कारवां मूवी रिव्यू, Film Companion
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एक ऐसी फिल्म को देखना जिसमें कामयाब होने के सारे तत्व मौजूद हों और फिर भी फिल्म अपना असर न छोड़ सके, मेरे लिए बहुत तकलीफ़देह होता है। कारवां ऐसी ही फिल्म है। ये बात गौर करने वाली है कि फिल्म में क्या क्या ऐसा था जो कमाल कर सकता था। बेजॉय नांबियार की दो लाशों की अदलाबदली की एक ऐसी कहानी जो तुरंत आपको अपनी पहेली से जोड़ लेती है। दो बहुत ही काबिल और करिश्माई कलाकार – इरफ़ान ख़ान और दलकीर सलमान। सिर्फ उनकी मौजूदगी ही परदे पर जो कुछ चल रहा हो उसमें चार चांद लगाने के लिए काफी है। एक सिनेमैटोग्राफर अविनाश अरुण – जिसका कैमरा कैनवस पर कूंची की तरह चलता है। पेड़, नदियां, सड़कें, यहां तक कि सड़क किनारे मौजूद ढाबे – अविनाश का कैमरा जब इन पर घूमता है तो ये सब परदे पर अद्भुत लगता है। और, सिनेमा का एक ऐसा जॉनर – रोड मूवी – जो अपने आप में कॉमेडी, ट्रैजडी और बदलाव का सम्मिश्रण अपने साथ ले आता है। ऐसी फिल्मों में सफर ही मंजिल होता है।

डायरेक्टर आकर्ष खुराना किसी सेकंड ईयर स्टूडेंट की तरह ये सब कुछ समेट तो लेते हैं और फिर समझ नहीं पाते कि अब करें क्या? फिल्म की कमज़ोर कड़ी है इसकी सुस्त पटकथा जो खुद आकर्ष ने अधीर भट के साथ मिलकर लिखी है। हुसैन दलाल ने फिल्म के संवाद लिखे हैं। देखा जाए तो फिल्म के किरदार ही एक जगह से दूसरी जगह तक घूमते रहते हैं, पर फिल्म एक ही जगह खड़ी रहती है। सारे किरदार इतने बनावटी दिखते हैं कि हम उनसे अपनी संवेदनाओं के साथ जुड़ नहीं पाते। दलकीर यहां अविनाश के किरदार में हैं, एक भीतर ही भीतर घुटता आईटी प्रोफेशनल। उसके दफ्तर में एक बोर्ड लगा है, जिसका हिंदी तर्जुमा है – शिकायत मत करो, बेरोजगारी इससे ज्यादा कष्टकर है। अविनाश एक फोटोग्राफर बनना चाहता था लेकिन संतान से कुछ ज़्यादा ही उम्मीद लगाने वाले उसके पिता उसके सपने चूर चूर कर देते हैं। मुझे तो लगा था कि थ्री इडियट्स और तमाशा में ये ‘अपने सपनों के पीछे भागो’ वाला नजरिया खर्च हो चुका है लेकिन अब साफ लगता है कि मैं ही गलत थी।

इरफ़ान का किरदार शौकत भाई अपने में थोड़ा रहस्य समेटे रहता है। वह दिखावा तो करता है लेकिन भीतर से रुढ़िवादी है। गैराज चलाने वाला एक मुसलमान। कहानी हमें ये नहीं बता पाती कि वह अविनाश और एक लाश को लेकर पूरे दक्षिण भारत में गाड़ी चलाने को क्यों तैयार हो जाता है। लेकिन, वह अपने कभी न मिटने वाले प्यार और ईमानदारी का ऐलान भी करता है। नई पीढ़ी की नुमाइंदगी करती तान्या के किरदार में मिथिला पालकर हैं जो दो अनजान मर्दों के साथ एक लॉन्ग ड्राइव पर जाने को तैयार हो जाती है। ज़ाहिर सी बात है कि तान्या एक ऐसी दुनिया से है जिसके बारे में हम जैसी दूसरी भारतीय औरतों को ज़्यादा पता नहीं। ये तीनों वेस्टर्न घाट से कोची तक सड़क के रास्ते सफर करते हैं, जहां तान्या की मां एक होटल चलाती हैं। तीनों को अपने पिता से समस्या है, हालांकि ये समस्या भी ज़्यादा तीन-पांच किए हल हो जाती है। एक सीन में, तान्या अविनाश को बताती है, “अवि, हमें इस नफ़रत से अब बाहर निकलना चाहिए।” और अगर मैं ये बता दूं कि कुछ सीन्स के बाद अविनाश ऐसा करता भी है तो ये कहानी के किसी क्लाइमेक्स जैसी चीज़ को लीक करना नहीं होगा। फिल्म का कहानी आगे बढ़ती है जब हमारे ये लीड कलाकार दूसरे लोगों से टकराते हैं – जैसे अविनाश का पुराना कॉलेज फ्रेंड, शौकत का पीछा करने वाले कुछ गुंडे टाइप के किरदार, शादी में एक शहनाई वादक। ऐसा लगता है कि ये सारे किरदार कहानी को आगे बढ़ाने के लिए उसके ऊपर लगा दिए गए पैबंद हैं।

रोड मूवी जॉनर का आकर्ष को अच्छा अनुभव रहा है। उन्होंने टीवीएफ की वेब सीरीज़ ट्रिपलिंग लिखी जिसमें तीन आपस में लड़ते रहने वाले भाई बहन राजस्थान से लेकर मनाली तक की यात्री करते हैं। लेकिन यहां वह अपने किरदारों की खुद से चलती लड़ाई में रंग, रहस्य और राग बुनने में उतने कामयाब नहीं हो सके। सबसे अच्छे संवाद इरफ़ान के हिस्से आए हैं और जिन्हें वह अपने चिर परिचित अंदाज़ में पेश भी कर देते हैं। वह आपको हंसाते हैं भी है और हिलाते भी। उन्हें परदे पर देखना वाकई बहुत सुखद है। दलकीर भी कैमरे के सामने उतने ही माहिर दिखते हैं। उनका अंदाज कहीं से भी बनावटी नहीं लगता। बिना किसी तरह की हीरोगिरी दिखाए वह घुटन और दुख से जूझते अविनाश का किरदार बखूबी निभाते हैं। दलकीर को साधारण दिखने में संतोष है। उनमें बिल्कुल तरोताज़ा अभिमान भी दिखता है। इन दोनों के मुकाबले, मिथिला थोड़ा नई लगती हैं लेकिन मुझे उनकी बदमिज़ाज ज़िंदादिली अच्छी लगी।

अगर कहानी में थोड़ी और गहराई होती तो इन तीनों ने करिश्मा कर दिया होता। लेकिन, कारवां बस ऊपर ही ऊपर तैरती रहती है। जिसके बारे में ये कहना बनता है कि ये बहुत खूबसूरत है। ये फिल्म आपको केरल घूमने जाने के लिए प्रेरित कर सकती है। लेकिन, ये उससे ज़्यादा भी हो सकती थी। मेरी तरफ से फिल्म को दो स्टार्स।

Adapted from English by Pankaj Shukla, Consulting Editor

Rating:   star

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