इसलिए आपको देखनी ही चाहिए ऋषिकेश मुखर्जी की 1973 में रिलीज़ हुई क्लासिक फिल्म अभिमान, Film Companion
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ऋषिकेश मुखर्जी ने 1957 से लेकर 1998 के बीच 43 फिल्में बनाईं। और, इन्हीं में से एक और मेरी चंद पसंदीदा फिल्मों में शामिल अभिमान की मैं यहां बात करने वाली हूं।

रुपहले परदे पर इन एहसासो की बारिश 1973 के मॉनसून में जुलाई के महीने में हुई। जब ये फिल्म रिलीज़ हुई तो लोगों ने इसे हाथोंहाथ लिया और आज भी इसका असर कम नहीं हुआ है। इसकी वजह ये है कि अभिमान की कहानी एक साथ कई तरह से आपकी चेतना पर असर करती है – ये कहानी है प्यार और विवाह की नाज़ुक डोर के बारे में, ये कहानी है रिश्तों में दीवार बन जाने वाले घमंड की, ये कहानी है समय की हवाओं के साथ फना हो जाने वाली शोहरत की और ये कहानी है एक कलाकार के उसकी कला से डूबते-उतराते रिश्तों की। अमिताभ बच्चन और जया, शादी के कुछ ही हफ्तों बाद रिलीज़ हुई इस फिल्म में सुबीर और उमा के किरदारों में हैं। अमिताभ की एंट्री फिल्म में ‘देश के सबसे बड़े गायक’ के तौर पर होती है। और उमा, वह फिल्म में कोयल की सी आवाज में कूकने वाली एक साधारण लड़की है, जिससे सुबीर को प्यार हो जाता है। सुबीर ज़िद करता है कि उमा गाए और जब उसकी शोहरत सुबीर की लोकप्रियता से आगे निकल जाती है तो उनकी शादी संकट में पड़ जाती है।

ऋषि दा ने ये कहानी बड़ी ही किफ़ायत से सुनाई है। सिर्फ एक गाने भर के लम्हों में, वह सुबीर और उमा के दिनों दिन बिगड़ते रिश्तों की बात बहुत खूबसूरती से दिखा जाते हैं। खासतौर से वह सीन कोई कैसे भूल सकता है जब फोटोग्राफर्स उमा से सोलो फोटो के लिए कहते हैं और एक फैन सुबीर के हाथों से ऑटोग्राफ बुक खींचकर इसलिए भागता है ताकि वह उमा का ऑटोग्राफ ले सके।

और जल्दी ही, सुबीर को खुद ही अपने ऊपर दया आने लगती है और उसकी असुरक्षा उसे घेरने लगती है। ये ऐसा नायक नहीं है जिससे कि आप खुद को जोड़ सकें लेकिन अमिताभ बच्चन ने ये किरदार ज़बर्दस्त तरीके से परदे पर निभाया है। एक और सीन फिल्म का कभी नहीं भूलता, जिसमें सुबीर अपने करीबी दोस्त और मैनेजर चंद्रू से इसलिए किनारा करते दिखाई देता है क्योंकि चंद्रू को सुबीर की उसकी असली समस्या के बारे में बताने में डर नहीं है।  

एक और बात फिल्म को दिल के करीब लाती है और वह है जया बच्चन के किरदार की कोमलता और उसका मनोहारी रूप। मेरे हिसाब से जया इससे ज़्यादा प्यारी और किसी फिल्म में नहीं लगीं। उमा ज़्यादा कुछ कहती नहीं है लेकिन उसके किरदार का दुख पूरी फिल्म में पसरा महसूस होता है। जब फिल्म के क्लाइमेक्स में वह खुद को और नहीं संभाल पाती और सब कुछ कह देती है, तो मैं शर्त लगाकर कह सकती हूं कि आप भी अपनी आंखों के आंसू रोक नहीं पाएंगे।

और, फिल्म के कथानक की बेल को एक मजबूत सहारा बनकर ऊपर चढ़ाने में संगीतकार एस डी बर्मन के गानों ने भरपूर साथ दिया है। फिल्म इतिहास में अभिमान के संगीत की गिनती महान संगीत के रूप में होती है। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गानों का खूबसूरत एहसास उसे ही मालूम है जिसने इन्हें एक बार भी सुना है। ये वो संगीत है जो कभी पुराना नहीं होता।

रिश्तों की मिठास और उदासी एक साथ लिए फिल्म अभिमान इसके निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे खूबसूरत फिल्मों में से एक है। ये पूरी फिल्म आप यूट्यूब पर देख सकते हैं।

Adapted by Pankaj Shukla, consulting editor 

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