नायक पैदा नहीं होते। जब इंसान अपने परिवार की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तभी वो नायक बनता है। एक है शहर का शहंशाह (पंकज त्रिपाठी), अपराध की दुनिया का ऐसा सरताज जिससे सब ख़ौफ़ खाते हैं आैर जो अपने कालीन के धंधे की आड़ में हथियारों आैर ड्रग्स का धंधा चलाता है। शहंशाह अपने बिगड़ैल बेटे में सल्तनत के तख़्त पर बैठने के ख़्वाब पनपते देख रहा है। एक है शहंशाह का विश्वासपात्र (शाजी चौधरी), जो अपने मालिक की खूंरेजी विरासत को संभाले रखने की जुगत बिठा रहा है। एक है असंतुष्ट शहज़ादे का वफ़ादार दोस्त (अभिषेक बनर्जी), जो अपने यार के लिए कुछ भी कर जाने को तैयार बैठा है। एक है अपाहिज मुखिया (कुलभूषण खरबन्दा), जो अब टेलिविज़न पर जंगली जानवरों के प्रेमालाप देखा करता है आैर अपने कुटुम्ब की स्याह गतिविधियों को कौतुक से निहारा करता है। एक है बिस्तर पर अपने अधेड़ पति के ‘प्रदर्शन’ से नाखुश जवान स्त्री (बेख़ौफ़ रसिका दुग्गल), जिसे घर की चौहद्दी के भीतर किसी अन्य उपजाऊ बीज की चाह है।

दो महत्वाकांक्षी भाई (अली फ़ज़ल, विक्रांत मैसी) हैं, जिन्होंने डॉन की सल्तनत को जमाने में अपनी पढ़ाई कुर्बान कर दी। अब वो लड़ रहे हैं अपनी जगह, खुद अपनी पहचान बनाने को। एक खुद्दार वकील (राजेश तैलंग, जिनका एनडीटीवी के रविश कुमार से साम्य जाहिर है) है, जो अपने दोनों बेटों को अपनी आंखों के सामने ईमानदारी भरी कामकाजी ज़िन्दगी पर अपराध को चुनते देख रहा है, असहाय। एक कॉलेज में पढ़नेवाली लड़की (श्वेता तिवारी) है, जो स्टूडेंट यूनियन के चुनावों में अध्यक्ष के लिए प्रचार में उतरकर सत्ता को सीधे चुनौती देती है। उधर उसकी आज़ाद ख़्याल बहन (श्रेया पिलगांवकर) एक अपराधी लड़के के प्रेम में पड़ जाती है। क्षत्रप का दूसरा विपक्षी (शुभ्रज्योति भरत) सत्तासीन को सत्ताच्युत कर अपना वनवास ख़त्म करना चाहता है। आैर इनके बीच आगमन होता है कर्तव्यनिष्ठ पुलिसवाले (अमित सियाल) का, व्यवस्था की पुन:स्थापना करने।

ये तमाम छोटी-छोटी फ़िल्मी कहानियाँ हैं जो आपस में मिलकर आकार देती हैं मिर्ज़ापुर की महागाथा को। हर गाथा में ताक़त है दुस्साहसी हिन्दुस्तानी देहात का वही जाना-पहचाना रूपक होने की। हर गाथा जैसे पहले से नियत पथ पर चलने को तैयार। लेकिन, इन परिचित कहानियों के मध्य खड़ा है वो किरदार जिसे अपने चारों आेर घट रही इन फ़िल्मी कहानियों से चिढ़ है। नतीजा, वो इनका खेल बिगाड़ने निकल पड़ता है। सिनेमा के चंद सबसे यादगार मनोरोगी किरदार वो हुए हैं जिन्होंने खलनायक की भूमिका का अतिक्रमण करते हुए पूरी फ़िल्म की संरचना में तोड़फोड़ मचा दी। ‘दूत अराजकता के’ कहा था उनको एक शातिर जोकर ने, याद हो तो। मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येन्दु शर्मा) वही हंसोड़ बिगड़ैला शहज़ादा है मिर्ज़ापुर का, जिसने इस नौ एपीसोड की महागाथा के पहले ही सीन में फ़िल्मी खलनायकी को अपने सर के बल खड़ा कर दिया है।

नशे में चूर आैर पिता की तानाशाही से अकताया मुन्ना अचानक सड़क पर रास्ता रोकती शादी की बरात से टकरा गया है। भड़ककर वो बरात के बीच जा घुसता है आैर अपनी बन्दूक निकाल लेता है। दोस्त हैरान, तैयार हैं कि ‘ठांय ठांय’ की आवाज़ बस आती ही होगी। पर मुन्ना सूंघ लेता है कि तमाम निगाहें उसी पर हैं। उसे डरे हुए, कांपते लोग पसन्द हैं। आैर अचानक वो गोली चलाने के बजाए बरात के साथ नाचने लगता है। अप्रत्याशित, जैसे हमारी कल्पना में मौजूद सिनेमायी यथार्थ को धता बता रहा हो। आैर कुछ ही पलों बाद गोली चलती है, आैर गफ़लत में दूल्हे का भेजा उड़ जाता है। मुन्ना खिलखिला देता है।

यह कमाल का मौका है − ऐसा पल जिसके पूरे मतलब सीज़न के अंतिम हिस्सों में जाकर खुलते हैं। मुन्ना एक शादी के रिसेप्शन में बिन बुलाए घुस जाता है। याद आती है वो कुटिल मुस्कान जो दि डार्क नाइट में जोकर के चेहरे पर थी, जब वो हार्वे डेंट की फंडरेज़र पार्टी में ऐसे ही बिन-बुलाए जा घुसा था। मुन्ना लड़की को अगवा करते हुए कुछ इस अदा से उठाता है जैसे कोई सिनेमायी डांस मूव हो। पीछे बॉलीवुड का मशहूर गाना बजता है। जैसे फिर वो फ़िल्मी ठसक की नकल कर उसका मखौल उड़ा रहा हो। मिनट भर बाद वो रुकता है आैर भयभीय तमाशबीनों के लिए पोज़ करता है, आैर उनकी कल्पना से परे जाते हुए एक इंसान की खोपड़ी उड़ा देता है। मुन्ना के किरदार की अप्रत्याशित अदा दरअसल पूरे शो में मौजूद ‘शॉक वैल्यू’ की प्रतिबिंब है।

मिर्ज़ापुर में मौजूद सेक्स आैर हिंसा अति की हद को छूने वाली है − कटी हुई उंगलियां, फटे हुए पेट, गुप्तांगों का काटा जाना, झुलसते शरीर, भद्दी गालियाँ आैर चाहत भरे चीत्कार यहाँ आम हैं। पहली नायिका का परिचय दृश्य ही लाइब्रेरी के एक कोने में मास्टरबेशन सीन है। दूसरी नायिका तो जैसे पूरी सीरीज़ में चरमसुख की श्रृंखलाअों में गोते लगा रही है। पहली नज़र में तो यह विज़ुअल प्रदर्शनकारिता मिर्ज़ापुर के कथानक की साधारणता को ढांपने का माध्यम भर लगती है। वही घिसापिटा जलन, धोखे, गुस्से आैर लालच के इर्दगर्द घूमता शेक्सपीरियन कथानक। लेकिन जब हमें मुन्ना का किरदार आैर उसकी अपने ही वातावरण को ध्वस्त करती अप्रत्याशित अदा समझ आती हे, तो यह सारी मारकाट एक नया संदर्भ हासिल करती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इसीलिए, शो के सबसे भयावह प्रसंगों में मुन्ना की उपस्थिति है। उदाहरण के लिए पहले ही एपीसोड में बैठकखाने का वो शूटआउट जिसमें बेपरवाह मारपीट, एक डरी हुई गृहणी आैर एक कटा हुआ कान है। क्योंकि इन प्रसंगों में मुन्ना जैसी अप्रत्याशित कर देने वाली खूबी है, आैर ये किसी तार्किक ‘क्यों’ से ज़्यादा ‘कैसे’ वाली जिज्ञासा पर टिके हैं। इसके विपरीत वे प्रसंग जिनमें मुन्ना उपस्थित नहीं है, जैसे − चाय की थड़ी पर हुआ हत्याकांड, फ़्लैशबैक में रचा बचकाना झगड़ा, पुलिसवाले आैर गैंग्सटर के बीच बहुमंजिला चाल में गोलीबारी − इन सभी में उस तनाव की कमी दिखती है। ये सिनेमायी ज़्यादा हैं आैर असल ज़िन्दगी से दूर लगते हैं।

इसका मतलब ये नहीं कि मिर्ज़ापुर में बाकी किरदार अप्रासंगिक हैं। इसमें हिन्दी सिनेमा के चंद सबसे उम्दा अभिनेताअों की उपस्थिति है आैर उनका काम इतना शानदार है कि वो पटकथा के बीच की दरारों पर आसानी से नज़र नहीं जाने देता। शायद इसके बाद अन्य निर्माता भी क्षेत्रीय बोली के उच्चारण प्रशिक्षक का महत्व समझें। साफ़ दिखाई देता है कि युवा कलाकारों ने अपनी बोली के साथ उसे बोलने के तरीके आैर शारीरिक भंगिमाअों पर भी खूब मेहनत की है, जिससे उनकी गुंडई उभरकर सामने आती है। अली फ़ज़ल तो चमत्कार हैं। दोनों भाइयों में बुद्धि मैसी के हिस्से है आैर बल उनके। गरमखून पहलवान की भूमिका में उनकी चाल-ढाल हॉलीवुड फ़िल्म वॉरियर के टॉम हार्डी की याद दिलाती है। ठीक गुड़गाँव की तरह यहाँ भी, पंकज त्रिपाठी हत्यारे डॉन के मुखौटे के पीछे छिपे एक हिन्दुस्तानी पिता की खंडित भूमिका को बहुत सफ़ाई के साथ निभाते हैं। पहले लगता है कि डॉन ने दोनों भाइयों को इसलिए काम का ठेका दिया, जिससे उसका अपना बेटा उत्तेजित होकर गद्दी संभालने की आेर बढ़े। लेकिन त्रिपाठी बहुत चालाकी से किरदार की असल योजना को छुपा जाते हैं − उन्होंने दो विपरीत दिखते स्वभाव के किरदारों को अपने बेटे के सामने खड़ा कर दिया है, यह समझाने के लिए कि ‘बल’ के ऊपर ‘बुद्धि’ का होना ज़रूरी है।

नतीजा ये है कि अभिनेता दिव्येन्दु शर्मा − जिनकी अभिनय प्रतिभा को उनकी सुपरहिट प्यार का पंचनामा के बाद उसी तरह की भूमिकाअों में कास्ट कर बरबाद किया जाता रहा − यहाँ अन्तत: उस चमत्कारिक भूमिका में हैं जो इतने सालों के इन्तज़ार का हासिल है। खुद मिर्ज़ापुर की तरह ही वो अल्हड़ भी हैं, बददिमाग़ भी। बहुत ही खूबसूरती से उन्होंने मुन्ना त्रिपाठी के किरदार में ऐसा मर्दाना हीनताबोध भर दिया है, जिसके चलते समझदारी के उलट किसी-किसी पल तो आप खुदको उनके पक्ष में खड़ा पाते हैं। इस अराजक मृगतृष्णा में वे अपना रास्ता तलाश रहे हैं आैर मिर्ज़ापुर उन्हीं के कांधे पर टिका है। पर अपनी तमाम ठसक भरी गुंडई के बावजूद शर्मा इस तथ्य को हमारी आंखों से आेझल नहीं होने देते कि अन्तत: मुन्ना का किरदार भी अपनी उमर के अन्य युवाअों की तरह उसी द्वंद्व से जूझ रहा है, जिसमें एक आेर खुद का व्यक्तित्व है आैर दूसरी आेर सामाजिक दबाव। सामान्य लड़के से हत्यारा बन जाने में चंद कदम का फ़ासला है। अन्तत: वो भी एक लड़का भर है, जो अपने पिता के सामने खड़ा, उनसे बस प्यार चाहता है।


Adapted from English by Mihir Pandya

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