निर्देशक : शंकर

अभिनय: रजनीकान्त, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन

मैंने आज सुबह मेरी ट्विटर टाइमलाइन पर एक मीम चलता देखा, जिसमें बताया गया था कि रजनीकान्त दुनिया के ऐसे अकेले अभिनेता हैं जिन्होंने श्वेत-श्याम, रंगीन, एनिमेशन आैर थ्री-डी इन चारों किस्म की फिल्मों में काम किया है। निर्देशक शंकर की पिछली शाहकार रोबोट (इंदीरन) के सीक्वल के तौर पर बनायी गई इस 2.0 को देखने के बाद मैंने सोचा कि मीम तो ये भी बनाया जा सकता है कि रजनीकान्त वो अकेले अभिनेता हैं जिन्होंने एक ही फ़िल्म में सैंकड़ों भूमिकायें निभाईं, इंसान भी बने आैर मशीन भी आैर लधुमानव से लेकर महामानव तक के अवतार धारण किये.. पर ज़रा रुकिये! शुरु से शुरु करते हैं। 

2.0 कहानी का सिरा वहीं से पकड़ती है, जहाँ रोबोट  ने छोड़ा था। आपको शायद याद हो, रोबोट  के अन्त में कहानी बीस साल आगे चली गई थी आैर अच्छे वाले रोबोट चिट्टी (जिसके नए अवतार पर इस फ़िल्म का शीर्षक रखा गया है) को अजायबघर में सजा दिया गया था। इसीलिए सीक्वल में सना (ऐश्वर्या राय, फ़िल्म में जिनकी सिर्फ़ फ़ोन पर तस्वीर नज़र आती है) को वैज्ञानिक वसीकरण की प्रेमिका की भूमिका में दोबारा देख मैं अचरज में पड़ गया। समय का ऐसा घालमेल कि लगता है अब कार्बन डेटिंग जैसी कोई तकनीक ही हमें बचा सकती है! सना को देख आपको खीज आएगी, क्योंकि वो अभी तक इसी बात की शिकायत किये जा रही है कि वसीकरण उस पर ध्यान नहीं देता। अरे, उसे तो शुक्र मनाना चाहिए कि दीवार पर उसकी तस्वीर नहीं टांग दी गई, फूलमाला के साथ। आैर क्योंकि ये निर्देशक शंकर की फ़िल्म है, तस्वीर के बजाए उसका ऐसा चमकीला हॉलोग्राम भी तो हो सकता था, जिसकी पृष्ठभूमि में दुनिया के सात अजूबों की तस्वीरें आती-जाती रहें!

पर सना के बदले हमें मिलती हैं एमी जैक्सन, जो यहाँ एक मशीन ‘नीला’ की भूमिका में हैं। क्या ये निर्देशक शंकर का इस आेर इशारा है कि हमारे हिन्दुस्तानी मसाला सिनेमा में नायिकाअों की भूमिका बस नायकों के चारों आेर मंडराने वाले किसी कृत्रिम उपकरण तक सिमटकर रह गई है? जैसे वो घरेलू काम करनेवाला कोई रोबोट हों? पर कहना होगा, नीला यहाँ वसीकरण की बुद्धि को अपने बल से पूर्ण करती है। वो लोगों को धौल जमाने के अलावा अन्य ‘स्त्रियोचित’ काम भी करती है, जैसे टेलिविज़न पर अनन्त काल तक चलनेवाले धारावाहिक देखना। वो करे भी क्या आखिर, अब वसीकरण जैसे बोरिंग इंसान के साथ जो फंसी है। वसीकरण शर्तिया महानायक रजनीकान्त का परदे पर सबसे बेरंगा अवतार है। नासा, इसरो.. आैर इंटरपोल से जुड़ी नीरस बातें करनेवाला। सीधे इंसान की भूमिका निभाना एक बात है, पर इसका मतलब ये नहीं कि आप कतई बोरियत पैदा करने वाले किरदार बन जायें। मेरे थियेटर के बाहर लगे कार्डबोर्ड कटआउट में इससे ज़्यादा जान आैर ज़िन्दादिली होती है। 

इसमें गलती शंकर की भी है। सच है, कि वो कमाल की कल्पनाएं रचते हैं परदे पर। मोबाइल फ़ोन का जत्था, जो आसमान में पक्षियों की तरह उड़ रहा है अचानक एक शिकारी बाज़ में बदल जाता है। शयनकक्ष अचानक मौत के कुंए में बदल जाता है, जहाँ मोबाइल फ़ोन का कंपन आैर उसकी घंटियाँ भुतहा माहौल रच देती हैं। सड़क पर चमकीली सुनामी आती है। किसी इंसान के पेट में मोबाइल फ़ोन ऐसे चमकता है, जैसे एलियन  फ़िल्म में नायिका के गर्भ से शैतान जन्म लेने वाला था। आैर उम्मीद के मुताबिक वो पेट फटता भी है, बिल्कुल ऐसे जैसे गरुड़ पुराण की तमाम कल्पनाएं साकार हो गई हों। लेकिन लगता है शंकर की बस इसमें ही रुचि बाकी रह गई है अब, विज़ुअल चमत्कार। एक लेखक आैर निर्देशक के तौर पर उन्होंने किरदारों, रिश्तों आैर कथानक में ज़रूरी तनाव पैदा करने जैसी चीज़ों के बारे में सोचना छोड़ दिया है। कहानी का मूल ढांचा तो हमें फ़िल्म का ट्रेलर देखकर ही समझ आ गया था। लेकिन इस फ़िल्म का लेखन इतना मशीनी है कि लगता है जैसे रोबोट नीला के पेट में शंकर की पिछली फ़िल्मों के ज़रूरी प्लॉट पाइंट्स डालकर उससे इस फ़िल्म की पटकथा उगलवा ली गई हो। 

2.0 कुछ हद तक अपने उद्देश्य में सफ़ल होती है तो इसका श्रेय फ़िल्म में आई चमत्कारिक मुठभेड़ों को जाता है। यहाँ शंकर की कल्पनाशीलता ने खुलकर अपना जलवा बिखेरा है।

अजीबोगरीब हत्याआें का सिलसिला? समझो हो गया। मध्यांतर के बाद फ़्लैशबैक? समझो हो गया। उनकी फ़िल्म अपरिचित  की तरह एक ही किरदार से भोले आैर खल किरदार का जन्म? समझो हो गया। पुरानी हिन्दुस्तानी  की तरह एक भलेमानुस बुड्ढे का बेपरवाह लोगों को सबक सिखाने के लिए अतिवादी इंसाफ़ के पुजारी में बदलना? समझो हो गया। पुराने किस्सों को याद करना अच्छी बात है, लेकिन लेखन में दोहराव खराब चीज़ है। यहाँ कहानी को जमाने में ही लम्बा वक्त लग जाता है आैर वसीकरण की संगत में यह समय सदियों लम्बा लगता है। इस देरी के बावजूद जब चीज़ें होती हैं, तो वो एकदम झटके से होती हैं। कहानी का पहिया तेज़ी से घूमना वहाँ शुरु होता है जब वसीकरण आैर नीला गायब हो रहे सेलफ़ोन का ठिकाना मालूम करने निकलते हैं। आैर बूम! वो ठीक असली ठिकाने पर पहुँच जाते हैं। बेहतर ना होता गर इसमें कुछ हाईटेक जासूसी करामातें पिरो दी गई होतीं? पिछली फ़िल्म रोबोट  में आये डैनी के खल किरदार का बेटा यहाँ है। वो नायक वसीकरण की तमाम मेहनत पर पानी फेरना चाहता है। आैर बूम! वो सीधा उसके वैज्ञानिक अड्डे पर जा पहुँचता है। क्यों ना इसे एक शानदार डकैती का रूप दिया जाता? 

अक्षय कुमार यहाँ विलेन की भूमिका में हैं। मेरी समझ में आ गया है कि उन्होंने ये धूसर रंगों वाले स्वेटर पहने कांपते बुड्ढे की हज़ारों पिक्सल में बंटी भूमिका क्यों स्वीकार की होगी। दरअसल उनका देश को बुरी आदतों से बचाने वाला अभियान अभी तक जारी है। चाहें तो वे इसे तीतरएक प्रेम कथा  या एयरटेललिफ़्ट  पुकार सकते हैं। लेकिन उनके किरदार की चिन्ताएं हमारी चिन्ताआें में शामिल हों, इसके लिए फ़िल्म उन्हें मोहलत ही नहीं देती। उनके किरदार की चिन्ताआें आैर संवेदनशीलता को शंकर का ये धमाके पर धमाके वाला स्टाइल निगल जाता है। आॅस्कर विजेता ध्वनि रचयिता रेसुल फुकुट्टी ने फ़िल्म कॉम्पेनियन साउथ को दिए साक्षात्कार में बताया था कि उनके लिए सबसे मुश्किल चुनौती मरणासन्न गौरैया की अन्तिम कराह को ध्वनि में रचना रही। फिर क्यों इस नवीन ईजाद को ए आर रहमान के भावुक संगीत में दबा दिया गया? 

2.0 कुछ हद तक अपने उद्देश्य में सफ़ल होती है तो इसका श्रेय फ़िल्म में आई चमत्कारिक मुठभेड़ों को जाता है। यहाँ शंकर की कल्पनाशीलता ने खुलकर अपना जलवा बिखेरा है। हमने ट्रांसफॉर्मर्स जैसी फ़िल्मों में दो विशालकाय जीवों को आपस में टकराते देखा है। लेकिन उनमें से एक अचानक चुम्बकीय घोड़े की नाल में बदल जाये आैर दूसरे को.. इससे आगे का चमत्कार आप फ़िल्म में ही देखियेगा। फ़िल्म का दूसरा हिस्सा जहाँ रजनीकान्त अपने असली रंग में आते हैं, वो तो एकदम पागलपन है। एक सीन में, जहाँ रोबोट चिट्टी का किरदार रोबोट नीला के साथ आॅपेरा में युगल गीत गुनगुना रहा है, गाने के बोल हैं कि ये नम्बर्स का खेल तो बच्चों का खेल है। किरदार में रहते हुए भी रजनीकान्त यहाँ जैसे अपने दर्शकों को बदमाशी भरी आँख मारते हैं। एक आेर फ़िल्म में ‘पक्षी बचाआे’ का संदेश है, वहीं दूसरी आेर अन्य किरदार कबूतरों का गला घोंट देना चाहता है। शंकर के सिनेमा में यही अच्छी बात है। उनकी फ़िल्मों में कुछ ना कुछ होता रहता है। बस, उन्हें एक बेहतर लेखक मिल गया होता जो इन तमाम चमत्कारों को सुनियोजित पटकथा में बांध देता। क्योंकि बस यही अन्तर रह गया 2.0 आह! से 2.0 अहा! तक में।

(This review has been adapted to English by Mihir Pandya)

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