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मुझे मालूम है कि आप डोंट वरी, ही वोंट गेट फार आॅन फुट के लिए सिनेमाहॉल के बाहर लाइन लगाने वाले हैं। आख़िर वो गस वान सांत की फ़िल्म है। उसमें जॉकिन फ़ीनिक्स जैसा अभिनेता है। ऐसे दारूबाज़ की कहानी जो कार क्रैश में पैरेलाइज़ होकर एक मशीनी व्हीलचेयर पर अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहा है, आैर फिर एक दिन अचानक विवादास्पद कार्टूनिस्ट की भूमिका में अपने जीवन का उद्देश्य पा जाता है। लेकिन यह तो निर्देशक के अपने देखे-भाले इलाके की कहानी है। वही कथा जिसपे उनका ठप्पा रहा है, जिसमें किसी परेशान आत्मा को अन्तत: एक तारणहार मिलता है आैर उसके सहारे वो अपनी ज़िन्दगी के बिखरे पुर्जे समेटता है। क्यों ना इसे हम गुड व्हील हंटिंग कहें!

या हो सकता है कि आप स्पाइक ली की ब्लैककेक्लांसमैन देखना चाहें। सही है कि ये धमाल फ़िल्म है, लेकिन ये तो जल्द ही किसी स्ट्रीमिंग नेटवर्क पर आ ही जाएगी। तो फिर अगर स्याह सिनेमा देखने की चाहत है तो क्यों ना लिकारियन वनैना की सुपा मोडो देखी जाये? ये सच में पब्लिक के मन को भा जानेवाली फ़िल्म है, जिसमें जानलेवा बीमारी का शिकार एक नौ साला बच्चा सुपरहीरो बनने का ख़्वाब देखता है। आैर यह ऐसी फ़िल्म है जो आपको फ़ेस्टिवल सर्किट के बाहर आसानी से देखने को नहीं मिलेगी।

या फिर लेव डियाज़ की सीज़न आॅफ़ दि डेविल देखें। इस फ़िलिपींस के निर्देशक की तक़रीबन चार घंटे लम्बी फ़िल्म में डूबने का ऐसा सुनहरा मौका दोबारा कहाँ मिलेगा? विश्वास करेंगे, डियाज़ की पिछली महागाथा ए ललाबाय टू दि सॉरोफ़ुल मिस्ट्री तो करीब-करीब आठ घंटे लम्बी थी! घर पर कभी ऐसी फ़िल्म देखने की कोशिश करें, कभी सफ़ल नहीं होंगे। सिनेमाघर का अंधेरा निर्वात जो दिमाग़ को मोहलत देता है, वही इस तरह की फ़िल्मों को देखे जाने की चाबी है। आैर इसी दिमाग़ी मोहलत को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत हैं ये 10 फ़िल्में, जिन्हें इस साल किसी भी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में आपकी मस्टवॉच लिस्ट में होना ही चाहिए। इसलिए नहीं कि वे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्में हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उनकी विविधता लाजवाब है आैर फ़िल्मोत्सव ऐसी रँग-बिरँगी फ़िल्मों से ही गुलज़ार होते हैं।

एश इज़ प्योरेस्ट व्हाइट (जिया झांगके)

ये एक गैंग्सटर आैर उसके साथ एक लड़की – बिन आैर कियाअो, की गाथा है जो 2001 से 2018 के सालों में पसरी है। चाइनीज़ मार्शल आर्ट विद्रोहियों जियांगहू के अन्डरवर्ल्ड कोड में बंधी है दोनों की कहानी। जैसे इन सालों में चीन बदलता है वैसे ही दोनों के बीच के संबंध बदलते हैं। यह अदृश्य नियमों में बंधी ज़िन्दगी अबोली पीड़ा दे जाती है, आैर एश इज़.. का सबसे बेहतरीन वो मध्य भाग है जहाँ ये 50 के दशक के हॉलीवुड की “वूमन्स पिक्चर” की याद दिलाती है। कियानो बिन से दूर थी, आैर अब वो उस तक वापस लौटकर आने के रास्ते तलाश रही है। उसके पैसे चुरा लिए गए हैं। उससे भी बुरा, बिन अब किसी आैर के साथ है। पर वो बुरा आदमी नहीं। “कंगाली ने तुम्हें बदल दिया है” वो कहता है। इसके कुछ ही पल बाद एक सपनीली धुन पर कियानो देखती है… यूएफ़अो। एश इज़.. के कम से कम पाँच अन्त हैं, लेकिन इस कहानी के उतार-चढ़ाव भी उतने ही दिलचस्प हैं जितने वो दिल तोड़नेवाले हैं।

कोल्ड वॉर (पावेल पाव्लिकोवस्की)

इस क़िस्म का जुनून, यंत्रणा आैर परेशान कर देने की हद तक निराशा से भरा रिलेशनशिप ड्रामा आप सिर्फ़ फ़िल्मों में पाते हैं। इस तरह की कहानियों का अपना एक जॉनर बन चुका है अब तो। 50 के दशक के पोलैंड में विक्टर आैर ज़ूला की मुलाकात से शुरु हुई यह कहानी यूरोप में मुल्क की सीमाअों के पार इधर से उधर भटकती रहती है,  जिसमें शीतयुद्ध की राजनैतिक हतबंदियाँ सबसे ख़ास बाधा बनकर उभरती हैं। दो ही पलों की मुलाकात में विक्टर आैर ज़ुला ऐसे एक-दूसरे के पागल मोह में पड़ते हैं कि अमर प्रेमकथा व्हुदरिंग हाइट्स भी उनके सामने बच्चों की कहानी लगने लगे। निर्देशक पाव्लिकोवस्की को मालूम है कि दर्शक यह कहानी हजारों बार सुन चुके हैं (हाल में ए स्टार इज़ बॉर्न आैर न्यू यॉर्क न्यू यॉर्क में) इसलिए वो तमाशों का मोह छोड़ हमें इमोशन की तह में ले जाते हैं। यहाँ टूटे दिल वाले पति या पत्नी नहीं, रिश्ते में उपेक्षित छूटे बच्चे नहीं, सीख देनेवाले दोस्त नहीं। यहाँ बस खुद से बाहर ना देख पानेवाला आत्महंता प्यार अपनी पूरी शुद्धता में मौजूद है।

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दि आइज़ अॉफ़ आर्सन वेल्स (मार्क कोसिंस)

फ़िल्मकार का सिनेमायी परदे पर लिखा प्रेमपत्र जिसमें किसी इतिहासकार की अधिकारपूर्ण वाणी नहीं, एक चाहनेवाली की दुलार से भरी कोमलता सुनायी देती है। बरसों पहले गुज़र गए निर्देशक को आज की आधुनिक दुनिया की सैर करवाते हुए कोसिंस अपने स्मार्टफ़ोन से खेलते दो व्यक्तियों के पास आकर ठिठक जाते हैं, “आह! आैर इस इंटरनेट का आप क्या करते मिस्टर आर्सन?” इस दस्तावेज़ी फ़िल्म का जन्म उस वक्त हुआ जब कोसिंस को आर्सन वेल्स के बनाए सैकड़ों निजी रेखाचित्रों आैर पेंटिंग्स का खज़ाना हाथ लगा। उनका मन यह देखकर अभिमान से भर गया कि वेल्स के कलाकार रूप ने वेल्स के फ़िल्मकार रूप को बहुत कुछ सिखाया है। उन्होंने वेल्स के बनाए रेखाचित्रों की तुलना उनकी फ़िल्मों में आयी चमत्कारिक छवियों से की। सिर्फ़ सिटिज़न केन ही नहीं, बल्कि दि मैग्निफिसेंट एम्बरसंस, चाइम्स एट मिडनाइट, दि लेडी फ़्राम शांघाई, अॉथेलो, मैकबैथ आैर सबसे ख़ास दि ट्रायल जैसी फ़िल्मों के साथ भी। इतने प्यार के साथ खोजकर निकाली गयी आैर उस फुटेज को जोड़कर बनायी गई इस फ़िल्म को देखना मनमोहक है।

दि हाउस दैट जैक बिल्ट (लार्स वॉन ट्रायर)

कहा जा रहा है कि निर्देशक लार्स वॉन ट्रायर यहाँ सिनेमा के परदे पर अपनी आत्मकथा कहने के सबसे नज़दीक आ गये हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “मेरी तो यही राय है कि अगर आप सोच सकते हैं, तो आप उसे दिखा भी सकते हैं।” आैर फ़िल्म भी ऐसे सीरियल किलर जैक के बारे में है जिसका लाइफ़ में ध्येयवाक्य लगता है, “अगर मैं इसे सोच सकता हूँ, तो मैं ऐसा कर भी सकता हूँ।” फ़िल्म का शीर्षक भी इसकी बानगी लगता है, जहाँ ‘निर्माण’ की बात है। देखिए.. जैक घर बना रहा है, वॉन ट्रायर फ़िल्म बना रहे हैं। वॉन ट्रायर की फ़िल्म देखना जैसे किसी मनोवैज्ञानिक जांच से गुज़रना है। क्या आप उस किस्म के इंसान हैं जो किसी पक्षी को (या महिला को, बच्चे को) मारे-काटे जाते, उनकी चीरफ़ाड़ होते देख सकते हैं? आैर अगर आपका जवाब ‘हाँ’ है तो फिर आप किस किस्म के इंसान हैं? कहते हैं कि महान कला आपको चीजों पर सवाल उठाना सिखाती है। आैर इससे बड़ा सवाल अाख़िर किसी इंसान के लिए आैर क्या होगा।

इन दि आयल्स (थॉमस स्टबर)

क्रिश्चियन (फ्रांज़ रोगोवस्की) समकालीन पूर्वी जर्मनी में स्थित एक थोक ब्रिक्री के सुपरमार्केट में काम पर रखा गया सबसे नया कर्मचारी है। जैसे स्टैनली कूबरिक ने 2001: ए स्पेस अॉडेसी में अंतरिक्ष के अनन्त विस्तार में स्पेसशिप की नृत्यरूपी गति को दिखाने के लिए ब्लू डैन्यूब वॉल्टज़ की संगीतमय धुन का इस्तेमाल किया था, स्टबर भी ठीक उसी तरह इस धुन का इस्तेमाल करते हैं। आेपनिंग सीन में वे आधी रात को ख़ाली गोदाम में ढुलाई मशीन की सधी हुई गतियों को इस सम्मोहक धुन में पिरो देते हैं। यह विशालकाय जगह अपने अनन्त गलियारों के साथ उसी प्रकार का निर्जीव ख़ालीपन भीतर समेटे है, जैसे अंतरिक्ष। इधर क्रिश्चियन स्टोर के कंफेक्शनरी सेक्शन में काम करनेवाली मैरियन को चाहने लगता है। लेकिन इस फ़िल्म को आप ठीक-ठीक रोमांस नहीं कह सकते। यह मशीनी होती दुनिया में काम करनेवाले ऐसे पेशेवरों की कहानी है जो भावनात्मक सहारे के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यहाँ ठहाकों में भी गहरी उदासी घुली है। आैर यह उदासी आपके भीतर गहरे उतर जाती है।

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दि इमेज बुक (ज्याँ लूक गोदार)

यह फ़िल्म – अगर इसे फ़िल्म कहा जा सकता है तो – आधुनिक अरब समाज की जांच-पड़ताल बतायी गयी है। लेकिन पहले पूरे घंटे यह आँखों को थका देनेवाली आवाज़ों आैर दृश्यों का कोलाज भर है। लारेंस आॅलिवर हेमलेट बने दिखायी देते हैं, पीछे से किसी मुर्गे की बांग सुनायी देती है आैर भगवान जाने कहाँ से परदे पर अचानक एक विस्फोटक बादल फ़ट पड़ता है। स्क्रीन की लम्बाई-चौड़ाई (आस्पेक्ट रेशियो) भी लगातार बदलती रहती है। पीछे चलती गोदार की ख़राश भरी आवाज़ भी अलग-अलग स्पीकर से सुनायी देती है। कई बार तो एक ही वाक्य के अलग-अलग शब्द सिनेमाहॉल में भिन्न कोनों से सुनायी देते हैं। कहना होगा कि जिस आज़ाद धुन पर गोदार की यह फ़िल्म चलती है, उसे सिर्फ़ वही सुन सकते हैं। लेकिन इस ‘पोस्ट-ट्रूथ’ अवस्था में पहुँची दुनिया में गोदार जिस तरह ध्वनियों आैर छवियों से खेलते हैं, सम्मोहित करने वाला है। इस फ़िल्म पर कुछ भी लिखना मुश्किल है, क्योंकि इसमें अर्थ का अनर्थ हो जाने का खतरा है। इसे सिर्फ़ खुद देखकर अनुभव किया जा सकता है, महसूस किया जा सकता है।

लॉंग डेज़ जर्नी इन टू नाइट (बी गन)

अगर आपने बी गन की पिछली फ़िल्म काइली ब्लूज़ देखी है तो आप उनकी फ़िल्म की टोन जानते हैं। यहाँ अपिचापॉग विरासेथकुल की सम्मोहक कहानी कहने की शैली में वॉंग-कर-वाई की नियॉन लाइट में डूबी सपनीली छवियाँ मिला दी गयी हैं। फ़िल्म का प्लॉट भी पिछली फ़िल्म से मिलता-जुलता है। लुअो हॉंगवू काइली वापस लौटा है उस महिला की तलाश में जिसे वो प्यार करता है, जबकि काइली ब्लूज़ में नायक अपनी रिश्तेदार को ढूंढ रहा था। अन्तर बस यही है कि यहाँ लॉंग डेज़.. में फ़िल्म के लगभग अन्तिम 50 मिनट परदे पर लम्बे एक ही टेक में घटते हैं, वो भी थ्री-डी में। आैर यह बस चमत्कार पैदा करने के लिए नहीं। फ़िल्मकार आपको चौंकाना नहीं चाहता ऐसा करके, बल्कि वो तो आपको मुख्य किरदार के अनुभव से एकाकार करना चाहता है। वो आपको ऐसी रहस्यमयी सुरंग में ले जाता है जिसका सिरा आपके अवचेतन से जुड़ता है। यह आँखें चौंधिया देनेवाला स्वप्न प्रसंग खुद में नायाब है।

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रोमा (अलफौंसो कूरॉन)

यह मैक्सिको सिटी में 1970 के दशक में रहनेवाले एक मध्यवर्गीय परिवार के जीवन का एक साल का लेखाजोखा है – घर में काम करनेवाली क्लेअो जिसके केन्द्र में है। कथानक इसका बहुत लम्बा-चौड़ा नहीं। जैसे बहुत सारी बिखरी घटनाअों को आपस में जोड़कर एक कलाकृति बनायी जा रही हो। फ़िल्म का मूड इन बिखरे तिनकों को जोड़नेवाला गोंद है। स्याह सफ़ेद रंगों में शूट की गयी यह फ़िल्म गवाही देती है कि जब कोई महान फ़िल्मकार फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी भी अपने हाथ में लेता है, तो आैर भी कमाल रचना बनती है। कूरॉन की पहचान उनका अनवरत चलता ट्रैकिंग शॉट है। यह ट्रैकिंग शॉट कभी एक्शन के बीच में कूद पड़ता है जैसे उसका अभिन्न हिस्सा हो, तो कभी घटनास्थल के साथ-साथ चलता है किसी गवाह की तरह। जब वो ज़मीन से समन्दर का शॉट लेते हैं, आैर फिर वापस ज़मीन पर लौटते हैं तो ऐसा एहसास नहीं होता जैसे समय की धारा कहीं टूट गई है (जैसा एडिटिंग में होता है), बल्कि लगता है जैसे हम वक्त की अनवरत धारा में बहते चले जा रहे हैं। यह चमत्कारिक है।

शॉपलिफ़्टर्स (हिरोकाज़ू कोरेदा)

यह भीतर तक असर करनेवाली कहानी टोक्यो में रहनेवाले ऐसे खुशमिजाज़ (पर गरीब) परिवार पर केन्द्रित है जिसने बिना कागज़ी कार्यवाही पूरी किये एक बेघर बच्ची को गोद लिया है। ऐसी बच्ची जिसका शायद शोषण हुआ है। फ़िल्म का शीर्षक परिवार के ‘पेशे’ की आेर इशारा करता है। अब ऐसे अच्छे इरादों का भी क्या करें जो बच्चे को परंपरा से मिली बुरी आदतें भी सिखा दे? अगर यह सब कहानी सुनकर चैप्लिन की दि किड याद आती है तो यह संयोग नहीं। चैप्लिन की तरह ही कोरेदा का फ़िल्ममेकिंग स्टाइल भी हास्य आैर करुणा के बीच में खेलता है। कोरेदा वयस्क संबंधों को भी गज़ब के पैनेपन के साथ कुरेदते हैं − उदाहरण के लिए एक सेक्स सीन यहाँ सिर्फ़ आनंद का हासिल नहीं, वो छुटकारा भी है इस जीवन के यंत्रणाभरे चक्र से। फ़िल्म का अन्त दिल तोड़ देनेवाला है आैर हमें अपने तमाम रिश्तों पर फिर एक नई नज़र डालने के लिए मज़बूर करता है।

दि वाइल्ड पियर ट्री (नूरी बिल्जे चेलान)

सिनान कॉलेज के बाद घर लौटा है। छोटे से कस्बे में ये बड़ी खबर है। सिनान ड्राइवर बनना चाहता है, लेकिन इससे भी ज़्यादा वो इन ‘छोटी सोच वाले’ लोगों से छुटकारा चाहता है। फ़िल्म विभिन्न किरदारों से सिनान के नपेतुले संवादों को दर्ज करती चलती है − अपने माता-पिता के साथ, दादा-दादी के साथ, वो लड़की जिसे वो स्कूल में जानता था आैर उस परिषद सदस्य के साथ जिससे वो अपनी किताब के प्रकाशन के लिए लोन के सिलसिले में मिलने जाता है। ये साधारण लगते संवाद अपने भीतर कितनी सूक्तियाँ समेटे हैं। अपनी ज़मीन से जुड़े होते हुए भी यह दुनियावी सच बताते हैं। उनकी पिछली फ़िल्मों की तरह ही यह कमाल की फ़िल्म भी इस ‘आॅडियो-विज़ुअल मीडियम’ में से आेझल हो गए ‘आॅडियो’ को वापस फ़ोकस में लाती है। यहाँ संवाद परदे पर घट रही घटनाअों को समझाने वाली भूमिका में नहीं हैं। यहाँ संवाद की खुद घटना हैं आैर वे हमें इस जगह आैर इसके लोगों के बीचोंबीच ले जाते हैं। फ़िल्म का अन्तिम हिस्सा खुद चेलान के लम्बे फ़िल्मी करियर का सबसे कवितामय आैर भावुक कर देनेवाला प्रसंग है।

Adapted from English by Mihir Pandya

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