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इस हफ्ते सलमान खान को सिनेमा में आए 30 साल हो गए। 26 अगस्त 1988 को उन्होंने विकी भंडारी के किरदार के साथ परदे पर डेब्यू किया था। विकी यानी फिल्म बीवी हो तो ऐसी का वो डिस्को डांसर जिसकी पहले झलक हमें परदे पर मिलती हैं बेतहाशा नाचते हुए। सुबह हो चुकी है और विकी ने अब तक चाय भी नहीं पी है। लेकिन अपने पूरे कमरे में वह खरगोश की तरह उछल रहा है और खुद को नाचने से रोक नहीं पा रहा। पूरा चेहरा लंबी लंबी ज़ुल्फों के ढका हुआ। नाच देखकर लगता है कि ऐक्टिंग से ज़्यादा बढ़िया तो ये लड़का ये करता है। मुझे नहीं लगता जिस किसी ने भी ये फिल्म देखी होगी उसने सोचा भी होगा कि यही लड़का 30 साल बाद इतनी बड़ी शख्सियत का मालिक बन जाएगा।

साल दर साल, मुझे सलमान के साथ कई बार मुलाक़ातें करने का मौका मिला और हर मुलाक़ात किसी पहेली की तरह ही होती थी। पहेली इसलिए क्योंकि मैं उन्हें कभी समझ नहीं पाई। वह पल-पल बदलते रहते हैं और ये न सिर्फ आपको डराता है बल्कि कई बार तरोताज़ा भी महसूस कराता है। ज़िंदगी की तरह सलमान भी किसी पिटारे जैसे हैं। जब आप उनके आभामंडल में प्रवेश करते हैं तो आपको कुछ पता नहीं होता कि आपके हाथ क्या लगेगा।

मैं पहली बार उनसे मिली 90 के दशक के मध्य में। तब मैं इंडिया टुडे की रिपोर्टर थी और वह ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद बड़े स्टार बन चुके थे लेकिन प्रेस से उन्हें बहुत एलर्जी थी। ‘बैड ब्वॉय सलमान’ तमगे ने सलमान को नाराज़ किया था और वह हममें से किसी से भी बात नहीं करना चाहते थे। मैंने डेविड धवन की पत्नी लाली से एक मुलाकात तय करने का अनुरोध किया। क्योंकि लाली ने कहा था तो वह मुझसे मिलने को तैयार हो गए। मुंबई के सबअर्बन इलाके के एक रेस्तरां शतरंज में हम मिले। ये बहुत ही ख़राब मीटिंग रही। वह बातचीत की बजाय तिरामुसु (कॉफी के फ्लेवर वाली एक इटालियन मिठाई) खाने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहे थे। मैं सकुचाते हुए बातचीत का सिरा पकड़ने की कोशिश कर रही थी। मैंने कहा कि हम उनका एक इंटरव्यू करना चाहते हैं। उन्होने कहा कि वह करेंगे लेकिन तब, जब मेरी पत्रिका उनके पसंदीदा चैरिटी संस्थान को 10 लाख रुपये देगी। उनका तर्क ये था कि उनका चेहरा कवर पर आते ही मैगज़ीन ख़ूब बिकेगी इसलिए हमें उन्हें पैसे देने के लिए तैयार होना चाहिए। मैंने कहा, हम इंटरव्यू करने के पैसे नहीं देते। उन्होंने एक और तिरामिसु मंगाया और मीटिंग ख़त्म कर दी।

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सलमान की एक और प्यारी सी यादगार, उस इंटरव्यू की है जो उन्होंने मेरे साथ 2014 में किया। मैं दो शोज़ होस्ट कर रही थी – अंग्रेज़ी में द फर्स्ट रो और हिंदी में स्टार वर्डिक्ट। महबूब स्टूडियो में इसका सेट था और एक ही सेट पर हम दोनों शोज़ एक के बाद एक शूट करते थे। अंग्रेज़ी वाला तो आराम से हो गया। हिंदी वाले में उन्हें सेट पर एंट्री करनी थी और सेट पर चलते हुए आना था। उन्होंने ऐसा किया भी। मैं उनका अभिवादन करने के लिए खड़ी हुई। बजाय हाथ मिलाने या गले लगने के, वह झुके और मेरे पैर छू लिए। मेरी हंसी छूट पड़ी। जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया, उनका जवाब था, बुज़ुर्गों की रेसपेक्ट करनी चाहिए, क्योंकि ये हमारे कल्चर में है। (रिकॉर्ड के लिए बता दूं कि मैं उनसे छोटी हूं)

2015 में मैंने सलमान से एक और मुलाक़ात के लिए अनुरोध किया लेकिन ये किसी इंटरव्यू के लिए नहीं था। ये मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (मामी) के लिए था। अध्यक्ष किरन राव, मैं और फेस्टिवल क्रिएटिव डायरेक्टर स्मृति किरन फेस्टिवल संभाल रहे थे। 200 फिल्में दिखाने वाले और हफ़्ते भर तक चलने वाले इस फेस्टिवल का इंतजाम करना, इसके लिए पैसे जुटाना और प्रायोजक तलाशना किसी पहाड़ को हिलाने से कम नहीं था। हम सलमान की मदद चाहते थे। वह मिलने को तैयार हो गए। जैसे ही हम अंदर पहुंचे, वह ज़ोर से हंसे और बोले, मैं वाकई ये मुलाक़ात रद्द करना चाहता था। मुझे याद है तब मैंने दिवगंत फिल्म समीक्षक रोजर एबर्ट का एक कथन उन्हें सुनाया था। एबर्ट ने लिखा था, सारी कलाओं में, फिल्में ही सहानुभूति जगाने का सबसे सशक्त माध्यम हैं और अच्छी फिल्में हमें बेहतर इंसान बनाती हैं। सलमान ने इससे सहमति जताई। वह तुरंत अपने सोशल मीडिया के जरिए मामी का प्रचार करने के लिए तैयार हो गए और उन्होंने समापन समारोह में आने का भी वादा कर दिया।

ज़ाहिर है कि वह देर से आए। जब वह अंदर पहुंचे, बाल फिल्मों की जूरी के एक सदस्य भाषण दे रहे थे। सलमान को देखते ही वह रुक गए और हतप्रभ से हो गए। सलमान ने बहुत प्यार से कहा – परेशान मत होइए। मैं हमेशा अपनी लाइनें भूल जाता हूं। इसके बाद उन्होंने मामी के महत्व पर एक भाषण भी दिया। मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि मैं कभी इस फेस्टिवल में अवार्ड नहीं जीत पाऊंगा लेकिन मैं यहां आया हूं इस फेस्टिवल की मदद करने के लिए।”  यह असाधारण था।

सलमान अब भी रहस्य ही हैं – एक इंसान की तरह भी और एक कलाकार की तरह भी। उनके काम का विस्तार तमाम बेहतरीन फिल्मों (हम दिल दे चुके सनम, सुल्तान) से लेकर कुछ बेतुकी फिल्मों (बॉडीगार्ड, रेस 3) तक है। इतने सारे बरसों में वह हिंदी सिनेमा के टेफ्लॉन मैन बन गए हैं। फ्लॉप फिल्में, विवाद, आपराधिक मामले – कुछ भी तो उन पर चिपक कर नहीं रह पाता। मैंने उनके बारे में तमाम भयानक कहानियां भी सुनी हैं और उनकी निस्वार्थ भावना से की गई हैरान कर देने वाली उदारताओं के किस्से भी। सलमान एक चलता फिरता विरोधाभास हैं। अगले 30 साल उनके लिए क्या लेकर आएंगे, मैं जानने के लिए उत्सुक हूं।

Adapted from English by Pankaj Shukla, Consulting Editor

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