पंकज त्रिपाठी : ऐक्टिंग छूटी तो खेती करनी पड़ेगी

अनुपमा चोपड़ा से ख़ास बात चीत में अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने बताया कि एक्टिंग छूटी तो खेती करनी पड़ेगी और उन्हें किसी की कामयाबी से फर्क नहीं पड़ता
पंकज त्रिपाठी : ऐक्टिंग छूटी तो खेती करनी पड़ेगी

पंकज आपने फिल्म कम्पैनियन के ही एक इंटरव्यू में कहा था, समय फलों का होता है, फसलों का होता है, एक कलाकार का कैसे कोई समय हो सकता है। लेकिन अब आपको नहीं लगता इतने सालों बाद, इतनी मेहनत के बाद जब आपको इतनी सफलता मिल गयी है तो अब आपका समय आ गया है?

हाँ… अब मुझे लगता है। शायद वो इंटरव्यू दो-एक महीने पहले हुआ था।

जी। स्त्री से पहले

हाँ, स्त्री के पहले। तो मैंने बोला था कि यार समय कलाकार का कैसे हो सकता है। समय तो सब्जी-फलों का होता है कि भई ये इस महीने में होगी। लेकिन अब लग रहा है। मैं इतना परेशान हूँ ना, तीन दिन के लिए मुम्बई आया हूँ और मैं ऐसे कोमा वाली स्थिति में हूँ, कि मुझे किस-किस से मिलना है। कहाँ-कहाँ जाना है। तो इतने सारे ऑफर हैं, इतना सारा लोड है काम का, यहाँ इनसे मिलो उनसे मिलो। तो मुझे लग रहा है समय अ गया है अब। इतनी व्यस्तता मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।

पर क्या ये मज़ेदार नहीं हैं?

हाँ अच्छा भी है। अच्छा है, लेकिन मैं थोड़ा सुकून में रहने वाला आदमी हूँ। मुझे ना इतनी भाग दौड़ और इतना कट टू कट घटने के हिसाब से चलना पसंद नहीं है।

सफलता की कीमत!

हाँ हो सकता है, कह सकते हैं।

पंकज आप अपने आप को एक जागरूक कलाकार कहते हैं। इसका क्या मतलब है?

जो समाज में हो रहा हैं न, इस वक़्त। चाहे वो सामाजिक स्तर पर हो, राजनैतिक स्तर पर, आर्थिक स्तर पर तो बतौर अभिनेता मुझे पता होना चाहिए। मेरे को भूगोल में बहुत इंटरेस्ट है। जियोग्राफी में! मैं हिंदी मीडियम का हूँ तो कुछ भारी-भारी हिंदी के शब्द प्रयोग करूँगा।

हाँ, तो वो आप बता दीजिएगा,समझा दीजिएगा।  

जी, तो वो मैं समझा दुंगा आपको। भूगोल मतलब जियोग्राफी। तो मुझे लगता है अभिनेता को न देश और काल, देश मतलब कंट्री और काल मतलब ये समय, उसका अनुमान होना चाहिए। और क्या घटित हो रहा है हमारे आस-पास मिडिल क्लास में क्या चल रहा है, अपर क्लास में क्या चल रहा है, लोअर क्लास में। तो वो जागरूक रहने से ना किसी तरह हम अपने किरदारों को ज़्यादा समकालीन रखेंगे। मैं चाहता हूँ कि मेरे किरदार न जागरूक रहें। वो भी अवेयर लोग रहें कि भई हमारे समाज में क्या चल रहा है पता है हमें।

मगर पंकज जी मुश्किल नहीं हो जाता? क्यूँकी जितना आप सफल होते हो, उतना ही आप जो आम ज़िंदगी है उससे और से कटते जाते हो। तो फिर ये कैसे? जागरूक कैसे रहते हैं?

पढ़ने से। एक तो बड़ा मुश्किल है वो उस तरह से कटना मेरे लिए। मुझे पता है कि मैं अभिनेता बनने आया कि लोग मुझे जाने या कोई भी अभिनेता जो बनने आता है तो उसका लगता है कि दुनिया उसको जाने। लेकिन जिस दिन दुनिया उसको जान ने लगती है तो वो काले रंग की कांच लगा लेता है, और काला चश्मा पहन लेता है। और आस पास भी।

रात को भी!

जी, रात को भी। तो मुझे लगता है कि यार हम इसीलिए तो आये थे कि लोग जानें, जब लोग जानने लगे तो पर्दा क्यों करना। हाँ, उसकी दूसरी वजह भी है कि कई जगह आपको अनचाही भीड़ आ जाएगी, या परेशानियां होंगी, सुरक्षा के कारण हैं। और दिक्कत नहीं होती है मैं संभाल लेता हूँ। जैसे अभी मैं भरतपुर गया था। मुझे जाना था और मैं गया। पूरा दिन जंगल में बीवी बच्चों के साथ घूमता रहा। हम थे और दो गाइड थे। कल आगरा गए ताजमहल देखने। मैं कोई किसी को बताकर नहीं गया था। अचानक वहां सीआईएसएफ के लोग गेट पर मिले कि अरे सर आप आये हैं। तो मैंने कहा हाँ। तो उन्होंने बोला नहीं-नहीं आप ऐसे अकेले मत जाओ। फिर उन्होंने एक बन्दे को साथ कर दिया। तो वही हुआ कि कुछ जगह तस्वीर खिचवानी पड़ी और कुछ जगह नहीं भी खिचवानी पड़ी। तो हो जाता है मैनेज। मुझे दिक्कत नहीं होती। और एक और मजेदार चीज़ मैं आपको बता दूं। मुझे, सवाल के बीच में भूल जाता हूँ कि सवाल क्या था। तो मैं जवाब कुछ और देने लगता हूँ।कोई परेशानी नहीं है।

और आप पहले अभिनेता हैं जो अकेले (बिना किसी असिस्टेंट या टीम के) आये हैं। कोई साथ में नहीं है। कोई मेनेजर, सोशल मीडिया, कोई भी नहीं है । ऐसा क्यूँ?

ऐसा यूँ कि अकेले ही आये थे। अकेले ही जाना है। और इस बात की अनुभूति बड़ी अच्छी तरीक़े से है। तो हो जाता है सब। मैं अपना खुद का सारा काम कर लेता हूँ। मैं अभी दिन में घर पे खाना बनाक आया हूँ अपनी बीवी और बेटी के लिए।


हाँ मैंने सुना।आप बहुत अच्छे कुक हैं।

हाँ मैं अच्छा कुक हूँ। बहुत अच्छा तो नहीं हूँ, बहुत ही सिंपल बनाता हूँ। तो आज पत्नी बोली कि तुम बनाओ मेरे लये। तो मैं उनके लिए करेला बनाया और फिर मैं फिर, तब इधर आया।

आप अक्सर कुकिंग करते हैं?

हाँ अक्सर, अक्सर जब रहूँगा। मुझे मज़ा आता है कुकिंग में। और कुकिंग और एक्टिंग बड़ा एक जैसा काम लगता है मेरे को।

कैसे?

मात्राओं का ज्ञान है ना, मात्राओं मतलब अमाउंट। हाँ कितना डालना है।जी कितना डालना है, कि थोड़ी सी अमाउंट बढ़ गयी तो ओवेरएक्टिंग लोग बोलते हैं। वैसे ही कुकिंग ज़्यादा हो गया तो ओवर कुक्ड बोलते हैं। तो हल्दी और नमक जितने का अमाउंट है ना। वैसे ही मात्रा एक्टिंग में पता होनी चाहिए। हालांकि बहुत मुश्किल है कहना, ये बात मैं कह रहा हूँ। मुझे भी कई बार नहीं पता चलता है, कि फ्लो में हम थोड़े ज़्यादा कर जाते हैं। अगर ऑडियंस अच्छी मिल गयी और कुछ ज़्यादा ही हंसने लगे। तो अभिनेता उत्साह में कुछ ज्यादा ही कर देता है, अब इनको और हंसाऊंगा।

अच्छा वो स्त्री में वो आधार कार्ड वाली लाइन आपकी है?

हाँ वो बिल्कुल मेरी है।

वो आपने डाली थी।

हाँ, वो आधार। वो एक जगह मैं बोलता हूँ, 'फर्स्ट टाइम देखा तुझे लव हो गया। सेकंड टाइम में सब हो गया। कहाँ जा रही है हमारी पीढ़ी।' ये गाना मेरे दिमाग में बहुत दिन से अटका हुआ था। मैं दसवीं-ग्याहरवीं में था तो ये फिल्म आई थी। रोनित सर थे उसमें 'ये अक्खा इंडिया जानता है।' क्या नाम था फिल्म का, हाँ, 'जान तेरे नाम'। तो हम तो यही फिल्मी देखकर पले बढ़े हैं। नव्वे में जिन फिल्मों को देखकर रोना आता था अब उन फिल्मों को देखकर हंसना आता है।

सही कहा।

जी हंसना आता है, यार हम इस सीन पर रो रहे थे। मतलब यार हम कितने मतलब, कैसे मूर्ख आदमी थे। तो… आधार वाली लाइन इसलिए कि वो सवाल कर रहे हैं-कर रहे हैं और वो सीन का मतलब अमर ने बोला कि सर ये सीन मैं इसलिये डाल रहा हूँ कि दर्शक जो सवाल करेंगे तो मैं एक सीन में वो आपके मुह से बुलवा देना चाहता हूँ। उसका जवाब हमने ही दे दिया कि वो स्त्री है। वो ऐसे नहीं करती है। साड़ी मत पहनो, ये मत करो वो मत करो। तो मुझे लगा ये जानकारी वाला सीन है। हमने कहा अमर जो लोगों के सवाल-जवाब होंगे तो हम इस सीन में डाल देंगे।

जैसे कि सबका नाम कैसे पता है? तो था कि अरे वो भूत है तो उसको पता है। तो मैंने बोला नहीं-नहीं अरे इसको, फिर तुरंत मैंने आधर वाली लाइन में बोला कि अमर मैं ये कर देता हूं। मुझे लगता है कि शायद मैंने बताया भी नहीं था, टेक में ही बोल दिया था। आधार लिंक है सबका उसके पास। क्यूंकि मेरे मोबाइल में लगभग दस दफे मेसेज आया बैंक से, यहाँ से, वहां से, कि आधार लिंक करो। आधार लिंक करो। मुझे लगा कि जितने मोबाइल हैं या जितने लोगों के पास बैंक अकाउंट हैं उन्हें ऐसे मेसेज आये होंगे। तो ये तो फिर इसी वक़्त की बात है कि हो सकता है कि चुड़ैल के पास भी ऐसे मेसेज आते हो।

बहुत जानकार चुड़ैल है।

हाँ-हाँ वो एक जगह बोलते हैं वो लाइन 'नए भारत की चुड़ैल है।' तो मुझे लगा फिर तो वो आधार उसकी डिटेल जानती होगी।
आपको पता है, महमूद साहब के लिए ये कहा जाता था, कि वो इतने कामयाब हो गये एक वक़्त आया। और ज़ाहिर है वो इतने हुनरमंद थे कि जो हीरोज थे वो कहने लगे कि इनको मत लो आप फिल्म में। और किसी को भी आप ले लो। आप जानते हैं, क्यूंकि उस वक़्त ये बहुत साफ़ होता था कि ये हीरो है, ये कॉमेडियन है, ये विलिन है ये हीरोइन है।

ये कभी आपके साथ हुआ है कि लोग अब थोड़ा सा कतरा रहे हैं, कि अब आप इतने सीन चुराने वाले बन गए हैं?

नहीं-नहीं… मुझे जिस दिन पता चलेगा कि कतरा रहे हैं, मैं तुरंत एवरेज एक्टिंग करने लगुंगा। दुकान भी तो चलानी है न।


दूसरा पहलू…
हाँ, कि जब बेहतरीन अभिनय से लगे कि धंधे पर असर हो रहा है तो थोड़ा एवरेज कर लो। अरे मेरा व्यवसाय यही है। सिवाय अभिनय के कुछ नहीं है मेरे पास। एक्टिंग की दुकान बंद हो जाये तो फिर मुझे गाँव जाना पड़ जाएगा वापिस खेती करने। नहीं-नहीं वो तो नहीं होना चाहिए।

तो नहीं ऐसा नहीं होगा। लेकिन, क्यूंकि मेरा मकसद है न कि मैं कोई भी किरदार करूँ मेरा सिर्फ और सिर्फ इरादा इतना ही होता है कि ये पूरा सीन जो हैं न, जो लेखक और जो निर्देशक हमारे कहना चाह रहे हैं इसको और बेहतर तरीके से हम दर्शकों तक पहुंचा दें। हमारा काम वही है। किसी ने विचार किया सोचा, किसी ने उसको थोड़ा ठीक से बयान किया, हम पहुंचा रहे हैं। तो बस, बाकी ईमानदारी से तो मेरा ये बहुत मज़बूती से मानना है कोई अभिनेता फ्रेम में पीछे भी खड़ा है न आउट फोकस तो, मुझे भट्ट साहब ने एक दिन फोन किया, मेरे पास तो उनका कोई नंबर-वम्बर नहीं था, तो मैंने देखा अरे भट्ट, महेश भट्ट। तो मैंने सोचा वही होंगे क्या, पता नहीं कौन होंगे। खीर बात हुई। उन्होंने बोला कि यार, 'न्यूटन' के बारे में, कि आउट फोकस में भी ना तू खरा था। आम तौर अभिनेता को मालूम होता है कि अच्छा हाँ मैं आउट फोकस पर हूँ, फोकस पर देख लेता है वो लाइट पर। वो लाइट आ गयी है ना नापने की, तो जिसके चेहरे पर लाइट जाती है बाकी एक्टर्स को समझ आ जाता है कि 'फोकस उसपर है,तो चलो हम लोग हैं'।

तो मैं इसपर नहीं जाता हूँ कि फोकस किस पर है। या वाइड में भी मुझे पता है मैं बहुत दूर खड़ा हूँ। मैं अपने काम ईमानदारी से करता हूँ। तो मुझे लगता है कि अगर आप ट्रुथफुल रहोगे ना तो नोटिस हो जाता है। कहीं भी आदमी खड़ा रहे ईमानदारी से। वक़्त लगता है, लेकिन हो सकता है।

ये बिलकुल सच बात है। सच में। अच्छा मैंने नवाज़ भाई से पूछा था कि कभी उन्हें गुस्सा आता है कि यहाँ पर बहुत सारे अभिनेता हैं जो कम काबिल हैं, जिनके पास ये काबिलियत नहीं है। लेकिन बहुत कामयाब हैं, बहुत पैसा है, बहुत प्रसिद्ध हैं। तो उन्होनें मुझे कहा कि पहले आता था अब नहीं आता।

तो आपको कभी गुस्सा आता है?

मुझे पहले भी नहीं आता था अभी भी नहीं आता। हाँ, ज़ाहिर है मतलब मैं भी इन्सान ही हूँ, तो कोई देव भूमि से आया हुआ आदमी तो हूँ नहीं। सारी भावनाएं मेरे पास भी हैं, ईर्ष्या है, सबकुछ है। मुझे भी लगता था कि यार ये क्या है? मतलब कैसे है, ऐसा क्यूँ है? हम जहाँ भीई कुछ देखते हैं न कि ऊंच-नीच, कि दुनिया बराबर क्यूँ नहीं है। लेकिन दुनिया है फिर। सबकुछ बराबर नहीं होगा। कई मशहूर, कामयाब अभिनेता हैं जो अभिनय के मामले में कम होंगे, बाकी उनके पास दूसरे दस और हुनर होंगे जिसकी वजह से लोग पसंद करते हैं। अगर जनता किसी को  पसंद करती है तो उसमें कुछ बात तो होगी। तो जो उसकी दूसरी बात है उसमें वो सीखने लायक है। शुरुआत में तो हमें लगा था कि हम तो एक्टिंग सीख कर आये हैं। अब बेचना भी है खुद को, ये तो हमें मालूम ही नहीं था। हमें तो ड्रामा स्कूल ने एक्टिंग सिखा दी। मोटिवेशन(प्रेरणा) चाहिए, ट्रुथ(सच्चाई) चाहिए, रियलिज्म(खरापन) चाहिए। अब इधर झोला में मोटिवेशन, ट्रुथ और रियलिज्म तीनो लेकर निकले आराम नगर में। कोई पूछ ही नहीं रहा है।

"हाँ क्या है?"
तो मैं "सर ट्रुथ लाया हूँ"
बोले "इधर ट्रुथ रख लो अपने पास। ट्रुथ लेकर जाओ, विरार में ट्रुथ की पूछ होती है।"
तो एक वो भी हुनर आना चाहिए।
मार्केटिंग बहुत बड़ी चीज़ है।

हाँ वो अभी भी मैं नहीं समझ पाया। सीखने का प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन मुझे पता है कि अंत में मार्केटिंग सब कुछ होने के साथ-साथ आपके पास आपकी क्राफ्ट भी होनी चाहिए। तभी बाकी चीज़ें काम करेंगी।

आपकी जो एक्टिंग है वो आपकी मार्केटिंग है। आपको कोई ज़रुरत नहीं है सीखने की।हाँ सच कहें तो वो भी ठीक है। मुझे कल मिले दिल्ली एअरपोर्ट पर एक सज्जन। तो उन्हे देखकर उनके बातचीत से लग रहा था कि कोई बहुत बड़े आदमी होंगे। इतना नर्मी से बोले ना 'कीप एंटरटेनिंग अस'(इसी तरह हमारा मनोरंजन करते रहिये), मुझे लगा कि मैं रो दूंगा अभी थोड़ी देर में अब तब बहुत अच्छा लगता है जब कोई ऐसी बात कहे और मुड़के चला जाये, फोटो भी ना ले। तो लगता है ये बाँदा सही था यार, जेन्युइन (सच्चा) था। अक्सर कई लोग आ जाते हैं, फोटो-फोटो एक फोटो। तो कई बार मैं चिढ़ा रहूँगा, बोलूँगा 'मेरा नाम पता है आपको?' तो कहेंगे 'नहीं सर, पर बहुत कमाल करते हो आप।' मैंने बोला फिर काहेको फोटो ले रहे हो। फोटो लेकर फिर बाद में नाम पता करोगे भाई। तो कई बार लोग बोलते हैं हमें आपकी एक्टिंग पसंद है न, आपके नाम से क्या लेना देना। फिर मुझे लगता है कि हाँ। फिर वो बताते हैं कि आपका किरदार है 'सुल्तान', आप सुलतान का रोल किये थे। फिर मैं सोचता हूँ कि हाँ नाम तो इसको याद है।

और आपका तो वही लक्ष्य और चाहत है ना कि नाम याद रहने चाहिए।हाँ किरदार याद रहने चाहिए। फिर हम तो निकल जाएंगे कुछ सालों बाद। किरदार तो रहेंगे, पीढ़ियाँ देखेंगी उनको।

(Translated from English by Mahvish Razvi)

Related Stories

No stories found.
Film Companion, Movie reviews, Celebrity Interviews, New Films Trailer, Web Series
www.filmcompanion.in