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निर्देशक – श्रीराम राघवन

कलाकार – आयुष्मान खुराना, तबू, राधिका आप्टे, मानव विज, अश्विनी कलसेकर

“जीवन क्या है?” श्रीराम राघवन की नई फिल्म अंधाधुन में एक किरदार ये सवाल पूछता है। वही इसका जवाब भी खुद ही दे देता है- सब कुछ लीवर पर टिका है। ये लीवर जीवन जी रहा ये इंसान भी हो सकता है या फिर ये आपके शरीर का कोई अंग भी। ये श्रीराम की दुनिया है। यहां हर बात के कम से कम दो मायने होते हैं और जो दिखता है वो होता नहीं है।

क्योंकि श्रीराम हिंदी सिनेमा के थ्रिलर मास्टर हैं। उनकी फिल्में अपराध में गुम गंदे लोगों- अपराधियों, जुआरियों, हत्यारों और ठगों से भरी होती हैं। उनकी फिल्मों के कैनवस पर पुरानी हिंदी फिल्मों के छींटे भी खुलकर मारे गए होते हैं। लेकिन अंधाधुन में श्रीराम की पुरानी फिल्मों को ये श्रद्धांजलि थोड़ा और आगे तक जाती है। फिल्म में 70 के दशक की सस्ती फिल्मों मसलन चेतना और दरवाज़ा के हीरो अनिल धवन अपना ही किरदार करते दिखाई देते हैं। ये किरदार है गुज़रे जमाने के एक ऐसे स्टार का जिसका ज़्यादातर वक़्त अब अतीत की शोहरत को याद करते बीतता है। प्रमोद सिन्हा नाम का ये किरदार हालांकि काल्पनिक ही है पर उसके घर में अनिल धवन, डेविड धवन के बड़े भाई और वरुण धवन के ताऊजी, की फिल्मों के पोस्टरों की भरमार है। जो पुरानी फिल्में प्रमोद देख रहा होता है, वे दरअसल अनिल धवन की फिल्में हैं। ये एक शातिर कास्टिंग है। क्योंकि सिर्फ अनिल की मौजूदगी ही पुरानी यादें और हंसी के पल ले आती है, और बीते हुए समय की यादों की टीस भी इनमें है।

प्रमोद शादीशुदा है और उसकी पत्नी- सेक्सी सिमी केकड़े को किचन में पकाने को भी वात्स्यायन का कामशास्त्र बना देती है। कहीं श्रीराम ने ये नाम सिमी उन सिमी ग्रेवाल की याद दिलाने के लिए तो नहीं रखा जो सुभाष घई की फिल्म कर्ज़ में क़ातिल कामिनी के किरदार में थीं? कामिनी की ही तरह सिमी नाम का ये जीव भी लालच और लिप्सा में डूबा हुआ है। वह अपनी मदहोशी में है और इसका किसी से कोई जुड़ाव नहीं है। कोई इसे लेडी मैकबेथ भी कहकर बुलाता है – ये एक और सम्मान संकेत है तबू के उस सबसे दमदार किरदार के लिए जो उन्होंने फिल्म मक़बूल में निम्मी के तौर पर किया था। लेकिन निमी से उलट, सिमी की कोई अंतरात्मा नहीं है। वह क्रूर है लेकिन जो कुछ भी वाहियात हरकतें वह करती है, उससे बेपरवाह भी है। इससे उसका किरदार मज़ेदार बनता है। उसको इस बात पर भी गुस्सा होता है कि दूसरों का इस्तेमाल करने और उनका शोषण करने की उसकी आदत को लोग मुश्किल क्यों समझते हैं। एक और किरदार उससे कहता है, “एकदम बंडल औरत हो तुम।” हवा में उड़ती अपनी काली नाइटड्रेस में झूमती तबू इस एकदम बंडल औरत के किरदार में बिल्कुल परफेक्ट दिखी हैं।

उनसे कदमताल मिलाते नज़र आते हैं आकाश के रोल में आयुष्मान खुराना, जो इस धमाचौकड़ी का केंद्रबिंदु है और एक अंधा पियानोवादक है। एक दिन आकाश खुद को एक क़त्ल में फंसा पाता है। उसके पियानो बजाने के दौरान ही एक शव को ठिकाने लगाया जा रहा होता है। इस दौरान कोई संवाद नहीं होता क्योंकि हत्यारे नहीं चाहते कि वह कुछ भी ऐसा सुने जिस पर उसे शक़ हो। तो ये हत्यारे शव को ले जा रहे हैं और आपस में इशारों में बातें कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि जैसे ये सीक्वेंस किसी मूक फिल्म से चुराया गया है। पूरा सीन बहुत ही बुद्धिमानी से शूट किया गया है। सिर्फ इन कुछ मिनटों के लिए ही आप अंधाधुन देख सकते हैं। आयुष्मान का किरदार आकाश पड़ोस का लड़का नहीं है, और आयुष्मान ने ये किरदार बहुत ही सलीके और करीने से अदा किया है। उसके अपने राज़ हैं लेकिन वह एक ऐसा कलाकार भी है जिसमें इंसानियत और रूहानियत का बाकी है। एक तरह से देखा जाए तो शैतानों की इस नगरी में वह सबसे अच्छा किरदार है। मुझे आकाश उस सीन में सबसे अच्छा लगा जब वह एक कुर्सी से बंधा है और दूर कहीं अपने निगाहें गड़ाने की कोशिश करता हुआ बहुत ही सादे तरीके से शोले की मशहूर लाइन बोलता है – इतना सन्नाटा क्यों है भाई।

सन्नाटा है क्योंकि लाशों के ढेर लग रहे है। बहुत ही सफाई और समझ से श्रीराम ने बेहूदगी का रंगमंच सजाया है। आसपास का माहौल – ऊंची इमारतें, पत्तियों से भरी गलियां और पुणे के पुराने घर – सबकुछ बिल्कुल सामान्य दिकता है लेकिन जो अंदर हो रहा है उसे बहुत ही मज़े लेकर ऐंठा गया है। यहां क़त्ल है, धोखा है, सेक्स है और है झूठ का पहाड़। कुल मिलाकर, आपका ध्यान कहीं और जा ही नहीं सकता।

लेकिन जैसा कि हिंदी सिनेमा में अक्सर होता है, यहां भी इंटरवल के बाद फिल्म का एनर्जी लेवल ढुप्प से नीचे आ जाता है। नए किरदार फोकस में आ जाते हैं लेकिन ये उतने दिलचस्प नहीं हैं जितने कि फर्स्ट हाफ में ड्रामा रचने वाले कलाकार थे- इनमें मानव विज भी शामिल हैं जो है बहुत ही रफ एंड टफ पुलिसवाला लेकिन जैसी ही अपनी अति उत्साही बीवी के सामने आता है, चूहा बन जाता है। पुलिसवाले की बीवी के इस किरदार में अश्विनी कलसेकर ने कठोर वाले लव की नई परिभाषा गढ़ी है। हालांकि मेरा मन यही था कि राधिका आप्टे को कुछ और करने को मिलता है। वह लगती तो प्यारी हैं पर ज़्यादा कुछ उनका किया याद नहीं रह पाता।
अंधाधुन एक फ्रेंच शॉर्ट फिल्म द पियानो ट्यूनर से प्रेरित है। प्रेरणा हो सकता है श्रीराम ने एजेंट विनोद के ‘राब्ता’ से भी ली हो, आपको याद है ना वो दमदार गाना जिसमें एक अंधे पियानोवादक की उँगलियाँ लगातार की बोर्ड से संगीत निकाल रही हैं जबकि सैफ और करीना चारों तरफ गोलियों की बौछार कर रहे हैं। अंधाधुन पर चार लेखकों ने काम किया है और फिल्म का सेकंड हाफ लगता भी कुछ कुछ खिचड़ी जैसा ही है। थोड़ा विस्तार से कहूं तो यहां कहानी कुछ नया कहने की बजाय जलेबी घुमाने लगती है। और, इसका मज़ा भी उतना कटीला नहीं रह जाता – हालांकि घरवालों की फरमाइशों से परेशान भ्रष्ट डॉक्टर के किरदार में ज़ाकिर हुसैन ने जो अदाकारी दिखाई है, उसके चलते मुझे लगता है कि इन्हें कम से अपनी एक शॉर्ट फिल्म तो मिलनी ही चाहिए।

फिल्म में खरगोश का भी एक अहम किरदार है। फिल्म का साउंडट्रैक जिसमें कि अनिल धवन की फिल्मों के सबसे हिट गानों मसलन ये जीवन है, तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम, के पियानो पर बजे अंतरे भी शामिल हैं, बहुत बढ़िया है। दरअसल, अंधाधुन शुरू ही होती है दूरदर्शन पर 70 और 80 के दशक में आने वाले फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों छाया गीत और चित्रहार के अदब भरे ज़िक्र से। इन शोज़ के मायने क्या होते हैं, ये समझने के लिए आपके बालों में सफेदी के कुछ स्ट्रोक्स होने ज़रूरी है और मैं तो बस इस पहली बानगी पर ही फिदा हो गई। मैं दे रहीं हूं फिल्म अंधाधुन को साढ़े तीन स्टार्स।

Rating:   star

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