इस साल के शुरू में संजय लीला भंसाली की पद्मावत में दीपिका पादुकोण ने रुपहले परदे को और रौशन कर दिया, ये फिल्म भारतीय सिनेमा में सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बनी। क्यों अब समय आ गया है कि लोगों को लिंगभेद से ऊपर उठने की जरूरत है, कैसे सोशल मीडिया पर कम वक़्त बिताना फायदेमंद हो सकता है और शादी के उनके लिए क्या मायने हैं, ऐसे तमाम सवालों के दीपिका ने फिल्म कंपनेयिन से इस खास बातचीत में जवाब दिए। पेश है इस बातचीत के कुछ संपादित अंश:

 

अनुपमा चोपड़ा : दीपिका, पद्मावत के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। इस फिल्म की कामयाबी ने आपको हिंदी सिनेमा की सबसे सशक्त महिला के तौर पर भी स्थापित कर दिया है। इसे लेकर अब किसी तर्क की गुंजाइश भी नहीं है। लेकिन, बड़ी ताक़त के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती है, तो आप अपनी इस ताक़त के साथ अब क्या करना चाहती हैं?

दीपिका पादुकोण: सच कहूं, ये कभी इस बारे में रहा ही नहीं कि ‘अब क्या?’ जो भी मैं महसूस करती हूं, कुछ साल पहले भी मुझे ये महसूस हुआ था – जो भी आप करो, इसे किसी उद्देश्य के साथ करो और इस इरादे के साथ करो कि ये कुछ बदलाव ला सके, लोगों की जिंदगी पर खुशनुमा और सकात्मक असर डाल सके, शायद लोगों को थोड़ी बहुत ही सही पर एक सही राह दिखा सके। जो भी मैं करती हूं, उससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। अपने सफर या अपने अनुभवों या अपनी फिल्मों के बारे में बातें करके अगर मैं लोगों को मजबूत बनाती हूं तो यही मेरा इरादा होना चाहिए, यही मेरा इरादा हमेशा से रहा भी है। फिल्म की कामयाबी बस इस प्लेटफॉर्म का विस्तार करती है।

अनु: लेकिन विडम्बना ये भी रही कि जो फिल्म इतनी कामयाब रही और जो फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के हालात भी बदलेगी, इसे भी लिंग आधारित राजनीति के चलते ताने सुनने पड़े। जब ऐसा कुछ होता है तो क्या अपने कदम पीछे खींचती हैं और कहती हैं, ‘शायद इसे देखने को दूसरा तरीका भी है? क्या इसने आपको कोई दूसरा नज़रिया दिया?’

दीपिका: नहीं, इसने मुझे कोई दूसरा नज़रिया नहीं दिया। पद्मावत करने के पीछे इरादा ये रहा कि लोगों को ये समझ आना चाहिए कि ऐसी भी कोई महिला रही थी जो इतनी निडर और इतनी जोशीली थी। ये ऐसी कहानी थी जिसे आज के समय में कहना ज़रूरी थी। और मेरे लिए, यही तरीका था। लोगों के लिए इसे देखने के अलग तरीके हो सकते हैं, लेकिन मेरे लिए यही था।  

अनु: फिल्म सनसेट बुलवार्ड (1950) में एक पल है जो मूक फिल्मों के समय के एक फिल्म स्टार के बारे में हैं। और ये शख्स कहता है, ‘ओह, नोरमा डेसमंड, आप इतनी बड़ी (स्टार) हुआ करती थीं!’ और वह कहती है, ‘मैं अब भी बड़ी हूं, ये पिक्चर्स हैं जो छोटी होती चली गईं।’ अब आप जैसे जैसे बड़ी और बड़ी होती जा रही हैं, आप ये कैसे निश्चित करती हैं कि आपके किरदारों में यही महानता कायम रहे – कि इनमें फिल्म का सार भी हो और वजन भी?

दीपिका: मेरा ख्याल है इन्हें सार्थक होना चाहिए। पीकू एक छोटी फिल्म थी, लेकिन इसका मतलब था, इसमें गहराई थी। मैं चाहती हूं कि यही संपर्क बना रहे। इसका शब्दों के लिहाज से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये कितनी बड़ी या कितनी छोटी फिल्म है।

अनु: इसका बजट से कोई लेना देना नहीं है।

दीपिका: सौ फीसदी पक्के तौर पर इसका बजट से कोई लेना देना नहीं है। वर्ना मैंने, देखा जाए तो, फाइडिंग फैनी नहीं की होती। पूरी विनम्रता के साथ मैं ये कहना चाहती हूं कि ये गलती तमाम लोग करते हैं – कि ज़्यादा कामयाबी के साथ ज़्यादा जिम्मेदारियां भी आती हैं, तो आपको अपने जीवन की चीजें बदलनी शुरू कर ही देनी चाहिए। लेकिन मैं इसे दूसरी तरह से देखती हूं, यानी कि आप जहां है, वहां इसलिए हैं क्योंकि आप कुछ खास चीजें कर चुके हैं जिनमें आप भरोसा करते हैं। जैसे कि अपनी जड़ों को याद रखना और हमेशा खुद को ये याद दिलाते रहना कि आप यहां क्यों हैं और वे कौन से फैसले, विचार या लोग हैं जिन्होंने यहां तक पहुंचाने में मदद की। मेरा इस सबकी तरफ देखने का ये तरीका है।

अनु: तो ऐसा कुछ नहीं है कि ‘अब ये मैं नहीं कर सकती’?

दीपिका: नहीं, ऐसा होना भी क्यों चाहिए?

अनु: मुझे तो नहीं पता, लेकिन नंबर वन होना और इससे जुड़े मिथक?

दीपिका: नहीं, नहीं। मेरे लिए ये याद रखना हमेशा अहम है कि मैंने वो क्या किया है जो मुझे यहां तक लेकर आया? अगर मैं इसे एक लाइन में समेटना चाहूं तो ये होगा कि अपनी जड़ों को नहीं भूलना और इसका इसका आशय मेरे लिए कई मायनों में हैं। मेरी निजी ज़िंदगी में, मेरे व्यावसायिक जीवन में, बहुत तरह से, ये लाइन इन सबका निचोड़ है।

अनु:  दीपिका, क्या आप खुद को एक कलाकार के तौर पर देखती हैं या एक ब्रांड के तौर पर?

दीपिका:  मेरा ख्याल है, एक कलाकार के तौर पर। और मैं उम्मीद करती हूं कि ये बदले नहीं। जब मैं सोचती हूं कि लोगों की समझ बदल रही है या बदल चुकी है- तब फिर से, ये मुझे मेरे पहले वाले प्वाइंट पर ही ले आती है। यानी कि अगर लोग मुझे एक खास तरीके से देखते हैं या मेरे साथ कुछ बातें जोड़ते हैं तो इसकी वजह है मेरा अब तक का किया काम, और ये इसलिए है क्योंकि मैं एक कलाकार हूं। ये कभी बदलने वाला नहीं है। और, अंदर से मैं यही हूं। और यही मेरी बुनियाद है, आप उसे नहीं भूल सकते।

अनु:  मुझे पता है कि आप अपनी अभिनय प्रक्रिया के बारे में बात करने से कतराती हैं। हमने इम्तियाज़ (अली) के साथ इंटरव्यू किया था और वह हमें तमाशा के एक सीन के बारे में बता रहे थे। वह आपके और रणबीर के बारे में तमाम प्यारी प्यारी बातें बता रहे थे कि आप उस सीन में क्या लेकर आईं और इसे कैसे आपने किया। और, उन्होंने कहा कि आप दरअसल शरमा रहीं थीं और आपने अपनी ऐक्टिंग को अपने शर्मीलेपन से छुटकारा पाने के लिए इस्तेमाल किया। आप कैसे कर लेती हैं  ये?

दीपिका:  मुझे पता नहीं। उन्होंने कहा कि मैं बहुत शर्मीली हुआ करती थी, वो तो मैं अब भी हूं। हो सकता है कि अब इससे पार पाने के लिए थोड़ा बेहतर तरीके से तैयार हूं। लेकिन, अंदर से मैं एक शर्मीली और अनाड़ी इंसान ही हूं। मैं अपना बखान कुछ ऐसे ही करती हूं।

दीपिका: तो ये आपके नाम के साथ शामिल है, मिडिल नेम जैसा!

दीपिका: हां, यही मेरा फर्स्ट नेम और लास्ट नेम है। मिडिल नेम को भूल जाइए!

अनु: उन्होंने बता था कि अपनी परफॉर्मेंस से आपने अपनी झिझक पर जीत हासिल की। क्या आप ऐसा कर सकती हैं? जैसे जैसे आप एक अभिनेता के तौर पर परिपक्व होते हैं, शायद, आप की झिझक कम हो जाती है? कम से कम कैमरे के सामने, शायद?

दीपिका:  कैमरे के सामने तो हां होती है। मेरे विचार से जो सबसे बड़ी गलतियां मैं करती रही हूं वो यही थीं क्योंकि मैं ऑफ स्क्रीन के शर्मीलेपन को ऑन स्क्रीन भी ले आती थी। और, मैं ये कैमरे के सामने बहुत लंबे समय तक करती रही। जो डायरेक्टर्स ये पता कर ले गए कि मैं कैमरे के सामने थोड़ा झेंपती हूं और उन्होंने ये भी समझ लिया कि इसे दूर कैसे किया जाए और ऐसा उन्होंने किया भी। जैसे कि इम्तियाज़ अली ने लव आजकल में। लेकिन, खुद मैं, मेरे ख्याल से ये कॉकटेल के वक़्त समझ पाई और इसके बाद मैंने इसे बदल भी लिया। मैं कैमरे के सामने ज्यादा फ्री रहती थी, मैं ध्यान खींच सकती थी और एक अलग शख्स दिख सकती थी और कैमरे के सामने मुझे झिझक भी नहीं होती थी।

अनु: लेकिन, जीवन में ये लागू नहीं होता।

दीपिका:  मैं कहना चाहूंगी कि संकोची होने से ज्यादा मैं शर्मीली हूं और थोड़ा अनाड़ी भी लेकिन मेरे ख्याल से समय के साथ साथ मैं बेहतर हो चुकी हूं। लेकिन, मेरा मानना है कि इसमें काफी कुछ हाथ मेरी परवरिश का भी रहा। आप मेरे माता-पिता से मिल चुकी हैं। वे एक खास तरह से बातें करते हैं और एक खास तरह से व्यहार करते हैं और इसी तरह उन्होंने मेरा और मेरी बहन का पालन पोषण किया है। सरल शब्दों में कहूं तो मैं इसके अलावा कोई दूसरा तरीका नहीं जानती।

अनु: पिछले साल आपने ऐक्टर के तौर पर दस साल पूरे किए। क्या आपकी रचनात्मक सोच में कुछ भी बदलाव आया है या एक स्क्रिप्ट चुनने या एक किरदार चुनने की प्रक्रिया अब भी वैसी ही है?

दीपिका: हां, ये वैसी ही है। प्रक्रिया वही है क्योंकि ये हमेशा सोच से आगे बढ़ती है। मेरे विचार से फर्क बस इतना है कि पहले मैं फिल्में करने के लिए उतावली हो जाती थी क्योंकि लगता था कि करने के लिए वही सही हैं।

अनु: एक मस्त प्रोजेक्ट की तरह।

दीपिका: हां, एक बड़े प्रोजेक्ट की तरह क्योंकि कुछ नाम साथ आ रहे हैं और ‘हम स्क्रिप्ट पर बाद में काम कर लेगें लेकिन इसके बारे में एक बड़ा ऐलान कर देना चाहिए।’ मैं पहले ऐसी फिल्में करने के लालच में आ चुकी हूं। लेकिन मुझे लगता है कामयाबी के साथ ही साहस भी आता है। और, इसी आत्मविश्वास के साथ, मैं अब खुद को ये कह सकती हूं, ‘नहीं, जाने दो।’ जिस तरह से मैंने अब तक अपने काम को देखा है, वही तरीका मेरा खुद को देखने का भी सही तरीका है- ये अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है, लेकिन मेरे लिए यही वो तरीका है जो काम करता है। तो आज भले कोई मुझे राज़ी करने की कोशिश कर रहा है वर्ना मैं अपने विचारों को लेकर बहुत आश्वस्त हूं।

अनु: लेकिन, क्या कामयाबी किसी भी तरह कमज़ोर भी करती है? क्या एक कलाकार के तौर पर रिस्क लेने का डर है?

दीपिका: अगर कामयाबी ने कुछ किया है, तो इसने मुझे और साहसी ही बनाया है, इसने मुझे और मुक्त किया है। इसने मुझे रिस्क लेने की सामर्थ्य दी है, खुद को प्रकट करने की ताक़त दी है। ये मुझे किसी बोझ की तरह नही लगती या कि जैसे मेरे पर काट दिए गए हों। मैं खुद को सशक्त महसूस करती हूं, आज़ाद महसूस करती हूं।

अनु: कुछ साल पहले मैंने आपका एक इंटरव्यू देखा था। उन्होंने आपसे पूछा, कि अगर आप ऐक्टर न होतीं तो क्या होतीं? आपने कहा, एक गृहिणी।

दीपिका: हां, और ये बदला नहीं है।

अनु: और आपने कहा कि आप बहुत आसानी से ये सब छोड़कर जा सकती है और एक खुशहाल घरेलू जीवन बिता सकती हैं। ये मेरी समझ में तो नहीं आता! क्या ये सही है?

दीपिका: थोड़ा बहुत। ये मेरे जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बन चुका है कि मेरा ये कहना कि मैं ये सब छोड़कर जा सकती हूं, मुनासिब नहीं होगा। लेकिन मेरे ख्याल से, घरेलू तौर पर, घर, माता-पिता, परिवार, शादी, बच्चे, सबसे जुड़े रहना, मेरी जड़ें- ये सब मेरे लिए बहुत मायने रखता है, अगर ये मेरे पास ना हो तो मैं बहुत ज्यादा अस्त व्यस्त महसूस करूंगी। लेकिन, आज मैं समझ सकती हूं कि कैसे मैं एक कामकाजी पत्नी बन सकती हूं या एक कामकाजी मां बन सकती हूं और इसके बाद भी मैं वह सब कर सकती हूं जो करना मुझे पसंद है और वह भी कामयाबी के साथ।

अनु: हां, और ये एक विकल्प भी नहीं है!

दीपिका: नहीं, ये विकल्प नहीं है। लेकिन, शायद तब मैंने शायद ऐसा सोचा हो क्योंकि मैं बहुत ज़्यादा काम कर रही थी। लेकिन मैं अब खुद को संतुलन बनाते देख सकती हूं। मुझे लगता है कि अगर मैं काम न करूं तो शायद मेरे आसपास के लोगों को मैं पागल कर दूंगी।

अनु: यही तो मैं भी कहती हूं। अगर मैं काम न करूं तो मैं पूरी तरह पागल हो जाऊंगी, तो आपको काम करना ही है। तो ये जो खबरें किसी जल्द होने वाली शादी के बारे में चक्कर काट रही हैं, उसके बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको इन्हें लेकर हंसी आती हैं या आप इस सब तक जाना ही नहीं चाहतीं?

दीपिका: सच कहूं मैं तो ये भी नहीं कहूंगी कि मुझे हंसी आती है। मेरे ख्याल से एक वक्त ऐसा आता है जब आप इन सबसे बेअसर हो जाते हैं।

अनु:  क्या पद्मावत ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि इसकी हर रोज़ खबर बनती थी? मैं कल्पना करती हूं कि किसी मौके पर आपके पास एक कवच भी होना चाहिए, नहीं?

दीपिका: मेरे ख्याल से कवच में छुपने की बजाय मुझे खुलकर सांस लेनी है। कवच बहुत ही दमघोंटू होता है। मेरी ना जाने कितनी बार मंगनी हो चुकी हैं, कितनी बार तो मेरी शादी तक कर दी गई। लेकिन, आपको पता है, ये जो है सो है। मुझे नहीं लगता कि इस सबसे लड़कर कुछ होने वाला है। ये ऐसा कुछ है जो किसी समय मेरे जीवन में पक्के तौर पर होने ही वाला है। ये मेरे लिए एक बहुत महत्वपूर्ण विधि है, उसी तरह से जैसे मैंने अपने माता-पिता को देखा है, अपने चाचाओं और चाचियों को देखा और जैसे कि मेरा पालन-पोषण हुआ है। तो मैं ये नहीं कहने जा रही, ‘शादी मेरे लिए कोई मायने नहीं रखी।’ साथ ही मैं ये भी जानती हूं कि मेरे लिए सही वक़्त कब है, मैं इसे महसूस करूंगी और ये होगा, जब इसे होना होगा।

अनु: दीपिका, आपन दिमागी तंदुरुस्ती के बारे में अक्सर बहादुरी से अपना पक्ष रखती रही हैं। कहीं आप बात कर रही थीं कि कैसे ये इतना फैल चुका है और हम लोगों के लिए ज़रूरी है कि हम इसके बारे में खुलकर बात करे। और आपने कहा कि सोशल मीडिया आपको सीधे अवसाद में ले जा सकता है। लेकिन, हिंदी सिनेमा में एक ऐक्टर होते हुए ये आपका अहम हिस्सा भी बन चुका है! कुछ गिने-चुने लोग ही हैं जो सोशल मीडिया पर नहीं हैं। जिस तरह से ये सोशल मीडिया बेकाबू हो चुका है, उसे कब्ज़े में आप कैसे रखती हैं?

दीपिका:  किफ़ायत से– इस बात की किफ़ायत कि हम इस पर कितना समय खर्च करते हैं। हम रोज़ तो बैठकर हर समय टेलीविजन नहीं देखते। लेकिन सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, हमारे फोन हमारे पास हर वक़्त रहते हैं। पहले ऐसा होता था कि अगर आप अजनबियों के साथ बैठे हैं तो हो सकता है थोड़ी देर थोड़ा बेचैन करने वाली चुप्पी रहे, लेकिन फिर आप एक दूसरे से बातें करने लगते हैं।  लेकिन, अब आपको इस बातचीत की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि मैं दिखावे के लिए व्यस्त रह सकती हूं या वास्तव में अपने फोन पर व्यस्त रह सकती हूं। तो मैं सोचती हूं कि ये संतुलन की बात है। हालांकि आज सोशल मीडिया के कुछ आश्चर्यजनक फायदे हैं, इसने संसार को वाकई करीब ला दिया है – लेकिन, ये हमें एकाकी भी बना रहा है क्योंकि हम अपने आसपास के लोगों से जुड़ नहीं रहे हैं। कभी कभी ऐसे लम्हे भी आते हैं जब आप अपने बारे में ही अच्छा महसूस नहीं करते क्योंकि आप किसी दूसरे के जीवन के बारे में उसके विचार देख रहे हैं – लेकिन यही उनका पूरा जीवन नहीं है। बहुत थोड़े लोग होते हैं ऐसे जो अपना रोते हुए का वीडियो या ऐसी ही कोई पोस्ट डालेंगे। ये हक़ीक़त नहीं है।

अनु: ये एक तमाशा है।

दीपिका: ये तमाशा ही है। मैं तो ये भी नहीं कहूंगी, ये तो बस किसी के जीवन का बहुत ज़रा सा हिस्सा है। लेकिन यही इकलौती चीज़ है जो आप लोगों को दिखाना चाह रहे हैं, और आप सोचने लगते हैं कि ऐसा केवल किसी दूसरे के साथ ही हो रहा है और ‘मेरी ज़िंदगी इतनी खूबसूरत क्यों नहीं है?’ ये एक तरह का कपट है।

अनु: क्या आप हमेशा सचेत रहती हैं कि आप इस पर कितना वक़्त जाया कर रही हैं?

दीपिका: हां, मैं सचेत रहती हूं।

अनु: आपको इंस्टाग्राम की भी लत नहीं है?

दीपिका: नहीं।

अनु: क्योंकि ये इतना आसान है!

दीपिका: मैं अपने एहसासों और अपने विचारों को लेकर हमेशा सजग रहती हूं, तो मुझे जब लगता है कि मैं उधर जा रही हूं, तो मैं शांति से अपना फोन दूर रख देती हूं और उससे दूर चली जाती हैं, और कुछ ज्यादा उपयोगी करने की कोशिश करती हूं, जैसे कि पढ़ना या अपना घर साफ करना।

अनु: आप बहुत बड़ी सफाई पसंद भी है, नहीं?

दीपिका: अस्त व्यस्त चीजों को ठीक करते रहना मुझे पसंद है।

अनु: ठीक कहा आपने!
दीपिका, पश्चिम में कुछ बहुत ताक़तवर महिलाओं जैसे मेरिल स्ट्रीप, प्रोड्यूसर शोंडा राइम्स, रीद विदरस्पून, इन लोगों ने टाइम्स अप मूवमेंट के लिए बहुत सारा चंदा दिया है, ये अभियान महिलाओं के खिलाफ फिल्म इंडस्ट्री में होने वाले भेदभाव के खिलाफ एक सुनियोजित तरीके से संघर्ष करने की कोशिश कर रहा है। क्या आपको लगता है कि ऐसी किसी चीज़ की ज़रूरत यहां है?

दीपिका: बिल्कुल, मैं निश्चित तौर से इसका समर्थन करूंगी, लेकिन मैं ये भी सोचती हूं कि इसे लिंग तटस्थ रहना भी उतना ही ज़रूरी है।

अनु: सिर्फ महिलाओं के लिए ही नहीं।

दीपिका: हां, हालांकि मैं सोचती हूं कि हमारे देश में महिलाओं को सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन कुछ पुरुष भी हैं जिनकी सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। मुझे नहीं लगता कि ये पुरुष और महिला के बीच के संग्राम में बदल जाए। मेरे ख्याल ये सही और गलत के बारे में है।

अनु: सही बात। अच्छा बताइए, अब आपके लिए क्या है? आप क्या पसंद करने वाली हैं?

दीपिका:  वेल, एक फिल्म थी विशाल के साथ जो मैं कर रही थी वह फिलहाल नहीं हो रही है, लेकिन जहां तक फिल्मों की बात है तो कुछ ऐसी ऊर्जाएं हैं जिन्हें मैं एक खास दिशा में इस्तेमाल करना चाहती हूं और मेरे ख्याल से मैं इसी तलाश में हूं।

अनु: क्या आप अब भी एक अच्छी सी, रोमांटिक फिल्म करना चाहती हैं?

दीपिका: हां, मेरा नज़रिया नहीं बदला है, मैंने आपको बताया भी! मैं अब भी कुछ ऐसा करना चाहती हूं जो सार्थक हो। मैं आपको बता नहीं सकती कि कितने लोग मेरे पास आए और बोले, ‘क्या आप एक और ये जवानी है दीवानी कर सकती है?’ मैं दुआ करती हूं कि मुझे कुछ मेरे मन का मिले।

अनु: क्या बात कर रही हैं, आप दीपिका पादुकोण हैं, आपके पास चुनने के लिए रोमांटिक स्क्रिप्ट्स नहीं हैं?

दीपिका: लोग बहुत ज़्यादा बना भी नहीं रहे!

अनु: सच में?

दीपिका: हां, हर कोई बस किसी वजह से बायोपिक्स बना रहा है। मुझे नहीं पता क्यों! और, स्पोर्ट्स बायोपिक्स! हर कोई स्पोर्ट्स बायोपिक बनाना क्यों चाह रहा है!

अनु: आप चाहती हैं कुछ ऐसा जो दिल को छू जाए?

दीपिका: हां, थोड़ा बहुत। मस्ती और हल्की फुल्की सी फिल्म। यही मेरा ब्रीफ है।

अनु: हां, मैं कल्पना कर सकती हूं। संजय भंसाली के साथ तीन फिल्मों के बाद, आपको मस्ती और कुछ हल्का फुल्का चाहिए ही होता है!

दीपिका: हां, मुझे मस्ती भरी और हल्की फुल्की फिल्म करनी है।

अनु: और, अब तक ये आपके पास आई नहीं है?

दीपिका: नहीं।

अनु: तो फिल्में बनाने वालों, आओ, आओ! यहां ये हैं, एक मस्ती और हल्की फुल्की फिल्म के इंतज़ार में! और, बाकी क्या? इन दिनों आप क्या कर रही हैं?

दीपिका: मैं अपने माता-पिता का घर पूरा करने में उनकी मदद कर रही हूं। वे अपना घर सजा रहे हैं और मैं ये करने में उनकी मदद कर रही हूं। मैं अपने घर की कभी न खत्म होने वाली साज-संभाल कर रही हूं और मुझे इसे करने में मज़ा भी आता है। तो मेरे लिए ये तनाव वाली बात नहीं और न ही ये रोज़ का उबाऊ काम ही है, मुझे ये करते हुए आनंद आता है।  अपना ऑफिस भी सेटअप कर रही हूं, ये महीने का आख़ीर था तो मैं उस सब का भी ख्याल रख रही हूं – खातों को हिसाब करना, खातों की किताबें संभालना, पेपरवर्क, जो मुझे अच्छा भी लगता है। थोड़ी सी प्रिटिंग, थोड़ी सी स्टैपलिंग, थोड़ी सी फाइलिंग, थोड़ी सी ई मेलिंग…

अनु: हिंदी सिनेमा की नंबर वन ऐक्टर की रोमांचक जिंदगी!

अनु: मैंने अपनी अलमारी का एक हिस्सा साफ किया है क्योंकि मुझे अपनी अलमारियां हर कुछ महीनों बाद साफ करनी होती हैं, नहीं तो इतने कपड़े हैं और इतना सब है करने को।

अनु: ये समस्या तो अच्छी समस्या है…

दीपिका: मैंने एक हिस्सा साफ किया, मुझे अभी दूसरा हिस्सा साफ करना बाकी है, बहुत सारी सफाई करनी है!

अनु: मैं यकीन नहीं कर पा रही है कि आप सफाई को लेकर इतना उत्साहित हैं!

दीपिका: मैं आपको बता नहीं सकती कि इसमें मुझे कितना आनंद आता है! मेरा खूबसूरत दिन कुछ इस तरह होता है, सुबह उठो, दक्षिण भारतीय नाश्ता करो, जिम जाओ…

 

अनु: आप इडली डे को लेकर वाकई बहुत खुश थीं।

दीपिका: मैं बहुत ज्यादा खुश थी! मुझे नहीं पता था कि वर्ल्ड इडली डे भी होता है! और ये दो दिनों से ट्रेंड कर रहा था! मैं बहुत खुश थी। हालांकि इडली डे पर मैंने डोसा खाया – इडली के साथ मैंने धोखा किया।

अनु: तो आप दक्षिण भारतीय नाश्ता करती हैं, और क्या कुछ करती हैं अपने इस खूबसूरत दिन पर?

दीपिका: जिम जाओ। फिर वापस आओ, फिर फल और सब्ज़ियों का जूस पियो। अब मैं आपको सब कुछ विस्तार से बता रही हूं। फिर फिर कुछ वैसा करो, जिसे रणवीर ‘फटाफट’ कहता है, क्योंकि उसे लगता है कि मैं कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकती।  

अनु: फटाफट क्या होता है?

दीपिका: फटाफट जैसे बस हमेशा फट-फट-फट-फट। मैं एक जगह बैठकर और बस एक काम नहीं कर सकती। मैं हमेशा कुछ न कुछ करती ही रहती हूं, फिर चाहे वो दफ्तर हो या घर में। फिर मैं लंच करती हूं। फिर मैं कुछ-कुछ-कुछ-कुछ करती रहती हूं। फिर शाम को- निर्भर करता है। शायद मसाज, शायद नहीं। नेटफ्लिक्स, डिनर, मम्मी-पापा से बातें। तो ये एक तरह का दिन होता है। दूसरी तरह का दिन होता है, जिम जाओ, वापस आओ, मीटिंग्स-मीटिंग्स-मीटिंग्स, नरेशन्स-नरेशन्स-नरेशन्स (कहानियां सुनना) सब मिला के, शाम को- नेटफ्लिक्स, डिनर। हां, यही कर रही हूं मैं इन दिनों!

अनु: ये बहुत खुशनुमा है, लेकिन मैं चाहती हूं कि वो हल्की फुल्की फिल्म जल्दी शुरू हो।

दीपिका: और कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब मैं बेंगलुरू जाया करती हूं और घर की भीतरी साज सज्जा में मां की मदद करती हूं। तो ऐसे दिन भी होते हैं।

अनु: तो आप एक कर्तव्यनिष्ठ पुत्री भी हैं।

दीपिका:  हां, होना ही होगा।

अनु:  ये बहुत सुंदर है।

दीपिका: इसकी उम्मीद की जाती है, मांग भी की जाती है और मुझे ये करना अच्छा भी लगता है।

अनु: ये वाकई बहुत आनंददायक है। ओके, मैं अब बातों का ये सिलसिला रोकना चाहती हूं, लेकिन चूंकि आपने रणवीर का नाम लिया तो मुझे पूछना ही होगा, मुझे याद है आपने फोर सीजंस होटल में एक पार्टी रखी थी, याद है वो पार्टी? किस खुशी में थी वो? हम सबको गोल्ड कलर पहनने को कहा गया था।

दीपिका: सिर्फ मौज-मस्ती के लिए।

अनु:  हां, ये मस्ती के लिए ही था, आप लगातार शानदार कामयाबियां पा रही थीं, हिट पर हिट।

दीपिका: ये 2013 की बात है और मेरी चार फिल्में मेगा हिट्स हुई थीं, एक के बाद एक। मुझे लगा कि मैं सबसे एक साथ नहीं मिली हूं और ये बस एक जश्न था।

अनु: मुझे याद है और ये ब्लैक और गोल्ड था, है ना? मुझे ये अच्छी तरह से याद है। मैं और रणवीर तकरीबन एक साथ अंदर आए थे और उन्होंने कुछ पहन रखा था- मुझे तो पता भी नहीं कि वो क्या था, लेकिन ये तड़क भड़क वाला ब्लैक और गोल्ड था। और आप बस खिलखिला पड़ीं और आपने कहा, ‘तुम सोफा जैसे लग रहे हो!’

दीपिका: मेरे ख्याल से ये मैं उसे कई बार बोल चुकी हूं!

अनु: मेरा तो हंसते हंसते बुरा हाल था। क्या आप उनसे उनके कपड़ों के बारे में बातें करती हैं?

दीपिका: हां, वो करता तो बहुत तगड़ी वाली कोशिशें है मेरा अप्रूवल लेने की लेकिन मेरे ख्याल से जीवन में ईमानदार होना बहुत जरूरी है और मैं तो बिना बनाए बातें करने के लिए ही जानी जाती हूं। तो, हां…

अनु:  दीपिका, धन्यवाद!

दीपिका:  धन्यवाद आपका!

अनु: और मैं उम्मीद करती हूं कि मस्ती भरी और हल्की फुल्की फिल्म जल्द बने।

दीपिका: मैं भी उम्मीद करती हूं।

अनु: हम आपको परदे पर देखना चाहते हैं।

दीपिका: इन एहसासों और संदेशों का प्रचार ज़रूर करें।

अनु: बिल्कुल। धन्यवाद।

दीपिका: धन्यवाद।

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