आप वो फ़ीलिंग तो जानते ही होंगे जब आपकी आत्मा शरीर से बाहर निकलकर आपकी खोपड़ी के चारों आेर मंडराती है, आैर इस भोजपुरी चटखारे के साथ बनायी गई सन्नी देआेल शाहकार की ‘समीक्षा’ करने की आपकी हिमाक़त पर ठठाकर हँस पड़ती है। पर कैसे जानेंगे − सदमे से मृत्यु के बाद कहाँ कुछ महसूस होता है! पर ये भैयाजी सुपरहिट के मेकर्स को समझाना मुश्किल है, जिसका दूसरा नाम ‘बॉलीवुड की प्रेतात्माएं’ भी हो सकता था। अभी पिछले हफ़्ते ही तो आपने मोहल्ला अस्सी में सन्नी देआेल को घामड़ बनारसी पंडित की भूमिका में देखा था। यहाँ वे फिर हाज़िर हैं, इस बार एक मूर्ख बनारसी डॉन की भूमिका में। उधर आईपीएल टीम मालिक प्रीति ज़िंटा उनकी शक्की पत्नी की भूमिका में हैं जिन्हें मज़ाक मज़ाक में पति को तलाक़ के कागज़ भेजने आैर आठ महीने बिछड़कर रहने में कोई परेशानी नहीं दिखती। नाज़ुक बॉलीवुड सुपरस्टार बनीं अमीषा पटेल भी हैं यहाँ, जिन्हें इस फ़िल्म में बन रही फ़िल्म में मूर्ख बनारसी डॉन की शक्की पत्नी, याने की प्रीति ज़िंटा वाला रोल निभाना है। फ़िल्म में उनका बात करने के लहजा ऐश्वर्या राय आैर शोएब अख़्तर में किससे ज़्यादा मिलता है, बताना मुश्किल है। फ़िल्म में कंगाल बंगाली स्क्रिप्टराइटर की भूमिका में श्रेयस तलपड़े भी हैं जिनका नाम है तरुण पोर्नो घोष। आैर डॉन को अपनी जड़बुद्धि पत्नी को वापिस हासिल करने में मदद कर रहे बड़बोले फ़िल्म निर्देशक की भूमिका में शॉर्ट सर्किट का झटका खाए अरशद वारसी दिखाई देते हैं।

असल में वारसी का रोल तो इस शर्मनाक फ़िल्म के असल बनानेवालों पर एकदम फ़िट बैठता है। आखिर वो फ़िल्म बनाने के नाम पर अपने कुचक्री फाइनेंसर से उसका काला पैसा ही तो ऐंठना चाहते हैं! पर फ़िल्म इतनी बेसिरपैर की है कि मेरे दिमाग़ में ज़्यादा मौज़ूँ सवाल ये घूम रहा है कि इस फ़िल्म के नाम में से एक ‘वाई’ कहाँ चला गया? (मुझे माफ़ करें, मैं रात के दो बजे इस फ़िल्म पर लिख रहा हूँ आैर इससे बेहतर चुटकुला आपको सुना पाने की स्थिति में नहीं हूँ)

देखिये, सच्चाई यही है कि हम सब मौका पड़ने पर अपने ज़मीर का सौदा करते हैं। लेकिन जब संजय मिश्रा, जयदीप एहलावत, ब्रजेन्द्र काला आैर पंकज त्रिपाठी जैसे बेहतरीन अभिनेता ऐसा करते हैं − जैसा उन्होंने इस फ़िल्म में काम करके किया है, तो दूसरे क़िस्म की परेशानी पैदा होती है। हम पब्लिक को इसे बाकायदा सत्तर एमएम के परदे पर झेलना पड़ता है। जैसे मान लीजिए कि कोई फ़िल्म समीक्षक किसी निर्माता से पैसा लेकर उसकी रेटिंग चढ़ा देता है, तो उसके दूसरे नुकसान नहीं हैं। लोग देखेंगे आैर निर्णय करेंगे। बेहतरीन अभिनेताअों का ऐसी वाहियात फ़िल्में करने के पीछे एक तर्क ये हो सकता है कि इससे हासिल बड़ी फ़ीस उन्हें भविष्य में अपनी पसन्द की फ़िल्म चुनने में मदद करेगी। अब ज़िन्दगी में कुछ बेहतर हासिल करने के लिए कभी-कभी अपने ऊसूलों को खूंटी पर टांग देना कोई गुनाह नहीं। लेकिन उनकी वजह से हमें जो इन बीते ज़माने के सितारों का नाकारापन परदे पर झेलना पड़ा, उसकी क्या भरपाई है? इस अत्याचार को भूला नहीं जा सकता। लेकिन जब हम इसका विकल्प देखते हैं जहाँ भारतीय टेलिविज़न में शिफ़्ट बेसिस पर अनाप-शनाप पैसा लुट रहा है, आैर वो भी दिमाग़ी रूप से मृत समाज तैयार करने के लिए, तो ये तुलना में कम बड़ा अपराध लगता है।

पर सावधान! ये आैर भी पीड़ादायी हो सकता है।

कल्पना कीजिए एक ऐसी इरोटिक कॉमेडी की, जिसमें एक डीडीडी नाम का उदास गैंग्स्टर गलती से डिप्रेशन की बजाए वियाग्रा की गोलियाँ खा लेता है आैर उसी नशे में एक अधनंगी लड़की को दबोचने की कोशिश करता है। वो लड़की भी ‘स्लीपी अँखियाँ’ आैर ‘कम टच मी’ बोलकर उसे फंसाने की कोशिश में हैं, जिससे सब रिकॉर्ड कर बाद में उसे ब्लैकमेल कर सके। या फिर कल्पना कीजिए उस घिसी पिटी देसी फ़िल्म की जिसमें एक विरोधी डॉन अपने प्रतिद्वंद्वी की मूर्ख पत्नी को मारने के लिए पहले उसकी कार को नदी में फिंकवा देता है। फिर पानी के नीचे से उसके बेहोश शरीर को निकालकर किडनैप कर लेता है आैर उसे कोल्ड स्टोरेज में रखता है जिससे उसे वापस होश आ जाये आैर वो उसका वापस मर्डर कर सके। चमत्कारिक रूप से होश आने पर उसे रेल की पटरी से बांधकर उसके ऊपर से जाने कौन सी रेलगाड़ी निकलवा देता है, आैर फिर भी फेल हो जाता है। या फिर बॉलीवुड फ़िल्ममेकिंग पर ये व्यंग्य जिसमें भ्रष्ट निर्देशक लेखक की बेइज़्ज़ती करता है, सीन करके दिखाने के बहाने मॉडल की चुम्मियाँ लेता है आैर लालची अदाकारा को समझाता है कि वो निर्माता को फंसाकर उसके साथ शादी कर ले, जिससे भविष्य में उसे पैसे के लिए ऐसी फ़िल्मों में काम ना करना पड़े।

या फिर अधेड़ होते सितारों पर बनी गदर: ए लव स्टोरी या दि हीरो : स्पाई की प्रेम कथा जैसी कोई पैरोडी जिसमें सन्नी देआेल सिनेमा उद्योग की रक्षा की महति ज़िम्मेदारी उठाते हुए अमीषा पटेल आैर प्रीति ज़िंटा के साथ बचकाना रोमांस कर रहे हैं। या फिर एक पैरोडी ‘ढाई किलो का हाथ’ पर, जिसमें मज़े मज़े में लोगों की खोपड़ियाँ तोड़ी जा रही हैं आैर खूनखराबे को चुटकुला बनाया जा रहा है। नायक बारिश को सम्मन देकर बुला रहा है क्योंकि वो शिव भक्त है!

सोचिए, ये सब फ़िल्म में होता तो?

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