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आनंद एल राय की अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी फ़िल्म ज़ीरो की रिलीज़ में अब महीनेभर का वक्त ही बाकी है। रचनात्मक ज़मीन हो या बॉक्स आॅफ़िस, राय आैर उनके साझेदार लेखक हिमांशु शर्मा ने हार का मुँह कम ही देखा है। अतीत में यह जोड़ी हमें तनु वेड्स मनु (2011), रांझणा (2013) आैर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स (2015) जैसी सुपरहिट फ़िल्में दे चुकी है। इस जोड़ी की रची कहानियाँ ज़मीन से जुड़ी होती हैं आैर उनकी सादगी मन मोहने वाली होती है। पर इस बार वे मुल्क के सबसे चमकीले सितारों के साथ काम कर रहे हैं आैर फ़िल्म तकनीकी के मामले में भी बड़ी चुनौती को अपने हाथ में ले रही है। जैसा शर्मा कहते हैं, “मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है कि जिस ख़्याल को मैंने अपनी आरामकुर्सी पर बैठे सोचा भर था, आज उसे सच्चाई का जामा पहनाने के लिए हज़ारों तकनीशियन अपनी दिन आैर रात एक किए हुए हैं। मेरे लिए ये बहुत असहज करने वाला है।” यहाँ वे हमसे महानायक के लिए लिखने का अपना अनुभव साझा कर रहे हैं, जहाँ उन्होंने बहुत नज़ाकत के साथ कुछ नया रचने की कोशिश की है…

ज़ीरो का ख़्याल आया कहाँ से? इस कहानी की शुरुआत के बारे में हमें कुछ बताइये। एक बौने किरदार की कहानी सुनाने की कैसे सूझी आपको।

ये कुछ साल पहले की बात है। जब हम रांझणा के प्रचार में व्यस्त थे, तभी मेरे दिमाग़ में ये ख़्याल कौंधा। मैं सोचता रहा कि इस बौने किरदार को परदे पर कैसे साकार करेंगे। इस सिलसिले में हम अमेरिका गए आैर कुछ वीएफ़एक्स स्टूडियोज़ से मुलाकात की, लेकिन वे हमें ज़्यादा उत्सुक नहीं दिखाई दिये। उन्होंने कहा कि ये तो बहुत मुश्किल है आैर हमें नहीं मालूम इसे परदे पर कैसे हासिल किया जा सकेगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि फ़िल्म का मुख्य किरदार पूरी फ़िल्म में चार फ़ीट दो इंच का दिखाई दे। हम इसे छोड़कर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स (2015) में लग गए, लेकिन इस ख़्याल ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। किसी कहानी की यही सबसे बड़ी परीक्षा होती है, कि वो आपके दिमाग़ में हमेशा के लिए बस जाए। इसका मतलब है कि इस कहानी का आपको कुछ करना होगा, वरना नब्बे प्रतिशत ख़्याल वक्त के साथ अपना असर खो देते हैं।

आैर आपको ये कब मालूम चला कि शाहरुख़ ख़ान इस किरदार को निभाने वाले हैं?

बीच में कहीं − जब मेरे दिमाग़ में सीन बनने लगे थे आैर आनंद ने सुझाया कि हमें ख़ान साहब से बात कर पूछना चाहिए कि क्या वे इसमें दिलचस्पी लेंगे? उन्हें ये ख़्याल बहुत पसन्द आया। उस समय तक फ़िल्म की पटकथा तैयार नहीं हुई थी। बल्कि उस वक्त तो पहला हिस्सा भी पूरा तैयार नहीं हुआ था, जब उन्होंने इस फ़िल्म को हाँ कही।

क्या लिखने में ज़्यादा मज़ा आता है, जब ये पहले से पता हो कि आपका लिखा शाहरुख़ ख़ान बोलने वाले हैं?

मुझे ऐसे ही काम करना सुहाता है। मुझे पता होना चाहिए कि इस किरदार को कौन निभाने वाला है। तब आप अभिनेता को ध्यान में रखते हुए, उनके लिहाज से सबसे फ़िट बैठने वाला लिखते हैं। ख़ान साहब अपने अन्दाज़ से किरदार में कितना कुछ नया जोड़ देते हैं। आप किरदार को किसी आैर ही लेवल पर ले जा सकते हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि इससे अभिनेता के लिए सीन निभाने में कितना मुश्किल हो सकता है। आप परवाह नहीं करते, क्योंकि आपको मालूम है कि वो इसे निभा ले जायेंगे।

बऊआ सिंह बहुत प्यारे हैं आैर वो बिल्कुल शाहरुख़ ख़ान वाली स्टाइल में अपने दोनों हाथ फ़ैलाये खड़े दिख रहे हैं। क्या आपने जानकर ये उनके किरदार में डाला, क्योंकि शाहरुख़ ख़ान इसे निभाने वाले थे?

मेरे सामने एक अभिनेता था, जिसकी बीते 30 सालों में सबके चहेते रोमांटिक हीरो के रूप में एक मिथकीय छवि बन चुकी है। अचानक मुझे लगा कि उनके साथ कुछ नया रचते हुए मुझे कोई ऐसी अदा भी साथ में बचाकर रखनी चाहिए जो इन बीते सालों की याद दिलाये। वो जादू जिसने हमें इतने सालों तक अपने मोहपाश में जकड़े रखा, उसे मैं कैसे जाने देता। लेकिन मैं पागल ही होऊंगा जो शाहरुख़ ख़ान के साथ कुछ नया करने की कोशिश ना करूं। कुछ नया ना किया तो उनके साथ फ़िल्म बनाने का मतलब ही क्या? मुझे याद है कि उनकी डर आैर दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे सिनेमाघर में देखकर मैं तो बावरा हो गया था। तो उनकी वो छवि मुझे भी बहुत पसन्द है, लेकिन एक लेखक के तौर पर आपको सोचना पड़ता है कि “इसमें मैं कहाँ हूँ?” उनकी पिछली फ़िल्मों में जो आपको पसन्द आया उसे बचाते हुए, उनके साथ बिल्कुल नया कुछ रचने की कोशिश मुश्किल तो ज़रूर है। यहाँ आपको बहुत नज़ाकत के साथ कुछ बिल्कुल नया हासिल करना है।

अच्छी बात ये है कि बऊआ सिंह ज़रा भी ऐसा किरदार नहीं दिखाई पड़ता, जिसे आपकी सहानुभूति की दरकार हो।

वो तो सबसे आसान होता कि आप उसके लिए सहानुभूति महसूस करें। बिना आपस में बात किये ही हमें यह शुरु से मालूम था कि इस रास्ते पर नहीं जाना है। यहाँ कोई भी उदासी भरा पल नहीं होगा। यहाँ तक कि इसका सीधा उल्लेख करने की ज़रूरत भी नहीं महसूस की गई कि शाहरुख़ के किरदार का कद छोटा है या अनुष्का चल-फिर नहीं सकतीं। ये तो बस संयोग भर है। ये कहानी किन्हीं भी दो इंसानों के बारे में हो सकती है, जिन्हें प्यार की तलाश है। हाँ, फ़िल्म में दुखभरे क्षण हैं लेकिन उन मौकों पर भी वो आपसे ये कभी नहीं कहेंगे कि प्लीज़, मेरे लिए सहानुभूति महसूस करें। वो अपने बौने होने पर कभी रोयेंगे नहीं, सीधा आकर आपसे भिड़ जायेंगे।

ज़ीरो हर लिहाज से आनंद एल राय की सबसे महत्वाकांक्षी फ़िल्म लगती है। मैंने उनको एक साक्षात्कार में कहते सुना था कि इस तकनीकी के झांसे में ना आयें, ये भी उतनी ही ज़मीन से जुड़ी आैर मोहने वाली फ़िल्म है। आपके लिए ये अनुभव कैसा रहा?

आनंद आैर मैं शायद वो आखिरी इंसान होंगे जो वीएफ़एक्स वाली फ़िल्म बनायें। हम असली लोकेशन पर जाकर खुद अपने हिसाब से शूट करने में यकीन रखते हैं। हमारे वीएफ़एक्स सुपरवाइज़र (हैरी हिंगोरानी) बहुत खुले दिमाग़ के इंसान हैं। उन्होंने हमारी किसी भी मांग के लिए ना नहीं कहा। हम जैसे शूट करना चाहते थे, ठीक वैसे ही करने के लिए वो हमेशा कोई नया रास्ता निकालते रहे। हमने इसे स्वाभाविक बनाए रखने में बहुत मेहनत की है। वो कहते हैं ना कि स्क्रीन पर अराजकता दिखाने के लिए बहुत तगड़ी योजना की ज़रूरत पड़ती है, तो कुछ वैसा ही मामला यहाँ है। हमने इसका खूब रियाज़ किया, जिससे ये परदे पर ज़रा भी कृत्रिम ना लगे। आैर आनंद तो बहुत पूर्वाभ्यास के साथ शूटिंग करने वाले इंसान नहीं हैं। वो शॉट ब्रेकडाउन आैर स्टोरीबोर्डिंग भी कभी-कभी ही करते हैं। वो सेट पर आकर ही ये सब तय करते हैं। वो अपने अभिनेताअों से गहरे जुड़े रहते हैं। उनके जैसे निर्देशक के लिए इस नई व्यवस्था में खप पाना बहुत यांत्रिक हो सकता था, पर शुक्र है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। बाक़ी फ़िल्में भी हमने खाते खाते बनायी हैं, उसी तरह ये भी बन गई।

जब आप इस तरह की महत्वाकांक्षी फ़िल्म लिख रहे हों, तो क्या वीएफ़एक्स आैर बजट के बारे में सोचते हैं?

लिखते हुए कुछ मौके तो ऐसे आते थे कि मैं सोचता था, “इस प्रसंग में पानी के साथ खेल होनेवाला है। तो क्या मुझे हैरी से फ़ोन कर पूछना चाहिए कि ये हो पाएगा, या इसे करते हुए हम सब मारे जायेंगे?” भई, कुछ चीज़ें तो सच में ऐसी होती हैं जिससे आप मर सकते हो! मैं सोचता था कि इतना महत्वाकांक्षी मत हो जाआे कि हासिल ही ना हो पाये।

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