फ़िल्ममेकर्स की मानें तो ‘व्हाय चीट इंडिया’ की कहानी असल तथ्यों में कल्पना की मिलावट कर तैयार की गई है। पिछले कुछ समय से इस किस्म की फैक्ट में फ़िक्शन की मिलावट वाली कहानियाँ बॉलीवुड में खूब पसन्द की जा रही हैं। ‘उरी’, ‘पैडमैन’, ‘संजू’, ‘राज़ी’ और ‘रेड’ जैसी फ़िल्मों का नाम इसी क्रम में गिना जा सकता है। ये फ़िल्में सच्ची कहानियों से अपनी प्रामाणिकता हासिल करती हैं और उनमें कल्पना की मिलावट कर नाटकीयता के चरम तक पहुंचती हैं। लेकिन ये मुश्किल रास्ता है और कई निर्देशक इस पथ पर चलने की कोशिश में पहले फिसल चुके हैं।

‘व्हाय चीट इंडिया’ के निर्देशक सौमिक सेन इस रास्ते पर फ़िल्म की शुरुआत तो बेहतर करते हैं। बात की गहराई सौमिक सेन के कहानी कहने के तरीके की विशेषता नहीं। लेकिन अपने नाटकीय अंदाज़ में ही सही, वे फ़िल्म का दिलचस्प फ़र्स्ट हाफ़ रचते हैं। लेकिन आगे जाकर वे भारी-भरकम बैकग्राउंड म्यूज़िक और सस्पेंस रचने के लिए स्प्लिट स्क्रीन जैसे चलताऊ चक्करों में उलझकर रह जाते हैं। और आखिर में अपने स्टार इमरान हाशमी द्वारा ऐसा भाषण दिलवाने से भी नहीं बच पाते, जिसमें वो अपने सभी अपराधों का ज़िम्मेदार सिस्टम को ठहराता है। पूरी फ़िल्म में इमरान हाशमी, जो इस फ़िल्म के सहनिर्माता भी हैं, के चेहरे पर वही जाना-पहचाना भाव बना रहता है। वही स्वभाव से अच्छे इंसान वाला भाव, जो बस काम बुरे करता है।

देश भर में फैले अपने नकल के धंधे के पीछे राकेश सिंह का तर्क है, ‘सब माया है, सबने खाया है’। अपने को रॉकी कहलाना पसन्द करनेवाला राकेश खुद मेडिकल का एक असफ़ल छात्र है, जो भारतभर में फैले कोचिंग के धंधे का रॉबिनहुड बन जाता है। वो अमीर घरों के मूर्ख बच्चों से पैसा लेकर गरीब घरों के होशियार बच्चों को देता है, और बदले में ये होशियार बच्चे इन अमीर बच्चों की जगह बैठकर उनके एग्ज़ाम लिखते हैं। आखिर इसमें सबकी जीत है।

सौमिक, जिन्होंने इस फ़िल्म की पटकथा भी लिखी है, ने लाखों सपनों की हत्यारी भारत की शिक्षा व्यवस्था का बखूबी ख़ाका खींचा है। कोचिंग इंडस्ट्री की अघोषित राजधानी बना कोटा शहर इसके केन्द्र में है। यहाँ लोन लेकर अपने बच्चों का इन कोचिंग संस्थानों में एडमिशन करवाने वाले परेशान माँ-बाप हैं। बच्चे हैं जिनका काम पाठ्यपुस्तकों को घोलकर पी जाना है। और इन्हीं बच्चों में से कुछ कभी पंखे से लटककर या हाथ की नसें काटकर अपनी जान भी दे देते हैं। इस चक्की में पिस रहे किरदारों के लिए रॉकी बुरा आदमी नहीं, रक्षक है।

कथानक सधी गति से आगे बढ़ता है और किरदार दिलचस्पी पैदा करते हैं। जूही सकलानी, मिश्का शेखावत और सौमिक के लिखे संवाद भी सही जगह चोट करते हैं। अपने स्टार नकलची सत्तू को एक जगह रॉकी बोलता है, ‘अक्लमंद तो तुम हो, नकलमंद बन सकते हो कि नहीं?’ और मेरा पसन्दीदा, ‘मुझे हीरो बनने की कोई इच्छा नहीं है। विलेन बनने का बिल्कुल टाइम नहीं है। खिलाड़ी हूँ, खेल रहा हूँ।’ सत्तू की आँखों में दिखाई देती ईमानदारी और भोलापन भी हमें भावनात्मक रूप से कथा से बाँधे रखता है। स्निग्धदीप चटर्जी ने यहाँ छोटे शहर की नैसर्गिक अच्छाई को ज़िन्दा कर दिया है। सौमिक ने अन्य बारीकियों को भी अच्छे से पकड़ा है जैसे सख़्तजान पिता, चौक में दादी अम्मा की मौजूदगी, बड़े सपने देखनेवाली प्यारी बहन। और रॉकी के मज़ाकिया साइडकिक बबलू की भूमिका में मनुज शर्मा को मिस मत कीजिएगा।

लेकिन इसके बाद फ़िल्म मुम्बई का रुख़ कर लेती है और सैंकड़ों करोड़ के एमबीए घोटाले होने लगते हैं। चमकदार गलियारों में स्लो-मोशन मे चलते किरदार दिखाए जाते हैं। रॉकी के पास मर्सिडीज़ आ जाती है। सत्तू की बहन नूपुर, जो किरदार श्रेया धनवंतरी ने निभाया है, अचानक पहले हाफ़ की भोली सामान्य लड़की से दूसरे हाफ़ की होशियार शहरी लड़की में बदल जाती है। और इमरान हाशमी हैं, तो उनका हमेशा वाला किसिंग सीन तो होना ही है। लेकिन कहानी का ये तमाम बदलाव बहुत ऊबड़खाबड़ और सच कहूँ तो बोरिंग है। एक जगह तो रॉकी वॉल स्ट्रीट के गॉर्डन गेक्को की तरह सूक्ति भी उछालता है, ‘ग्रीड इज़ गुड’। खुद घोटाला इतना अजीबोगरीब और कंफ्यूज़िंग है कि मैं इसे समझ पाने में असमर्थ हूँ। यहाँ सेक्स वर्कर्स, ड्रग्स, गुंडे, बन्दूकें और बिना बात का रोमांटिक नाचगाना, सबकुछ तो है!

पर आखिर में ‘व्हाय चीट इंडिया’ ये नहीं तय कर पाती कि रॉकी फ़िल्म का हीरो है या विलेन। मुझे इससे दिक्कत नहीं है। लेकिन फ़िल्म बार-बार अपना रास्ता बदलती रहती है। और दूसरा हाफ़ तो बहुत ही भटकाव वाला है। जब भी लगता है कि फ़िल्म की कहानी क्लाईमैक्स पर पहुँचने वाली है, फ़िल्म कोई नया मोड़ ले लेती है। इसकी वजह यही है कि ‘व्हाय चीट इंडिया’ अपने नायक रॉकी के साथ भी खड़ी है, लेकिन उसे सज़ा भी देना चाहती है। लेकिन ऐसी कहानी कहने के लिए जिस कल्पना और हिम्मत की ज़रूरत होती है, वो ‘व्हाय चीट इंडिया’ के पास नहीं है।

मैं इसे ढाई स्टार देना चाहूँगी।

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