेक्शन लगाते हैं और मुझे लगता है कि इसने कुछ हद तक मेरी याददाश्त के साथ गड़बड़ी की है।

अनुपमा: तो आपने सिगरेट पीना छोड़ दिया है?

रणबीर: ऑफीशियली, हां।

अनुपमा: जब राजू (हिरानी) और विनोद (चोपड़ा) आपके डैडी को संजू का प्रोमो दिखा रहे थे तब मैं वहीं थी और उनकी आंखों में आंसू भर आए थे। कैसा लगा आपको जब आपने ये देखा? कि आपके काम को देखकर वाकई आपके पिता की आंखों में खुशी के आंसू आ गए?

रणबीर: वह कभी खुल कर इस बात का इज़हार नहीं करते कि उन्हें मेरा काम कैसा लगा। आमतौर पर वह रिलीज़ से तीन या चार दिन पहले फिल्म देखते हैं और मैं तब बहुत तनाव में रहता हूं क्योंकि वह हद दर्जे के ईमानदार इंसान है। एक ऐक्टर और एक कमाल के ऐक्टर होने के तौर पर, वह हमेशा किसी बात की अच्छाई ही देखते हैं। उन्होंने (रॉकस्टार देखने के बाद) मुझसे पूछा, “वो एंड में  हीरोइन मर गई कि वापस आ गई?” और मैंने कहा कि नहीं वह उसकी आत्मा होती है जो वापस आती है और वह बोले, “या या ओके, बाय।” जब उन्होंने बर्फी देखी तो उन्होंने फिल्म की रिलीज़ से दो दिन पहले फोन किया और बोले, “या, तू एक्टिंग तो ठीक ठाक कर लेता है, लेकिन ये आर्टी फिल्में करना बंद कर।” और फोन रख दिया। वह बहुत ही सख़्त आलोचक हैं तो जब राजू ने मुझे ये वीडियो भेजा तो मुझे वाकई बहुत अच्छा लगा, जब आपके माता-पिता आपके काम पर फ़ख्र महसूस करने लगें तो आपको और क्या चाहिए। लेकिन, उस वीडियो के बाद, फिर कभी उन्होंने इसका ज़िक्र नहीं किया।

अनुपमा: बीते साल, आपने फिल्मों में एक दशक पूरा कर लिया। अगर आपको तब के रणबीर को कुछ बताना हो कि कामयाबी और नाकामी को कैसे संभालते हैं तो आपकी वह ख्वाहिश क्या होगी?

रणबीर: मेरे ख्याल से ये एक अद्भुत यात्रा रही है और मैं चाहूंगा कि तब का रणबीर इसकी फिर से खोज करे क्योंकि ये वाकई कमाल का सफर रहा है। चूंकि मैं एक फिल्मी परिवार में पला बढ़ा तो मैं ये दुनिया जानता हूं। मैं जानता हूं कि सफलता क्या होती है, मैं जानता हूं कि विफलता क्या होती है। मैं जानता हूं कि कामयाबी कैसे आपका दिमाग खराब कर देती है और नाकामी आपके दिल पर कैसा असर डालती है। तो इस दुनिया में एक पेशेवर के तौर पर आने से पहले मैं कहीं न कहीं इस सबके बारे में अच्छी तरह से तैयार था। और, लोगों का एहसानमंद होना ऐसी चीज़ है तो मैंने इन दस सालों में सीखी है। यही बात कि मैं आज इन सब लोगों के सामने बैठा हूं और अपनी कला, अपने जीवन के बारे में बात कर रहा हूं, इसका श्रेय मैं खुद को देता हूं। इसलिए नहीं कि मैं एक रईस परिवार में पैदा हुआ बल्कि इसलिए कि मैंने यहां तक आने के लिए कड़ी मेहनत की है और मेरे मन में इस सबके लिए असीम आभार है।

Adapted by Pankaj Shukla, Consulting Editor 

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